INTRODUCTORY PAGES

श्री गुरू ग्रंथ साहिब दर्पण


समर्पण

श्री गुरू ग्रंथ साहिब जी की बाणी को सही अर्थों, सही परिपेक्ष्य में समझने के लिए प्रोफेसर साहिब सिंह जी की रचना ‘श्री गुरू ग्रंथ साहिब दर्पण’ का सिख जगत व गुरबाणी प्रेमियों में अनूठा स्थान है। गुरबाणी की टीका के रूप में इससे ज्यादा प्रामाणिक ग्रंथ और कोई नहीं है।

इस अमुल्य धरोहर से कोई वंचित ना रह जाए इसी उद्देश्य से इस ग्रंथ का हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत है, और समर्पित है उन सभी हिन्दी भाषी पाठकों को, हिन्दी क्षेत्र में रहने वाले सिख समुदाय को, सिंधी भाईचारे, सिकलीगर व वणजारे कबीलों के रूप में फैले सिख जगत, कबीर पंथी, उदासी व बहुत सारी गुरू नानक नाम लेवा धाराओं से जुड़े तबके को जिनमें अधिकतर को आज पंजाबी पढ़नी–लिखनी नहीं आती, पर वे जिज्ञासा रखते हैं श्री गुरू ग्रंथ साहिब जी की बाणी को समझने की।

इसके लिए धन्यवाद के पात्र हैं डाक्टर दलजीत सिंह जी, जो स्वर्गीय प्रो: साहिब सिंह जी (कृति के लेखक) के सुपुत्र हैं, जिन्होंने नि:स्वार्थ भाव से बेझिझक हो के इसके हिंदी रूपांतरण व पाठकों तक पहुँचाने की आज्ञा देकर हम सभी को कृतार्थ किया। डा: कुलबीर सिंह थिंद जी के भी हम आभारी हैं जिन्होंने आरम्भ से ही हमें प्रोत्साहित किया और वेब साईट पर लांच करके आप सभी तक इसे पहुँचाया है।

पंजाबी में लिखी मूल कृति के इस अनुवाद में कोशिश की गई है कि भाषा सरल, आम बोलचाल वाली बनी रहे। पर, साथ ही पूरा ध्यान भी रखा गया है कि लेखक की मौलिकता व शैली बरकरार रहे। इस कार्य में मेरी मदद की मेरी धर्मपत्नी पुष्पिंदर कौर ने जिन्होंने ना सिर्फ एक आलोचक की तरह बल्कि त्रुटि संशोधन (प्रूफ रीडिंग) जैसी जिम्मेदाराना जिम्मेवारी को बाखूबी निभाया।

हमें पूर्ण विश्वास है ज्यों–ज्यों आप पढ़ते जाएंगे। गुरबाणी के प्रति आपकी समझ गहरी होती जाएगी, और ज्ञान व आनंद की अनुभूति में वृद्धि से आत्मविश्वास जागेगा। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ आपकी शिकायतें व सुझाव सादर आमंत्रित हैं।

भुपिन्दर सिंह भाईख़ेल

098760.42781

bhupinder64@gmail.com


गुरबाणी के शुद्ध उच्चारण के लिए


गुरबाणी लेखन व उच्चारण की भी अपनी एक अलग विधा है। गुरमुखी (पंजाबी) अक्षरों में लिखी गई गुरबाणी के एक–एक अक्षर, एक एक मात्रा का महत्व है। थोड़े से फेर बदल से गुरबाणी के अर्थ का अनर्थ हो सकता है। इसी तरह बोलते समय भी गलत उच्चारण, गलत ध्वनि से गलत संकेत जाने की पूरी संभावना होती है। इसीलिए गुरबाणी की सभी लग–मात्राओं में किसी भी तरह के फेर–बदल की भी पूर्णत: मनाही है। गुरबाणी लिखते, पढ़ते समय इस बात का पूरा पूरा ख्याल रखा जाना चाहिए। संभव हो तो गुरबाणी के जानकार से गुरबाणी पढ़ने का तरीका सीख लिया जाए। ताकि गुरबाणी की गुरू गरिमा व सम्मान में किसी भूल से बचा जा सके।

गुरबाणी को गुरमुखी में पढ़ने का अपना ही आनंद है। हिंदी में भी कबीर जी, फरीद जी, रहीम जी आदि की भक्तिकाल की रचनाएं जिन्होंने पढ़ी हैं उन्हें गुरबाणी पढ़ने व समझने में ज्यादा मुश्किल नहीं होगी। हमने पूरी कोशिश की है हिन्दी में गुरबाणी शब्दों को अक्षरश: लिखने की। पर हिंदी शब्द रचना व उच्चारण का पंजाबी से कई जगह बहुत फर्क है। इस कारण गुरबाणी के शुद्ध उच्चारण के लिए नीचे दी गई कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है।

पंजाबी में ‘इ’ की ध्वनि कई जगह ‘य’ के रूप में होती है।

अगर शब्द के अंत में ‘इ’ अक्षर है तो वह ‘य’ की ध्वनि देगा जैसे; भाइ–भाय। देइ–देय। होइ–होय। कोइ–कोय। करेइ–करेय। आइ–आय। बलाइ–बलाय। छडाइ–छडाय। जाइ–जाय।

इसी तरह जब शब्द ‘इआ’ के मेल से समाप्त हो तो ध्वनि ‘या’ व ‘यआ’ की होगी। जैसे– माइआ–माया। पाइआ–पाया। मिटाइआ–मिटायआ। धिआइआ–धिआया। गइआ–गया। लइआ–लयआ। दिढ़ाइआ–दिढ़ाया। राइआ–रायआ। जीवाइआ–जीवायआ आदि आदि।

शब्दों के अंत में इस्तेमाल होने वाली मात्राऐं– ‘ु’ व ‘ि’ हालांकि व्याकरण और शब्दार्थ के पक्ष से महत्वपूर्ण होती हैं पर इन मात्राओं का उच्चारण बहुत ही मध्यम अथवा ना के बराबर होता है। जैसे मधुसूदनु, दमोदरु, होरतु, भगतु, समरथु, नामु व तितु का उच्चारण मधुसूदन, दमोदर, होरत, भगत, समरथ, नाम व तित करना है। इसी तरह सिफति, करहि, मनि, करि, रैणि व मोहि का उच्चारण सिफत, करह, मन, कर, रैण व मोह करना है। कुछ और उदाहरण देखें;

पिरु–पिर। बिनु–बिन। तिसु–तिस। नामु–नाम। अनदिनु–अनदिन। हुकमु–हुकम। जंदारु–जंदार। भउजलु–भउजल। संसारु–संसार। नामु–नाम। मिलाइअनु–मिलायन।

कुनारि–कुनार। कुरूपि–कुरूप। घरि–घर। परहरि–परहर। भतारि–भतार। सबदि–सबद। सभि–सभ। मनि–मन। करमि–करम। परापति–परापत। हुकमि हुकम। नदरि–नदर।

गुरबाणी में कई जगह पर ऐसे शब्दों का प्रयोग किया गया है जिन पर हलांकि बिंदी नहीं लगाई गई है पर उच्चारण के समय इस ध्वनि को उच्चारित करना है जैसे– निमाणिआ को निमाणिआं, अहंकारीआ को अहंकारीआं, वाधाईआ को वाधाईयां बोलना है।

इस तरह उक्त नियमों का ख्याल रखते हुए ज्यों ज्यों आप शुद्ध गुरबाणी पढ़ते जाएंगे, अर्थ स्पष्ट होने शुरू हो जाएंगे और आनंद की अनुभूति भी बढ़ती जाएगी। पाठकों की सहायता के लिए हमने बाणी के पहले सौ पृष्ठों को गुरबाणी के साथ उसका उच्चारण भी दिया है। ये मूल कृति से अलग सिर्फ गुरबाणी के शुद्ध उच्चारण के उद्देश्य को ध्यान में रख कर किया गया है।

अनुवादक

भुपिन्दर सिंह भाईख़ेल

098760.42781

bhupinder64@gmail.com



धन्यवाद

सन्1920 का फरवरी माह मेरे लिए भाग्यशाली थाजब सरदार जोध सिंह जी गुजरांवाले गुरू नानक खालसा कालेज के प्रिंसीपल बन के आए। गुरू पातशाह ने बेअंत मेहर की कि सरदार जोध सिंह जी द्वारा पातशाह ने मुझे अपनी बाणी के विचार की अमुल्य दात बख्शी। वह समय मुझे कभी भी नहीं भूल सकता जब सरदार जोध सिंह जी ने बड़ी ही उदारता से अपनी की हुई सारी ही मेहनत मेरे हवाले कर दी और गुरबाणी के विचार में मेरी अगुवाई करने का मुझे भरोसा दिया।

उसी वर्ष का दिसंबर माह भी मेरे लिए बहुमूल्य बरकत लेकर आया जब मुझे गुरू तेग बहादुर साहिब के शहीदी दिवस पर गुरुबाणी व्याकरण की पहली झलक नसीब हुई। ये रोशनी बढ़ती गई, और सरदार जोध सिंह द्वारा गुरू पातशाह की लगाई पौध प्रफुल्लित होनी शुरू हो गई।

सन् 1925 में उस व्याकरण के आधार पे इतना हौंसला मिल गया कि मैंने गुरू रामदास साहिब की “आठ वारों” का टीका लिख लिया। पर, बस वह प्रेरणा वहीं खत्म सी हो गई। चार साल बीत गए। वैसे, व्याकरण बढ़ता गया। 1929 में गुरू पातशाह ने फिर अवसर बना दिया, जिस तहत मैंने “भट्टों के सवैये” का टीका लिखा। तभी से सरदार जोध सिंह द्वारा मुझे खालसा कालेज अमृतसर में जगह मिल गई। सन् 1930–31में वह टीका छप गया। पढ़ी–लिखी सिख जनता में उसे पसंद किया गया। जिससे उत्साहित होकर मैंने “जप साहिब” व “आसा दी वार” के टीके भी लिख के छाप दिए। “गुरुबाणी व्याकरण”इस दौरान मुकम्मल हो गया।

सरदार जोध सिंह जी ने मुझे सम्पूर्ण गुरू ग्रंथ साहिब जी का टीका लिखने के लिए उत्साहित किया। पर, इतना बड़ा महान काम देख के मुझे हौसला ना हुआ। ये पछतावा मुझे आज तक बना हुआ है कि मैं सरदार जी के प्यार का लाभ ना उठा सका। गुरू पातशाह की रज़ा ही ऐसी थी।

सन् 1938–39 में गुरुबाणी व्याकरण छप गया। उसके बाद गाहे–बगाहे कुछ एक लम्बी व कठिन बाणियों के टीके लिखने का हौसला बनता गया। कुछ टीके छपते गए, कुछ अनछपे ही मेरे पास पड़े रहे। बाईस वारें, सदु, सुखमनी, सिद्ध–गोष्ठि, ओंकार, श्लोक फ़रीद जी, श्लोक कबीर जी व भगत बाणी का सहजे–सहजे उस व्याकरण की मद्द से टीका लिखा जाता रहा। पर सारे ही श्री गुरू ग्रंथ साहिब जी का टीका लिखने का ख़्याल मुझे सपने में भी नहीं था आया।

सन् 1956 में जून के महीने दिल्ली निवासी एक सज्जन स. दिलीप सिंह जी मुझे यहां मिले। उन्होंने मेरे सभी टीके पढ़े हुए थे। उन्होंने मुझे सारा टीका करने की प्रेरणा की। पर, मैं काँप गया, और ना कर दी। वो तो चले गए, पर अपनी प्रेरणा मेरे अंदर टिका गए, और पहली जनवरी 1957 से मैं जुट गया। शरीर तो रोगी सा ही था, कई बार अड़ के खड़ा हो जाता। फिर भी गुरू पातशाह ने ऐसी मज़बूती से मेरी बाँह पकड़ के रखी कि इसी जेठ सुदी चौथ वाले दिन 17 जून 1961 में सारा ही काम समाप्त हो गया। ये मेरे पातशाह की मेहर थी। वर्ना मैं कौन–सा बेचारा था?

रोगों से जर्जर हुए शरीर को अब तक कायम रखने के लिए भी मेरे गुरू पातशाह ने ख़ुद ही शक्ति दी। मेरी जीवन–संगिनी रतन कौर ने मेरी सेहत कायम रखने के लिए इतने साल सिर से पैर तक का ज़ोर लगा दिया है।

सत्संग की बरकत:

गुरू नानक खालसा कालेज गुजरांवाले में पहलीबार मैं सन् 1917 से 1921 तक रहा। वहाँ मैं संस्कृत व गुरुबाणी पढ़ाता था। 1921 से 1927 तक मैं शिरोमणी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी में उप–सचिव की डृयूटी पे काम करता रहा। सितंबर 1927 से मैं फिर गुरू नानक खालसा कालेज गुजरांवाले पहिली ही सेवा में चला गया। फरवरी 1928 में गुरू पातशाह की अपार कृपा से वहाँ एक छोटा सा सत्संग बन गया, जिसके हम पहले चार मैंबर बने;

बाबा तेजा सिंह जी, ए.टी.एस.
मास्टर छहबर सिंह जी, हैडमास्टर उपदेशक कालेज, घरजाख।
भाई हिम्मत सिंह जी ज्ञानी, अध्यापक, उपदेशक कालेज।
लेखक

ये सत्संग उपदेशक कालेज के प्रांगण में नए बने गुरुद्वारे में रोज़ शाम को जुड़ता रहा। जितने टीके, प्रयाय, कोश आदिक उस वक्त तक मिल सकते थे, वो सभी हमारे पास मौजूद थे। हमारा प्रयास यही रहता था कि जहाँ तक संभव हो, जितनी भी गुरुबाणी व्याकरण की उस समय तक समझ आ चुकी थी, उसका भी इस्तेमाल करके, बगैर किसी पहले बने ख़्याल की रुकावट के, अर्थ समझने का प्रयास किया जाए। भाई हिम्मत सिंह जी के सम्प्रदाई अर्तों से भी हमें बहुत सहायता मिलती रही।

कुछ ही समय बीता था कि उस सत्संग में निम्नलिखित और सज्जन आ जुड़े;
प्रोफेसर नारायण सिंह जी एम.ए.
प्रोफेसर शेर सिंह जी एम.एस–सी.
प्रोफेसर सुन्दर सिंह जी एम.एस–सी.
डा: रण सिंह जी सपुत्रबाबू तेजा सिंह जी भसौड़ और
भाई नन्द सिंह जी दुकानदार

ये सत्संग की ही बरकत थी कि मैं अक्टूबर 1932 तक गुरुबाणी व्याकरण सफलता से लिख सका था।

सन् 1929 में मुझे खालसा कालेज अमृतसर में आ जाने का मौका मिल गया। यहाँ भी गुरूपातशाह की मेहर से गुरुबाणी विचार वास्ते थोड़–थोड़े अंतराल में छोटे–छोटे सत्संग बनते ही रहे।

इन सभी सत्संगों की बरकत से गुरुबाणी के अर्थ समझने और लिखने में मुझे बहुत अगुवाई मिलती रही। ये सारी मेहर मेरे गुरू पातशाह की ही थी।

शहीद सिख मिशनरी कालेज:

खालसा कालेज अमृतसर से मैं 11 अक्टूबर 1952 को रिटायर हुआ। कालेज के प्रोफेसर स: वरियाम सिंह और पंथ के प्रसिद्ध नेता मास्टर तारा सिंह को मेरे सत्गुरू ने साधन बना के मुझे शहीद सिख मिशनरी कालेज में जगह ले दी। इस तरह मैं कुल्ली–गुल्ली की ज़रूरतों से निश्चिंत हो के ज्यादा से ज्यादा समय श्री गुरू ग्रंथ साहिब जी की टीका लिखने में लगा सका हूँ।

छपाई:

इस टीके का पहला संस्करण “राज पब्लिशर्स” जालंधरवाले कर रहे हैं।


पाठकों की सेवा में विनती

1925 से 1961 तक 36 सालों में ये सारा टीका लिखने के कारण मेरी लिखी पंजाबी बोली में काफ़ी फ़र्क पड़ता आ रहा है। टीके के छपना शुरू होने पर मैं सारे किए काम को साथ–साथ वाचता जाऊँगा; फिर भी हो सकता है कि लेखन एक–सार का ना हो सके।

आज से 5–6 शताब्दी पहले की बोली में लिखी बाणी को समझने में व उसका टीका लिखने में कई कमियां रह जानी असंभव बात नहीं है। उस समय की बोली के व्याकरण अनुसार टीका लिखने की ये नई पद्धति है। समय–समय मुताबक विद्वान–गण मुझसे रह गई कमियों की शुद्धि–पड़ताल करके इस नई लीह के काम को सफ़ल करने में सहायक होने की कृृपा करते ही रहेंगे।

व्याकर्णिक संधियों की सावधानी

सन् 1920 से ही मुझे यकीन सा बन बया था कि प्रकृति के साधारण नियमों के अनुसार ही श्री गुरू ग्रंथ साहिब जी की बाणी की बोली भी वैसे ही किसी खास व्याकरण की लीहों पर है, जिस तरह हरेक समय की बोली विशेष व्याकरण के अनुसार होती है। सो ये सारा टीका लिखते हुए मैंने पुरानी पंजाबी के उस व्याकरण को आँखों के सामने रखा है। पाठकों की सहूलत के लिए मैंने टीके में पुरानी पंजाबी की व्याकरण की हरेक उलझन व कठिनाई को हल करने का प्रयत्न किया है। पर इसकी पूरी सफलता तभी संभव है जब पाठक स्वयं भी कुछ प्रयास करें। पुरानी पंजाबी के शब्दों के जोड़ आजकल की पंजाबी के जोड़ों से काफ़ी विलक्षण हैं। इस वास्ते गुरुवाणी को पढ़ने व लिखने के समय पाठकों को ये आदत बनानी पड़ेगी कि शब्द–जोड़ों का खास ख्याल रहे। इन जोड़ों (संधियों) में ही पुरानी पंजाबी की व्याकरण है। इस पे ध्यान दिए बग़ैर गुरुबाणी की सही सूझ असंभव है। उदाहरण के तौर पे ‘जपु जी’ में देखें;

सुणिअै, सुणीअै

सुणिअै सतु संतोखु गिआनु॥ (पउड़ी 10)

गावीअै सुणीअै मनि रखीअै भाउ॥ (पउड़ी 5)

भगति, भगत

असंख भगत, गुण गिआन वीचार॥ (पउड़ी 17)
विणु गुण कीते, भगति न होय॥ (पउड़ी 21)

ते, तै

तिस ते होए लख दरीआउ॥ (पउड़ी 16)
आखहि गोपी तै गोविंद॥ (पउड़ी 26)
(तै= अते= और)

ऐसे अनेकों उदाहरण दिए जा सकते हैं। अगर पाठक सज्जनों ने श्री गुरू ग्रंथ साहिब जी की बाणी के शब्द–जोड़ों को देखने और पहचानने की आदत ना बनाई तो मेरी की हुई मेहनत उन्हें पूरा लाभ नहीं पहुँचा सकेगी।

....

भूमिका सम्बंधी


श्री गुरू ग्रंथ साहिब जी की बाणी को विभिन्न पहलुओं से देखने–विचारने की ज़रूरत पड़ती है। कई किस्म के लेख लिखने की जरूरत पड़ेगी, इस तरह ये भूमिका बहुत बड़ी हो जाएगी।

10 दिसम्बर 1961

शहीद सिख मिशनरी कालेज

रणजीतपुरा, अमृतसर


नोट: दसवें भाग में देने की जगह सभी भागों में लेखों का बांट दिया गया है।


तीसरा प्रकाशन:

मैं अपने स्नेही पाठकों का धन्यवाद करता हूँ कि उन्होंने मेरी इस मेहनत से प्यार करके संस्करण का तीसरा प्रकाशन पेश करने का मौका दिया है। मैं ‘राज पब्लिशर्स’ का भी धन्यवाद करता हूँ कि वे इस टीके के प्रकाशन में काफी दिलचस्पी ले रहे हैं।

साहिब सिंह
c/o डाक्टर दलजीत सिंह,M.S.
494– अजीत नगर, नया पटियाला।
जनवरी 1972


श्री गुरू ग्रंथ साहिब जी की आंतरिक संरचना

श्री गुरू ग्रंथ साहिब जी के शुरू में सबसे पहले ‘मूल मन्त्र’ है जो ‘गुर प्रसादि’ पे समाप्त हो जाता है। इस के आगे सबसे पहली बाणी ‘जपु’ है, जो गुरू नानक देव जीकी उच्चारित है। इसमें 38 पउड़ियां हैं, 2 श्लोक भी हैं; एक शुरू में, और, एक आख़ीर में। इस बाणी का सवेरे पाठ करने की हिदायत है।

इससे अगली बाणी के दो हिस्से हैं– ‘सोदरु’ और ‘सोपुरखु’। ‘सोदरु’ में 5 शबद् (सिख परम्परा में एक शबद का मतलब गुरुवाणी की एक संपूर्ण रचना से है) हैं, और ‘सोपुरखु’ में 4 शबद्। ये बाणी शाम के समय पढ़ी जाती है इसे ‘रहिरासि’भी कहते हैं।

इससे आगे ‘सोहिला’ है, इसमें 5 शबद् हैं। रात को सोने के समय इसका पाठ करने की हिदायत है। आगे बाणी रागों के अनुसार दर्ज है। निम्नलिखित 31 राग हैं:

सिरीराग, माझु, गउड़ी, आसा, गूजरी, देवगंधारी, बिहागड़ा, वडहंस, सोरठि, धनासरी, जैतसरी, टोडी, बैराड़ी, तिलंग, सूही, बिलावल, गौंड, रामकली, नट नारायण, माली गऊड़ा, मारू, तुखारी, केदारा, भैरउ, बसंत, सारंग, मलार, कानड़ा, कलिआण, प्रभाती, जैजावंती॥

रागों के ख़त्म होने पे नीचे दी हुईं और बाणियां दर्ज हैं:

श्लोक सहस कृति महला 1--------------4 (सहस कृति अर्थात संस्कृति)

श्लोक सहस कृति महला 5-------------67

गाथा महला 5---------------------------24

फुनहे महला 5---------------------------23

चउबोले महला 5------------------------11

श्लोक भगत कबीर जी-----------------243

श्लोक शेख फ़रीद के-------------------130

सवये श्री मुखवाक् महला 5------------20 (सवये अर्थात सवैये)

सवये 11भट्टों के -----------------------123

श्लोक वारां ते वधीक--------------------152

(महला 1 – 33, महला 4–30)

(महला 3 – 67, महला 5 –22)

श्लोक महला 9-------------------------47

मुंदावणी महला 5-----------------------1

रागमाला


रागों में बाणी की तरतीब

हरेक राग में बाणी की तरतीब का वेरवा आम तौर पे इस प्रकार है:

शबद्, अष्टपदियां, छंत, वार और भक्तों के शबद्।

ये शबद्, अष्टपदियां, छंद आदि भी खास क्रमानुसार दर्ज हैं– पहला गुरू नानक देव जी का, फिर गुरू अमरदास जी,गुरू रामदास जी और आखिर में गुरू अर्जुन साहिब जी के। श्री गुरू अंगद साहिब जी के शबद् नहीं हैं, सिर्फ श्लोक ही हैं, जो कई ‘वारों’ की पउड़ियों के साथ दर्ज हैं। गुरू तेग बहादुर जी दे ‘शबद्’ जिस ‘राग’ में हैं, वहाँ वह क्रमानुसार गुरू अर्जुन साहिब जी के शबदों के पीछे दर्ज हैं।

सारे ‘शबद’ की समाप्ति उपरांत इसी तरतीब में अष्टपदियां दर्ज हैं। गुरू तेग बहादुर साहिब जी की कोई अष्टपदी नहीं है। इसी तरह फिर ‘छंत’ दर्ज किए गए हैं।

अंक

गुरू ग्रंथ साहिब को पढ़ के देखो। जगह–जगह पे आपको अंक (हिंदसे) दिखेंगे। इन अंको का भी खास महत्व है। ये अंक दो किस्म के हैं। हरेक शबद्, अष्टपदी व छंद ‘बंदों’ में बटा हुआ है। गुरू ग्रंथ साहिब में इन ‘बंदों’ के वास्ते लफ़ज ‘पदे’ इस्तेमाल किया गया है। आम तौर पे हरेक ‘बंद’ की दो ‘तुकें’ (लाईनें) होती हैं। पर कहीं–कहीं तीन व कई जगहों पर चार लाईनों वाले ‘बंद’ भी मिलते हैं।

एक ‘अंक’ तो वो हैं जो इन ‘बंदों’ की गिनती बताने के लिए हैं, जैसे;

आसा महला५॥ जा तूं साहिबु ता भउ केहा, हउ तुधु बिनु किसु सालाही॥

एक तूं ता सभ किछु है, मै तुधु बिनु दूजा नाही॥1॥ बाबा बिखु देखिआ संसारु॥ रखिआ करहु गुसाई मेरे, मै नामु तेरा आधारु॥1॥ रहाउ॥ जाणहि बिरथा सभा मन की, होर किस पहि आखि सुणाइऐ॥ विणु नावै सभु जगु बउराइआ, नामु मिलै सुखु पाइअै॥2॥ किआ करीअै किसु आखि सुणाईअै, जि कहणा सु प्रभ जी पासि॥ सभु किछु कीता तेरा वरतै, सदा सदा तेरी आस॥3॥ जे देहि वडिआई ता तेरी वडिआई इतु उतु तुझहि धिआउ॥ नानक के प्रभ सदा सुख दाते, मै ताणु तेरा इकु नाउ॥4॥7॥46॥

इस शबद् के 4 ‘बंद’ हैं। हरेक ‘बंद’ के आखिर में उसकी बिनती का अंक है। ये ‘अंक’ शबद् की आंतरिक बनतर (संरचना) वास्ते है।

दूसरी किस्म के अंक वो हैं, जो शबदों अष्टपदियों आदि की गिनती के लिए हैं। जैसे, उपरोक्त शबद् के अंक 7 और 46 हैं। आसा राग में यहां तक गुरू अर्जुन साहिब के कुल 46 शबद् हैं। पर ये शबद् अलग–अलग ‘घरों’ में गाए जाने वाले हैं। ‘घर’ की बाँट अनुसार ये 7 शबद् ‘घर 6’ के हैं। यहां तक के शबदों की गिनती का वेरवा इस प्रकार है;

आसा महला ५ घर 2––34+3-----37

आसा महला ५ घर 3--------------01

आसा महला ५ घर 5--------------01

आसा महला ५ घर 6--------------07

जोड़----------------------------------46

(देखो 1430सफ़े वाली बीड़ पन्ना 370 से 382 तक)

हर एक सत्गुरू जी के अष्टपदियों आदि की गिनती अलग भी दी गई है। तथा सभी गुरू साहिबानों के शबद् मिला के इकट्ठा जोड़ भी दिया गया है; जैसे:

सोरठि महला १---------------12

सोरठि महला ३---------------12

सोरठि महला ४---------------09

सोरठि महला ५---------------94

सोरठि महला ९---------------12

जोड़--------------------------139

नोट: ये आखिारी अंक 139 सारे ही शबदों का जोड़ बताता है।


इन ‘अंकों’ का मतलब–

कहीं कहींगुरू अर्जुन साहिब जी ने स्वयं ही इन ‘अंकों’ का मतलब समझा दिया है। और ये हिदायत हमने हर जगह इस्तेमाल कर लेनी है। मिसाल के तौर पे;

1430सफ़े वाली बीड़ के पन्ना 64, महले पहले की 17 अष्टपदियों की समाप्ति पे अंक 17 इस्तेमाल करके, आगे लिखा है– ‘महले पहिले सतारह अष्टपदीयां’।

पन्ना 96, राग माझ, चउपदे महला 4 की समाप्ति पर अंक 7 लिख के आगे लिखा है–‘सत चउपदे महले चउथे के’।

पन्ना 228, राग गउड़ी। 16 अष्टपदियों के आखिर में अंक 16 दे के लिखा है– ‘सोलह अष्टपदीआं गुआरेरी गउड़ी कीआं’।

पन्ना 330, राग गउड़ी। कबीर जी के शबदों के आखीर पे अंक 35 लिख के– ‘गउड़ी गुआरेरी के पदे पैंतीस’।


इन ‘अंकों’ का लाभ

कोई शबद् ढूंढ़ने में मदद देने के अलावा इन ‘अंकों’ का लाभ ये भी है कि श्री गुरू ग्रंथ साहिब में कोई कम–ज्यादा नहीं किया जा सकता। जिन लोगों ने लिखती बीड़ों में कोई बढ़ोतरी की है, वह मुंदावणी महला 5 और सलोक महला 5 के आगे ही कर सके हैं।


खास–खास बाणियां

आम तौर पे हरेक राग में शबद्, अष्टपदियां व छंद ही हैं, पर इनके अलावा निम्नलिखित और खास–खास बाणियां भी हैं–


सिरी राग (श्रीराग) में:

पहरे–महला १,४ और ५ के। ये पहरे ‘छंतों’ से पहले दर्ज हैं।

म:१–2; म:४–1; म:५–1। जोड़–4

वणजारा म: ४। ‘छंतों’ व ‘वार’ के बीच में है।


माझ राग में:

बारह माह म:५। 14 पउड़ियां। अष्टपदियों के बाद।

दिन रैणि म:५। ‘बारह माह’ व ‘वार’ के बीच।


गउड़ी राग में:

करहले म:४। अष्टपदीयां म:३ के बाद। (गिनती अनुसार ये ‘करहले’ अष्टपदियों में ही गिने गए हैं)।

बावन अखरी म:५। 57 सलोक व 55 पउड़ियां। ‘छंतों से आगे।

सुखमनी म:५। 24 सलोक व 24 अष्टपदियां। ‘बावनअखरी’ से आगे।

थिती म:५। अष्टपदियों से पीछे।


आसा राग में:

बिरहड़े म:५। अष्टपदियों से पीछे। (नोट: ये तीन ‘बिरहड़े’ अष्टपदियों में गिने गए हैं, पर इनकी चाल ‘छंतों’ वाली है)।

पटी महला १। 35 पउड़ियां। (अष्टपदियों व छंतों के बी)।

पटी महला३। 18 पउड़ियां।


वडहंस राग में:

घोड़ीआं म:४। (नोट: ये ‘छंतों’ में गिनी गयीं है) छंत म:4 के बाद।

अलहाणीआं म:१

अलहाणीआं म:३ (‘वार’ से पहले)।


धनासरी राग में:

आरती म:१। (नोट: ये ‘शबद्’ गिना गया है) शबद् म:3 पहले।


सूही राग में:

कुचजी म:१ (ये तीनों बाणियां अष्टपदियों व छंतों के बीच में है)।

सुचजी म:१

गुणवंती म:५

बिलावल राग में:

थिती म:१।

वार सत म:३।---------------अष्टपदियों से पीछे।


रामकली में:

अनंद म:३। (अष्टपदियों व छंतों के बीच)।

‘सदु’ बाबा सुंदर जी

ओअंकारु म: १। 54 पउड़ीआं (‘छंतों’ व ‘वार’ के बीच)।

सिध गोसटि म: १। 13 पउड़ीआं

अंजुलीआ म:५। अष्टपदियों के पीछे।

सोलहे म:१.22

सोलहे म:३.24 (‘वारों’ से पहले)।

सोलहे म:४.02

सोलहे म:५.14


तुखारी राग में:

बारहमाह म:१ (नोट: ये ‘छंतों’ में गिना गया है)

मिश्रित राग:

गुरू ग्रंथ साहिब में कुल 31 रागों में बाणी दर्ज है। पर कई रागों में कुछ शबद् ऐसे हैं, जो दो–दो मिले हुए रागों में गाए जाते हैं। और कई रागों की आगे और किस्में भी दी गयीं हैं। सो, श्री गुरू ग्रंथ साहिब में दिए गये रागों संबन्धी ये दोनों बातें भी जाननी ज़रूरी हैं।


राग की अलग–अलगकिस्में:

गउड़ी–

गुआरेरी, चेती, बैरागणि, पूरबी, मालवा और दॅखणी।

∙वडहंस–दॅखणी

∙बिलावल–दॅखणी

∙मारू–दॅखणी

∙प्रभाती–दॅखणी

∙रामकली–दॅखणी

नोट: पहले पाँच रागों ( गउड़ी, वडहंस, बिलावल, मारू व प्रभाती) में तो कुछ शबद्, अष्टपदियां और छंत ही ऐसे हैं जो इन गउड़ी गुआरेरी, गउड़ी चेती, गउड़ी पुरबी, गउड़ी मालवा, वडहंस दॅखणी, मारू दॅखणी आदिक रागों में मिलते हैं, पर ‘रामकली दॅखणी’ में एक लंबी बाणी है जिसका नाम है ‘ओअंकार’। सिख जनता में इसका नाम ‘दॅखणी ओअंकार’ प्रसिद्ध हो चुका है। लफ्ज ‘दॅखणी’ को ‘रामकली’ से हटा के लफ्ज ‘ओअंकार’ के साथ इस्तेमाल किया जा रहा है। यहां इस भुलेखे के निर्णय की जरूरत है।


‘दॅखणी ओअंकार’ कि ‘ओअंकार’?

लफ्ज ‘दॅखणी’ नीचे लिखे ढंगों से गुरू ग्रंथ साहिब में इस्तेमाल हुआ है:

‘गउड़ी महला १दॅखणी’–शबद् नं:5, पंना152।

नोट:. ‘गउड़ी’ की और किस्में लिखने के तरीके–

गउड़ी चेती म:१, गउड़ी गुआरेरी म:3,

गउड़ी म:३ गुआरेरी, म:३ गउड़ी बैरागणि।

वडहंस महला १ दॅखणी–अलाहणीआं नं:3 पन्ना 580

बिलावल महला १ छंत दॅखणी–छंत नं:1 पन्ना 843

मारू महला १ दॅखणी–सोलहे नं:13 पन्ना 1033

प्रभाती महला १ दॅखणी–अष्टपदी नं:4 पन्ना 1343

इसी तरह:

रामकली महला १ दॅखणी–ओअंकारु, पन्ना 929

नोट: यहाँ नीचे लिखीं बातें ध्यान देने योग्य हैं–

सिर्फ गुरू नानक साहिब ने ‘दॅखणी’ किस्म का इस्तेमाल किया है।

पन्ना 152 पे ‘गउड़ी महला १ दखणी’ का ये भाव नहीं कि शबद् नं:5 ‘दॅखणी’ किस्म का है।

पन्ना 580 पे ‘वडहंस महला १ दखणी’ का ये भाव नहीं कि ‘अलाहणी’ नं:3 ‘दॅखणी’ किस्म की है।

पन्ना 843 पे ‘बिलावल महला १ छंत दखणी’ का ये भाव नहीं कि ये ‘छंत’ नं:1 ‘दॅखणी’ किस्म का है।

पन्ना 1033 पे ‘मारू महला १ दखणी’ का ये भाव नहीं निकलता कि ‘सोलहा’ नं:13 ‘दॅखणी’ किस्म का है।

पन्ना 1343 पे ‘प्रभाती महला १ दखणी’ का ये भाव नहीं कि ‘अष्टपदी’ नं:4 ‘दॅखणी’ किस्म की है।

इसी तरह:

पन्ना 929 पे ‘रामकली महला १ दखणी ओअंकार’ का ये भाव नहीं कि बाणी ‘ओअंकार’ ‘दॅखणी’ किस्म की है।

जैसे कि ‘गउड़ी’ में हम देख आए हैं कि ‘गउड़ी गुआरेरी महला ३’ और ‘गउड़ी महला ३ गुआरेरी’ का एक ही भाव है। इसी तरह उपरोक्त सिरलेखों का भाव भी इस प्रकार है:

गउड़ी दखणी महला १,

वडहंस दखणी महला १,

बिलावल दखणी महला १,

मारू दखणी महला १,

बिलावल दखणी महला १,

प्रभाती दखणी महला १,

रामकली दखणी महला १ (ओअंकार)।

सो, बाणी का नाम ‘ओअंकार’ है। ‘दखणी ओअंकार’ नहीं। इस बाणी की पहली पउड़ी पढ़िए;

ओअंकारि ब्रहमा उतपति॥ ओअंकारु कीआ जिनि चिति॥

ओअंकारि सैल जुग भए॥ ओअंकार बेद निरमए॥

ओअंकारि सबदि उधरे॥ ओअंकारि गुरमुख तरे॥१॥

कहीं भी लफ्ज ‘दखणी ओअंकार’ नहीं है, सिर्फ ‘ओअंकार’ है। ‘बाणी’ का नाम ‘बाणी’ में से ही लिया गया है।

दो मिले हुए राग:

दो–दो मिले हुए (मिश्रित) राग निम्नलिखित अनुसार मिलते हैं:

(1) गउड़ी माझ (2) आसा काफी (3) तिलंग काफी (4) सूही काफी (5) सूही ललित (6) बिलावल गौंड (7) मारू काफी (8) बसंत हिण्डोल (9) कलिआण भोपाली (10) प्रभाती बिभास (11) राग आसा में ‘आसावरी’ भी दिया गया है।

इस तरह 31 रागों के इलावा नीचे दिए गए 6 और राग भी बरते गए हैं–– ललित, आसावरी, हिण्डोल, भोपाली, बिभास और काफी।


काफी छंद:

हमारे विद्वान जिस तरह ‘ओअंकारु’ को ‘दखणी ओअंकारु’ लिखने की गलती कर गए हैं, वैसे ही ‘काफी’ को एक ‘राग’ समझने की जगह इसे ‘छंत’ की एक किस्म समझ रहे हैं। और कहते हैं कि पंजाबी में सबसे पहले ‘काफियां’ गुरू नानक देव जी ने लिखी थीं। इस ख्याल की प्रौढ़ता के लिए वे सज्जन गुरू ग्रंथ साहिब में से शबद् का हवाला भी देते हैं।

‘काफी’ छंत या राग?

लफ्ज ‘काफी’ नीचे दिए गए शीर्षकों में मिलता है;

राग आसा घर ८ के काफी महला ४

इस शीर्षक में दो शबद् हैं। शीर्षक का लफ्ज ‘के’ व्याकरण अनुसार ‘पुलिंग बहुवचन’ है। ‘छंत’ का लफ्ज ‘काफी’ स्त्रीलिंग एकवचन होता है। लफ्ज ‘काफी’ के नीचे का अंक २ बताता है कि इस शीर्षक तहत दो शबद् हैं। अगर ये ‘काफियां’ होती तो शीर्षक में ‘के’ की जगह ‘कीआं’ होता, और ‘काफी’ की जगह ‘काफीआं’ होता। (देखें पृष्ठ 369)

आसा घर ८ काफी महला ५

इस शीर्षक के तहत 18 शबद् दर्ज हैं (पन्ना 396 से 401)। अगर लफ्ज ‘काफी’ किसी छंत का नाम होता, तो ‘काफी’ का बहुवचन ‘काफीयां’ बनता, जैसे ‘अष्टपदी’ का ‘अष्टपदीयां’ है। सो इस शीर्षक का भाव इस तरह है– आसा काफी महला ५ घरु ८।

‘आसा काफी महला १ घरु ८ अष्टपदीआं’। यहां तो कोई शक् की गुंजाइश ही नहीं रही। ‘आसा काफी’ मिश्रित राग है।

‘तिलंग महला ९ काफी’ की जगह ‘काफीआं’ होता। ये तिलंग–काफी महला ९।

‘सूही महला ९ काफी घरु १०’। इस शीर्षक तहत 3 ‘अष्टपदीयां’ हैं। अंक नं:3 की ही तरह इस का भाव है ‘सूही काफी महला १ घरु १०’।

रागु सूही महला ५ अष्टपदीयां घरु १० काफी’ यहां दो अष्टपदीआं हैं। पर लफ्ज ‘काफी’ एकवचन है। सो ये भी ‘सूही काफी’ मिश्रित राग ही है।

मारू काफी महला १ घरु २ (पन्ना 1014)। 3अष्टपदीआं हैं। लफ्ज ‘काफी’ एकवचन है। पन्ना 1019 पर शीर्षक है ‘मारू महला ५ घरु ८ अंजुलीआं’। ‘अंजुली’ एकवचन है, ‘अंजुलीआं’ बहुवचन। इसी तरह पन्ना 1014 पे लफ्ज ‘काफी’ से बहुवचन ‘काफीआं’ होता है।

इस प्रकार, गुरू ग्रंथ साहिब जी में लफ्ज ‘काफी’ राग काफी वास्ते है, छंत वास्ते नहीं।


बाणी का विवरण:

31 रागों में से बाणी:

---------------------शबद्------अष्टपदीआं-----छंत----------जोड़
महला १–----------209----------123----------25----------357
महला ३–----------172----------79----------19----------270
महला ४–----------264----------58----------38----------360
महला ५–----------1322--------45----------63----------1430
महला ९–----------59---------------------------------------59
कुल जोड़---------2026---------305--------145-------2476


वारें:

श्री गुरू ग्रंथ साहिब में कुल 22 वारें हैं–

गुरू नानक देव जी की– माझ, आसा, मलार में--------------------------------------3

गुरू अमरदास जी की–गुजरी, सूही,रामकली, मारू में–-------------------------------4

गुरूरामदासजी की–सिरीराग,गउड़ी,बिहागड़ा,वडहंस,सोरठि,बिलावल,सारंग,कानड़ा में–---

गुरू अर्जुन साहिब जी की– गउड़ी,गुजरी,जैतसरी, रामकली, मारू,बसंत–--सत्ते बलवंड की---1

जोड़:------------------------------------------------------------------------------------22


रागों के अनुसार ‘वारों’ का विवरण:

गउड़ी---------------2

गुजरी--------------2

रामकली-----------3

मारू---------------2

जोड़---------------9


बाकी नीचे लिखे 13 रागों में एक–एक ‘वार’:

सिरीराग, माझ, आसा, बिहागड़ा, वडहंस, सोरठि, जैतसरी, सूही, बिलावल, बसंत, सारंग, मलार और कानड़ा =13

नोट: सत्ते बलवंड की ‘वार’ और राग बसंत की ‘वार’ के अतिरिक्त हरेक ‘वार’ की पउड़ीयों के साथ पहले पाँच गुरू साहिबान के शलोक भी दर्ज हैं।


भक्तों की बाणी:

गुरू ग्रंथ साहिब के 31 रागों में से 22 रागों में भक्तों की बाणी है। भक्तों के सारे शबद् 349 हैं, और भगत–बाणी में 3 शबद् गुरू अर्जुन साहिब जी के भी हैं। कुल जोड़ 352 है।

विवरण:
कबीर जी----------224 . . . . . . . . भीखन जी----------2
नामदेव जी----------61 . . . . . . . . सूरदास जी---------1 (सिर्फ तुक/लाइन)
रविदास जी---------40 . . . . . . . . परमानन्द जी-------1
त्रिलोचन जी----------4 . . . . . . . . सैण जी--------------1
फरीद जी-------------4 . . . . . . . . .पीपा जी-------------1
बैणी जी--------------3 . . . . . . . . .सधना जी-----------1
धन्ना जी-------------3 . . . . . . . . .रामानन्द जी--------1
जैदेव जी--------------2 . . . . . . . .गुरू अर्जुनदेव जी-----3
जोड़:------------------------------352

शबदों के इलावा गउड़ी राग में कबीर जी की 8 और बाणीयां दर्ज हैं–
बावन अखरी
पंद्रह थिती
सत् वार

कबीर जी व फरीद जी के श्लोकों का संग्रह भी हैं:
कबीर जी –243 (इन श्लोकों में गुर–व्यक्तियों के भी कुछ श्लोक हैं)।
फरीद जी –130
भट्ट और बाबा सुंदर जी–
बबा सुंदर जी की बाणी ‘सदु’ रामकली में है = 6 पउड़ीयां।

निम्नलिखित भट्टों के सवैये गुरू ग्रंथ साहिब में दर्ज हैं:
कलसहार
जालप
कीरत
भिखा
सल
भल
नल
बल
गयंद
मथुरा
हरिबंस


लफ्ज ‘महला’ का उच्चारण

सन् 1931 में रोजाना अखबार ‘अकाली’ के एक अंक में मैंने इस संबंधी एक लेख लिख के भेजा, तो एक आजकल के पढ़े–लिखे विद्वान मित्र ने मुझे एक चिट्ठी लिखी कि लफ्ज ‘महला’ का उच्चारण ‘महल्ला’ करना चाहिए, क्योंकि गुरू ग्रंथ साहिब ‘सचखण्ड’ है, जहाँ ‘महल्ले’ ‘घर’ ‘पउड़ीआं’ (सीढ़ीयां) होना कुदरती बात है।

सो लफ्ज ‘महला’ का जो ‘महल्ला’ उच्चारण चल पड़ा है, इसका असल कारण ये प्रतीत होता है कि शीर्षक के लफ्ज ‘महला’ के साथ ही आम तौर पे लफ्ज ‘घर’ भी लिखा मिलता है। और घरों, मुहल्लों के संबन्ध को हर कोई जानता ही है। इसलिए सबसे पहले ये समझने की आवश्यक्ता है कि लफ्ज ‘घर’ के इस्तेमाल के क्या अर्थ हैं।

सिरी राग की भगत–बाणी में एक शीर्षक इस प्रकार से लिखा मिलता है– सिरी राग॥ कबीर जीओ का॥ एकु सुआनु कै घरि गावणा॥

यहाँ, आखिरी लाइन ‘एकु सुआनु कै घरि गावणा’ को ध्यान से पढ़ने–समझने की जरूरत है। लफ्ज ‘कै घरि’ का मतलब है ‘के घर में’। शब्द ‘कै’ व्याकरण के अनुसार ‘संबन्धक’ है। इससे पहले कोई ऐसा नाम चाहिए जिससे इस संबन्धक ‘कै’ का ‘संबन्ध’ है। यहाँ इससे पहले लफ्ज ‘सुआनु’ है। पर अगर लफ्ज ‘सुआनु’ के साथ लफ्ज ‘कै’ का संबंध होता तो इसके आखीर में (ु) मात्रा नहीं हो सकती थी, जैसे;

‘दीवा मेरा एकु नामु, दुखु, विचि पाइआ तेलु’– इस लाइन के लफ्ज ‘विचि’ का संबंध लफ्ज ‘दुखु’ के साथ नहीं हो सकता।

‘दासु कबीरु तेरी पनह समाना। भिसतु नजीकि राखु रहमाना’

यहाँ संबंधक ‘नजीकि’ का संबंध लफ्ज ‘भिसतु’ के साथ नहीं हो सकता, क्योंकि शब्द ‘भिसतु’ के आखिर में (ु) कायम है।

से, ‘एकु सुआनु कै घरि गावणा’ के लफ्ज ‘कै’ के साक्ष संबंध रखने वाले ‘नाम’ की कहीं और तलाश करनी होगी। इसी ही राग में गुरू नानक साहिब का शबद् नंबर 29 (पन्ना24 पे) ऐसे दर्ज है–

सिरी रागु महला १ घर ४॥ एकु सुआनु दुइ सुआनी नाल....

उस शीर्षक के इस शबद् की पहली लाइन को आमने–सामने रख के पढ़ने से हम सहज ही शीर्षक के हम ये अर्थ कर सकते हैं – कबीर जी के उस शबद् को उस शबद्के ‘घर’ में गाना है जिसकी पहली लाइन है ‘एकु सुआनु दुइ सुआनी नालि’। इस शबद् का ‘घरु ४’ है, सो कबीर जी का शबद् भी ‘घर ४’ में ही गाना है।

कबीर जी के शबद् के शीर्षक की जगह ‘एकु सुआनु कै घरि गावणा’ क्यों लिखा है – इस घुंडी को समझने के लिए मेरी पुस्तक ‘गुरमति प्रकाश’ में पढ़ो पृष्ठ 35।

उपरोक्त प्रमाण से हमने ये समझ लिया है कि लफ्ज ‘घर’ का संबंध ‘गाने’ से है, लफ्ज ‘महला’ से नहीं।

इसी तरह–

सिरी राग में भगत बेणी जी के शबद् के शुरू में भी बतौर शीर्षक यूँ लिखा है–

सिरी रागु बाणी भगत बेणी जीउ की॥ पहरिआं के घरि गावणा॥

किस ‘घर’ में गाना है? उस शबद् के घर में जिसका शीर्षक ‘पहरे’ है। वह शीर्षक यूँ है– सिरी राग महला १ घर १

ये दोनों प्रमाण ये सिद्ध करने के लिए काफी हैं लफ्ज का संबंध सिर्फ ‘गाने’ से है, लफ्ज ‘महला’ के साथ इसका कोई भी संबंध नहीं पड़ता।

पाठकों की दिलचस्पी व और ज्यादा तसल्ली के वास्ते ये बात बतानी भी मजेदार होगी कि शब्द ‘घर’ सिर्फ ‘महला’ के साथ ही नहीं आता, भक्तों के शबदों के शीर्षकों में भी मिलता है; जैसे कि,

भैरउ कबीर जीउ घरु१

भैरउ कबीर जीउ अष्टपदी घरु २

भैरउ नामदेव जी घरु १

भैरउ नामदेव जी घरु २

तो, ये किसी भी ‘महले’ की बाँट में नहीं आते। अगर श्री गुरू ग्रंथ साहिब ‘सचखण्ड’ है, और महल्ले व घरों में बाँटा हुआ है तो भक्तों के घर किस महल्ले में गिने? सो, ये लफ्ज ‘महला’ महल्ला नहीं है। सिरी राग में गुरू नानक साहिब के शबद् नंबर 6 और 12 के शीर्षक इस प्रकार हैं – सिरी रागु महलु १ (लफ्ज ‘महलु’ के आखिर में (ु) मात्रा है। )

अगर लफ्ज ‘महला’ को ‘महल्ला’ पढ़ना होता तो लफ्ज ‘महलु’ को ‘महल’ पढ़ना ठीक होता, इस तरह ‘महल्ला’ और ‘महल्ल’ दो भिन्न–भिन्न चीजें बन जाती हैं। महल – एक बड़ा मकान, महल्ला – वह जगह कई मकान इकट्ठे बने हुए हों। इस तरह, ‘महला’ का उच्चारण ‘महल्ला’ नहीं है, और इसका कोई भी संबंध लफ्ज ‘घर’ से नहीं है।

तो फिर, इस शब्द का उच्चारण कैसे करना है?

लफ्ज ‘महला’ सिर्फ शीर्षकों में ही नहीं इस्तेमाल हुआ है, बाणी के बीच मे भी कई बार आया है; जैसेकि–

फरीदा ‘महल’ निसखण रहि गए वासा आइआ तलि।
‘महला’ अंदरि होदीआ, हुणि बहणि न मिलनि हदूरि।
कहा सु घर दर मंडप ‘महला’ कहा सु बंक सराई।
‘महल’ कुचजी मड़वड़ी काली मनहु कुसुध।
‘महला’ मंझि निवासु सबदि सवारीआ।
महली ‘महलि’ बुलाइअै, सो पिरु रावै रंगि।
महरमु ‘महल’ ना को अटकावै।

इन सभी जगह लफ्ज ‘महल’ या ‘महला’ को उसी तरह पढ़ते हैं, जैसे नीचे लिखी लाइन में लफ्ज ‘गहला’ को–

‘गहला रूहु ना जाणई, सिरि भी मिटी खाइ’

अक्षर ‘ह’ और ‘ल’ के ऊपर ( ॅ) अद्धक लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। तथा, इसी तरह शीर्षक के लफ्ज ‘महला’ को पढ़ना है।

लफ्ज ‘महला’ के साथ इस्तेमाल किए गए अंकों १,२,३,४,५,९ का उच्चारण–

इस अंक को एक, दो, तीन, चार, पाँच, व नौ पढ़ना गलत है। गुरू ग्रंथ साहिब में नीचे लिखी जगहों पर इशारे के तौर पे हिदायत मिलती है–

सिरी रागु महला पहिला १ (पन्ना14) अंक १ को पढ़ना है, ‘पहिला’।

गउड़ी गुआरेरी महला चउथा ४ (पन्ना163) अंक ४ को पढ़ना है, ‘चौथा’।

वडहंस महला ३ तीजा (पन्ना 582)

सोरठि महला ४ चउथा (पन्ना 605)

सोरठि महला १ दुतुकी पहिला (पन्ना 636)

धनासरी महला ३ तीजा (पन्ना 664)

बसंत महला ३ तीजा (पन्ना 1169)

बस, इस इशारे मात्र हिदायत को हम हर जगह इस्तेमाल करके इन अंकों को पहला, दूजा (दूसरा), तीसरा, चौथा, पाँचवां व नौवाँ पढ़ना है।

नोट: ये अंक सिर्फ लफ्ज ‘महला’ के साथ ही नहीं मिलते, लफ्ज ‘घर’ के साथ भी मिलते हैं। उनको भी इसी हिदायत मुताबिक ही पढ़ना है। एक सज्जन मुझे आ के कहने लगे कि अगर लफ्ज ‘महला’ के अंकों की तरह ‘घर’ के अंकों का उच्चारण किया गया तो ‘गुरू’ के साथ ‘तुल्लता’ हो के गुरू की निरादरी होगी। गुरू की निरादरी इसमें कैसे हो जाती है – ये भेद तो एतराज करने वाले उस सज्जन को ही पता होगा, पर आदर समझें या निरादरी, सत्गुरू जी स्वयं ही ये तरीका सिखा गए हैं, देखिए;

(पन्ना23) सिरी राग महला १ घर २ दूजा ( अंक २ को ‘दूजा’ पढ़ना है।

(पन्ना524) गूजरी भगतां की बाणी॥ श्री कबीर जीउ का चउपदा घर २ दूजा।

(पन्ना 661) धनासरी महला १ घर दूजा।

तो, बात भी सीधी और साफ है। हर जगह पर ‘घरु’ एकवचन है, हर जगह पर अंत में (ु) मात्रा है। इस वास्ते इसके अंक १,२,३,४,५ आदिक को पहला, दूजा (दूसरा), तीसरा, चौथा, पाँचवां आदिक ही पढ़ना पड़ेगा। गुरू ग्रंथ साहिब में सतारहवें ‘घर’तक जिकर आता है। जिनके हाथ में गुरुद्वारों की बागडोर है उनका फर्ज है कि सिख रागियों में से राग की इन गहराईयों को ग़ायब ना होने दें।

लफ्ज ‘महला’ के अर्थ–

शीर्षकों में लफ्ज ‘महला’ अनेकों बार इस्तेमाल हुआ है। ये लफ्ज निरर्थक नहीं हो सकता, इसका जरूर कोई सार्थक अर्थ होना चाहिए। जो सज्जन इसे ‘महल्ला’ पढ़ रहे हैं, वे अब तक इसका कोई पुख्ता अर्थ नहीं बता सकते। और, ये हम पहले ही देख चुके हैं कि लफ्ज ‘घर’ से इसका कोई मेल नहीं बनता।

कई पुराने संप्रदाई विद्वान सज्जन इसे संस्कृत का लफ्ज ‘महिला’ समझते हैं, जिसका अर्थ ‘स्त्री’ है। वे सज्जन अपने इस ख्याल की पुष्टि में ये दलील देते हैं कि सत्गुरू जी ने स्वयं को प्रभू–पति की ‘स्त्री’ समझ के बाणी लिखी है, इसलिए शीर्षक में स्वयं को ‘महिला’ (स्त्री) कहा है। पर ये अर्थ व्याकरण की कसवटी पे पूरा नहीं उतरता। हम पीछे देख आए हैं कि इस लफ्ज ‘महला’ के साथ के अंक का सही तरीके से उच्चारण का ढंग सिखाने के लिए सत्गुरू जी ने स्वयं ही सात जगहों पे हिदायत कर दी है कि अंक १ के वास्ते ‘पहिला’, अंक ३ के वास्ते ‘तीजा’, अंक ४ वास्ते लफ्ज ‘चौथा’ इस्तेमाल करना है। पर, लफ्ज ‘पहिला, तीजा, चौथा’ पुलिंग हैं, और लफ्ज ‘महिला’ (स्त्री) स्त्री–लिंग है। अगर शीर्षक वाला लफ्ज ‘महला’ स्त्रीवाचक होता, तो अंक १,३,४ वास्ते लफ्ज पहिली, तीजी, चौथी इस्तेमाल करते। इसी प्रकार ‘आसा दी वार’ के शीर्षक ‘शलोक भी महले पहिले के लिखे’, की जगह ‘शलोक भी महिला पहिली के लिखे’ होता। भट्टों के सवैयों में हम नीचे लिखे शीर्षक पढ़ते हैं–

सवईए महले पहिले के १

सवईए महले दूजे के २

सवईए महले तीजे के ३

सवईए महले चउथे के ४

सवईए महले पंजवें के ५

अगर लफ्ज ‘महला’ संस्कृत का लफ्ज ‘महिला’ होता, तो इन शीर्षकों की जगह भी हम शीर्षक कुछ यूँ देखते–

सवईए महिला पहिली के १

सवईए महिला दूजी के २

सवईए महिला तीजी के ३

सवईए महिला चउथी के ४

सवईए महिला पंजवीं के ५

नोट:‘गंडा’ ‘झंडा’ आदि लफ्ज पुलिंग हैं। इनके साथ कोई संबंधक आए तो इनकी आखिरी (ा) मात्रा ( े) में बदल जाती है; जैसे गंडे की किताब, झंडे की दुकान। लफ्ज ‘कमला, बिमला’ स्त्रीलिंग हैं; संबंधकलगने से भी इनके रूप में कोई फर्क नहीं पड़ता; जैसे कमला की कलम, बिमला का कुर्ता। इसी तरह अगर लफ्ज ‘महला’ स्त्रीवाचक होता तो, ‘महला’ से ‘महले’ ना बनता; श्लोक भी ‘महले पहिले के’ ना होते।

सो, इसमें कोई शक नहीं है कि शीर्षक वाला लफ्ज ‘महला’ संस्कृत वाला लफ्ज ‘महिला’ नहीं है और इसका अर्थ भी ‘स्त्री’ नहीं।

अर्थ अनुसार चार हिस्से

गुरबाणी में इस्तेमाल हुए शब्द ‘महल’ व ‘महला’ के अर्थ अनुसार प्रमाणों का विभाजन चार हिस्सों में किया जा सकता है:

‘महला’ – स्त्री

‘महल’ कुचजी मड़वड़ी काली मनहु कुसुध।

शलोक महला १ मारू की वार म:३ (पन्ना 1088)

‘महलु’ – घर, ठिकाना, वह आत्मक अवस्था जहाँ प्रमात्मा साक्षात हो जाता है:

खोजत खोजत दुआरे आइआ॥ तां नानक जोगी ‘महलु’ घरु पाइआ

॥4॥12॥ रामकली म:५ (पं: 886)

खोलि किवारा ‘महलि’ बुलाइआ॥

रामकली म:५

(महलि – महल में)

गुरप्रसादि को इह ‘महलु’ पावै ॥ रामकली म:५ (पं: 889)

दुबिधा राते ‘महलु’ न पावहि॥7॥4॥ रामकली म:१ (पं:904)

अंतरि बाहरि एकु पछाणै इउ घरु ‘महलु’ सिञ्यापै॥ म:१ ओअंकार (पंन्ना:930)

‘महल’, ‘महला’– बड़ी बड़ी इमारतें, पक्के घर।

दाता दानु करै तह नाही, ‘महल’ उसारि न बैठा॥2॥1॥

रामकली म:१ (पं:902)

गढ़ मंदर ‘महला’ कहा, जिउ बाजी दीबाणु॥42॥ ओअंकारु (पं:936)

आपे कुदरति साजिअनु करि ‘महल’ सराई॥1॥ रामकली की वार म:३ (पं:947)

‘महला’– काया, शरीर।

सबदे पतीजै अंकु भीजै, सु महलु ‘महला’ अंतरे॥8॥5॥ सूही छंत म:१ (पं:767) महला अंतरे – सभी शरीरों में।

‘महला’ अंदरि गैर महलु पाए, भाणा बूझि समाहा हे॥14॥5॥14॥ मारू म:३ सोलहे (पंन्ना:1058)

महला अंदरि – शरीरों में।

गउड़ी म:५॥ ओह अबिनासी राइआ॥1॥

निरभउ संगि तुमारै बसते, इह डरनु कहां ते आइआ॥2॥

एक ‘महलि’ तूँ होहि अफारो, एक ‘महलि’ निमानो॥

एक ‘महलि’ तूँ आपे आपे, एक ‘महलि’ गरीबानो॥1॥

एक ‘महलि’ तूँ पंडितु बकता,एक ‘महलि’ खलु होता॥

एक ‘महलि’ तूँ सभु किछु ग्राहजु, एक ‘महलि’ कछू नलेता॥2॥5॥126॥ (पंन्ना 206)

महलु–शरीर। महलि – शरीर में।

सत्गुरू जी की लिखी हुई बाणी में नाम केवल ‘नानक’ आता है। इस र्निणय के लिए कि कौन सी बाणी किस गुरू–व्यक्ति की है, लफ्ज ‘महला’ बर्ता गया है। अंक नं: 4 में दिए गए प्रमाणों के मुताबिक इस लफ्ज ‘महला’ का अर्थ है ‘शरीर’।

‘महला पहिला’ का अर्थ है– गुरू नानक का पहला शरीर

‘महला दूजा’ का अर्थ है– गुरू नानक का दूसरा शरीर (गुरू अंगददेव जी)

‘महला तीजा’ का अर्थ है– गुरू नानक का तीसरा शरीर (गुरू अमरदास जी)

सत्ते बलवण्ड की वार में बलवण्ड लिखता है–

लहणे दी फेराईअै, नानका दोही खटीअै॥ जोति ओहा जुगति साइ, सहि ‘काइआ’ फेरि पलटीअै॥2॥ (पंन्ना 966)

भाई गुरदास जी भी लिखते हैं–

अरजनु ‘काइआ’ पलटि कै, मूरति हरि गोबिंद सवारी॥

उच्चारण

श्री गुरू ग्रंथ साहिब जी की बाणी में लफ्ज ‘रहत’, ‘बहरे’, ‘बहले’, ‘सहजे’, ‘गहला’, ‘टहल’, ‘महरेर’ और इस तरह के और भी कई शब्द आते हैं, जिनमें अक्षर ‘ह’ आता है। जैसे इन शब्दों का उच्चारण किया जाता है वैसे ही शब्द ‘महला’ का उच्चारण करना है।

शीर्षक में कहीं–कहीं शब्द ‘महला’ की जगह शब्द ‘महलु’ भी आता है (देखें पंन्ना 16,शबद् नं: 6, और पंन्ना 18,शबद् नं: 12)। अगर लफ्ज ‘महला’ का उच्चारण ‘महल्ला’ होता, लफ्ज ‘महलु’ का उच्चारण भी ‘महल्ल’ होना था। पर, लफ्ज ‘महला’ व ‘महल’ के अलग–अलग अर्थ हैं। यो ये उच्चारण ठीक नही है।

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