श्री गुरू ग्रंथ साहिब दर्पण । टीकाकार: प्रोफैसर साहिब सिंह । अनुवादक भुपिन्दर सिंह भाईख़ेल

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सलोक भगत कबीर जीउ के    ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ कबीर मेरी सिमरनी रसना ऊपरि रामु ॥ आदि जुगादी सगल भगत ता को सुखु बिस्रामु ॥१॥ {पन्ना 1364}

पद्अर्थ: सिमरनी = माला। रसना = जीभ। आदि = जगत के शुरू से। जुगादी = जुगादि, जगत के आरम्भ से। ता को = उस (राम) का, उस प्रभू का (नाम)। बिस्रामु = विश्राम, ठहराव, शांति, अडोलता।

अर्थ: हे कबीर! मेरी जीभ पर राम (का नाम) बस रहा है-यही मेरी माला है। जब से सृष्टि बनी है सारे भगत (यही नाम सिमरते आए हैं)। उसका नाम (ही भगतों के लिए) सुख और शांति (का कारण) है।1।

कबीर मेरी जाति कउ सभु को हसनेहारु ॥ बलिहारी इस जाति कउ जिह जपिओ सिरजनहारु ॥२॥ {पन्ना 1364}

पद्अर्थ: कउ = को। सभु को = हरेक बंदा। हसनेहारु = हँसने का आदी। बलिहारी = सदके। जिह = जिससे, जिस जाति में पैदा हो के।

अर्थ: हे कबीर! मेरी जाति पर हरेक व्यक्ति हँसता होता था (भाव, जुलाहों की जाति का हरेक व्यक्ति मजाक उड़ाता है)। पर, अब मैं इस जाति पर से सदके हूँ क्योंकि इसमें पैदा हो के मैंने ईश्वर की बँदगी की है (और आत्मिक सुख पा रहा हूँ)।2।

भाव: नीच से नीच जाति भी सराहनीय हो जाती है जब उसमें पैदा हो के कोई मनुष्य परमात्मा की भगती करता है। नीच जाति वाले को भी कोई नाम सिमरन से रोक नहीं सकता।

कबीर डगमग किआ करहि कहा डुलावहि जीउ ॥ सरब सूख को नाइको राम नाम रसु पीउ ॥३॥ {पन्ना 1364}

पद्अर्थ: किआ डगमग करहि = तू क्यों डोलता है? प्रभू की भगती से तू क्यों जी चुराता है? कहा = और कहाँ? प्रभू के बिना और किस जगह? जीउ = प्राण, मन। नाइको = मालिक।

अर्थ: हे कबीर! (सुख की खातिर परमात्मा को बिसार के) और किस तरफ़ मन को भटका रहा है? (परमातमा की याद से) क्यों तेरा मन डाँवाडोल हो रहा है? परमात्मा के नाम का अमृत पी, यह नाम ही सारे सुखों का प्रेरक है (सारे सुख परमात्मा स्वयं ही देने योग्य है)।3।

कबीर कंचन के कुंडल बने ऊपरि लाल जड़ाउ ॥ दीसहि दाधे कान जिउ जिन्ह मनि नाही नाउ ॥४॥ {पन्ना 1364}

पद्अर्थ: कंचन = सोना। कुंडल = कानों में पड़ने वाले 'वाले' अथवा कुण्डल। ऊपरि = उन कुण्डलों पर। दीसहि = दिखते हैं। दाधे = जले हुए। कान = काने, सरकड़ा। मनि = मन में।

अर्थ: हे कबीर! अगर सोने के कुण्डल बने हुए हों, उन कुण्डलों पर लाल जड़े हुए हों, (और ये 'कुण्डल' लोगों के कानों में पड़े हुए हों); पर जिनके मन में परमात्मा का नाम नहीं बसता, उनके यह कुण्डल जले हुए तिनकों की तरह दिखते हैं (जो बाहर से तो चमकते हैं, पर अंदर से राख होते हैं)।4।

भाव: नाम के बिना मनुष्य के अंदर सड़न बनी रहती है।

कबीर ऐसा एकु आधु जो जीवत मिरतकु होइ ॥ निरभै होइ कै गुन रवै जत पेखउ तत सोइ ॥५॥ {पन्ना 1364}

पद्अर्थ: ऐकु आध = कोई विरला मनुष्य। मिरतकु = मुर्दा, दुनिया के रसों से मुर्दा, दुनियावी सुखों से बेपरवाह। निरभै = निडर, सुख मिले चाहे दुख की परवाह ना हो। रवै = सिमरे, याद करे। गुन रवै = प्रभू के गुण चेते करे, गुण गाए। जत = जिधर। पेखउ = मैं देखता हूं। तत = तत्र, उधर।

अर्थ: हे कबीर! ऐसा कोई विरला ही मनुष्य होता है, जो दुनियावी सुखों के प्रति बेपरवाह रहे, सुख मिले चाहे दुख आए- इस बात की परवाह ना करते हुए वह परमात्मा के गुण गाए जिसको मैं जिधर देखता हूँ उधर ही मौजूद है।5।

भाव: जब तक सांसारिक सुखों की लालसा है, सिमरन नहीं हो सकता।

कबीर जा दिन हउ मूआ पाछै भइआ अनंदु ॥ मोहि मिलिओ प्रभु आपना संगी भजहि गुोबिंदु ॥६॥ {पन्ना 1364}

पद्अर्थ: जा दिन = (प्रभू के गुण गा के) जिस दिन, जब। हउ मूआ = 'मैं मैं करने वाला खत्म हो गया, मैं सुखी होऊँ मैं धनी हो जाऊँ ये विचार समाप्त हो गया। पाछै = अहंकार खत्म होने पर। मोहि = मुझे। आपना = मेरा प्यारा। संगी = साथी, मेरी ज्ञानेन्द्रियां। भजहि = सिमरन करने लग जाते हैं।

गुोबिंदु: अक्षर 'ग' के साथ दो मात्राएं 'ु' और 'ो' हैं। असल शब्द है 'गोबिंद', यहां 'गुबिंद' पढ़ना है।

अर्थ: हे कबीर! (प्रभू के गुण याद करके) जब मेरा 'मैं-मैं' करने वाला स्वभाव खत्म हो गया, तब मेरे अंदर सुख बन गया। (निरा सुख ही ना बना) मुझे मेरा प्यारा ईश्वर मिल गया, और अब मेरी साथी ज्ञानेन्द्रियां भी परमात्मा को याद करती हैं (ज्ञानेन्द्रियों की रुचि ईश्वर की ओर हो गई है)।6।

भाव: सुख 'हउ' (मैं-मैं) के तयाग में है, सिमरन भी 'हउ' को छोड़ने से हो सकता है।

कबीर सभ ते हम बुरे हम तजि भलो सभु कोइ ॥ जिनि ऐसा करि बूझिआ मीतु हमारा सोइ ॥७॥ {पन्ना 1364}

पद्अर्थ: हम तजि = मेरे बिना। सभु कोइ = हरेक जीव। जिनि = जिस मनुष्य ने। अैसा करि = इस तरह। बूझिआ = समझ लिया, सूझ आ गई है।

नोट: इस शलोक में पिछले शलोक की कुछ व्याख्या सी है। 'हउ मूआ' के ख्याल को समझाया है। 'हउ' के भुलेखे में मनुष्य अपने ही अंदर गुण देखता है; पर जब 'हउ मूआ' वाली हालत बनती है, तो यह पहले वाला स्वभाव बिल्कुल ही उलट जाता है, फिर दूसरों में भी गुण दिखाई देने लग जाते हैं।

अर्थ: हे कबीर! (हरी-नाम सिमर के अब मेरा 'मैं-मैं' करने वाला स्वभाव हट गया है, मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि) मैं सबसे बुरा हूँ, हरेक जीव मुझसे अच्छा है; (सिर्फ यही नहीं) जिस-जिस भी मनुष्य ने इस तरह की समझ प्राप्त कर ली है, वह भी मुझे अपना मित्र मालूम होता है।

कबीर आई मुझहि पहि अनिक करे करि भेस ॥ हम राखे गुर आपने उनि कीनो आदेसु ॥८॥ {पन्ना 1364}

पद्अर्थ: आई = (यह अहंकार मुझे कुमार्ग पर डालने) आया ('हउ' आई)। मुझहि पहि = मेरे पास भी (जैसे यह औरों के पास आती है)। भेस = वेश। करे = कर कर, बार बार करके। अनिक...भेस = कई भेष धार के, कई ढंग बना के, कई तरीकों से, कई शक्लों में। हम = मुझे। उनि = उस (अहंकार) ने। आदेसु = नमस्कार। उनि...आदेसु = उस अहंकार ने नमस्कार की, वह अहंम् झुक गया, वह अहंकार बदल के निम्रता बन गई।

नोट: धन, जवानी, विद्या, राज, धरम-करम आदि मनुष्य में 'अहंकार' पैदा कर देते हैं। जिन उद्यमों को मनुष्य बहुत अच्छे समझ के करता है वह भी कई बार अहंकार में ले आते हैं। अमृत बेला में उठ के प्रभू को याद करना, जरूरतमंदों की सेवा करनी आदि भले काम हैं, पर अगर मनुष्य रक्ती भर भी अचेत हो जाए, तो यही गुण अहंकार का अवगुण पैदा कर देते हैं कि 'मैं' धर्मी हूँ, 'मैं' दानी हूँ।

अर्थ: हे कबीर! (ये अहंकार जैसे औरों को भरमाने आता है वैसे ही) मेरे पास भी कई शक्लों में आया। पर, मुझे प्यारे सतिगुरू ने (इससे) बचा लिया, और वह 'अहम्' बदल के विनम्रता बन गई।8।

कबीर सोई मारीऐ जिह मूऐ सुखु होइ ॥ भलो भलो सभु को कहै बुरो न मानै कोइ ॥९॥ {पन्ना 1364}

पद्अर्थ: सोई = इस अहंकार को ही। जिह मूअै = जिस अहंकार के मरने से। सभु को = हरेक जीव। भलो भलो कहै = (अहंकार के त्याग को हरेक जीव) सराहता है। कोइ बुरो न मानै = (अहंकार के मारने को) कोई मनुष्य बुरा काम नहीं कहता।

अर्थ: हे कबीर! इस अहम् को ही मारना चाहिए, क्योंकि इसको मारने से सुख मिलता है। अहंकार के त्याग को हरेक मनुष्य सराहता है, कोई मनुष्य इस काम को बुरा नहीं कहता।9।

कबीर राती होवहि कारीआ कारे ऊभे जंत ॥ लै फाहे उठि धावते सि जानि मारे भगवंत ॥१०॥ {पन्ना 1364-1365}

पद्अर्थ: कारीआ = कालियां, अंधेरी। ऊभे = उठ खड़े होते हैं, चल पड़ते हैं। कारे जंत = काले जीव, काले दिलों वाले लोग, चोर आदि विकारी मनुष्य। लै = ले के। उठि धावते = उठ दौड़ते हैं। सि = ऐसे लोग। जानि = जान ले, समझ ले, यकीन रख। मारे भगवंत = ईश्वर के मारे हुए, ईश्वर से बहुत दूर।

अर्थ: हे कबीर! जब रातें अंधेरी होती हैं, तो चोर आदि काले दिल वाले लोग (अपने घरों से) उठ खड़े होते हैं, फंदे ले के (दूसरों का घर लूटने के लिए) चल पड़ते हैं, पर यकीन जानो ऐसे लोग रॅब की ओर से मारे हुए हैं।10।

नोट: शलोक नं: 9 में लिखते हैं कि जो मनुष्य अपने अंदर से अहंकार को मारता है वही सुखी है। जगत भी इस काम को सराहता है। इसके मुकाबले ऐसे लोग भी हैं जो औरों को मारने को चल पड़ते हैं, जान तो अपनी भी वे तली पर रख के चलते हैं, पर ये दलेरी धिक्कारयोग्य है। जगत भी धिक्कारें डालता है, और उनके दिल भी काले ही रहते हैं। ऐसे रॅब से विछुड़े हुए लोगों को भला सुख कहाँ?

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Sri Guru Granth Darpan, by Professor Sahib Singh