श्री गुरू ग्रंथ साहिब दर्पण । टीकाकार: प्रोफैसर साहिब सिंह । अनुवादक भुपिन्दर सिंह भाईख़ेल

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हउ घोली जीउ घोलि घुमाई तिसु सचे गुर दरबारे जीउ ॥१॥ रहाउ॥

पद्अर्थ: सचे = सदा स्थिर रहने वाले।1। रहाउ।

अर्थ: मैं गुरु के दरबार से सदके हूँ कुर्बान हूँ जो सदैव अटल रहने वाला है।1। रहाउ।

भागु होआ गुरि संतु मिलाइआ ॥ प्रभु अबिनासी घर महि पाइआ ॥ सेव करी पलु चसा न विछुड़ा जन नानक दास तुमारे जीउ ॥४॥

पद्अर्थ: भागु होआ = किस्मत जाग पड़ी है। गुरि = गुरु ने। संतु = शांत मूर्ति प्रभु। अबिनाशी = नाश रहित। घर महि = हृदय (ही)। करी = मैं करता हूँ। चसा = पल का तीसवां हिस्सा। विछुड़ा = मैं बिछुड़ता हूं।4।

अर्थ: मेरे भाग्य जाग पड़े हैं, गुरु ने मुझे शांति का स्रोत परमात्मा मिला दिया है (गुरु की कृपा से उस) अबिनाशी प्रभु को मैंने अपने हृदय में ढूंढ लिया है।

हे दास नानक! (कह: हे प्रभु! मेहर कर) मैं तेरे दासों की (नित्य) सेवा करता रहूँ, (तेरे दासों से) मैं एक पल भर भी ना बिछड़ जाऊँ, एक रत्ती भर भी ना अलग होऊँ।4।

हउ घोली जीउ घोलि घुमाई जन नानक दास तुमारे जीउ ॥ रहाउ॥१॥८॥

नोट: वैसे तो साधारण तौर पर हरेक शब्द किसी प्रथाय ही हुआ करता है, ‘परथाय साखी महा पुरख बोलदे’। पर इस शब्द के साथ चिट्ठियों वाली कहानी मन घड़ंत प्रतीत होती है। चौथे बंद की तुक “भाग होआ गुरि संतु मिलाइआ” ध्यान से पढ़ें। इसका अर्थ है ‘गुरु ने संत (प्रभु) मिला दिया है। अगर कहानी ठीक होती तो कहते कि प्रभु ने गुरु मिला दिया है। उस कहानी में और भी कई कमियां हैं। यहां उनका जिक्र करना गैर जरूरी है। ये बिरह अवस्था का शब्द है, और ऐसे, और भी कई शब्द मिलते हैं। इसी ही राग में आ चुके गुरु राम दास जी के शब्द भी बिरहों अवस्था के हैं। बारंबार कहते हैं: ‘गुरु मेलहु’।

अर्थ: हे दास नानक! (कह: हे प्रभु!) मैं तेरे दासों से सदके हूँ कुर्बान हूँ।1। रहाउ।

रागु माझ महला ५ ॥ सा रुति सुहावी जितु तुधु समाली ॥ सो कमु सुहेला जो तेरी घाली ॥ सो रिदा सुहेला जितु रिदै तूं वुठा सभना के दातारा जीउ ॥१॥

पद्अर्थ: रुति = ऋतु, मौसम। सुहावी = सुखदायी। जितु = जिस में। समाली = मैं सम्हालता हूं, दिल में बसाता हूं। सुहेला = सुखदायी। घाली = सेवा में। रिदा = हृदय में। सुहेला = शांत। वुठा= वसा हुआ।1।

अर्थ: हे सभी जीवों के दाते! जब मैं तुझे अपने हृदय में बसाता हूँ, वह समय मुझे सुखदायी प्रतीत होता है। हे प्रभु! जो काम मैं तेरी सेवा के लिए करता हूँ, वह काम मुझे खुशी देता है। हे दातार! जिस दिल में तू बसता है, वह हृदय शीतल रहता है।1।

तूं साझा साहिबु बापु हमारा ॥ नउ निधि तेरै अखुट भंडारा ॥ जिसु तूं देहि सु त्रिपति अघावै सोई भगतु तुमारा जीउ ॥२॥

पद्अर्थ: नउ निधि = (दुनिया के) नौ ही खजाने। अखुट = कभी न खत्म होने वाले। अघावै = तृप्त हो जाता है।2।

अर्थ: हे दातार! तू हमारे सभी जीवों का पिता है (और सभी को दातें बख्शता है)। तेरे घर में (जगत के सारे) नौ ही खजाने मौजूद हैं, तेरे खजानों में कभी कमी नहीं आती। (पर) जिस को (अपने नाम की दात) देता है, वह (दुनिया के पदार्थों की तरफ से) तृप्त हो जाता है, और, हे प्रभु! वही तेरा भक्त (कहलवा सकता) है।2।

सभु को आसै तेरी बैठा ॥ घट घट अंतरि तूंहै वुठा ॥ सभे साझीवाल सदाइनि तूं किसै न दिसहि बाहरा जीउ ॥३॥

पद्अर्थ: सभ को = हरेक जीव। साझीवाल = तेरे साथ सांझ रखने वाले। सदाइनि = कहलवाते हैं। किसै = किसी से। बाहरा = अलग किस्म।3।

अर्थ: हे दातार! तू खुद ही जीवों को गुरु की शरण में डाल के (माया के बंधनों से) आजाद करा देता है। तू स्वयं ही जीवों को मन का गुलाम बना के जनम मरण के चक्कर में भटकाता रहता है।3।

तूं आपे गुरमुखि मुकति कराइहि ॥ तूं आपे मनमुखि जनमि भवाइहि ॥ नानक दास तेरै बलिहारै सभु तेरा खेलु दसाहरा जीउ ॥४॥२॥९॥

पद्अर्थ: गुरमुखि = गुरु की शरण पा कर। मनमुखि = मन का गुलाम बना के। जनमि = जनम (मरन के चक्कर) में। दसाहरा = प्रगट।4।

अर्थ: हे दास नानक! (कह: हे प्रभु!) मैं तुझसे कुर्बान हूँ, ये सारी जगत रचना तेरा ही प्रत्यक्ष तमाशा है।4।2।9।

नोट: अंक 2 का भाव है कि गुरु अरजन साहिब का दूसरा शब्द है। अंक 9 अब तक के सारे शबदों का जोड़ बताता है;

गुरु राम दास जी----------------07
गुरु अरजन देव जी--------------02
जोड़----------------------------09

माझ महला ५ ॥ अनहदु वाजै सहजि सुहेला ॥ सबदि अनंद करे सद केला ॥ सहज गुफा महि ताड़ी लाई आसणु ऊच सवारिआ जीउ ॥१॥

पद्अर्थ: अनहदु = (अनाहत = not produced by beating [as sound]) वह आवाज जो कोई साज बजाए बगैर ही पैदा हो रही हो, एक रस शब्द। सहजि = आत्मिक अडोलता में। सुहेला = सुखदायी। सबदि = शब्द से। सद = सदा। केल = (केलि:) खेल, आनंद। सहज गुफा = आत्मक अडोलता की गुफा। ताड़ी = समाधि।1।

अर्थ: (गुरु की कृपा से मेरे अंदर परमात्मा की महिमा का) एक रस संगीत बज रहा है। (मेरा मन) आत्मिक अडोलता में टिक के सुखी हो रहा है, गुरु के शब्द के साथ जुड़ के सदा आनंद का रंग माण रहा है।

(सतिगुरु की मेहर से मैंने) आत्मिक अडोलता-रूपी गुफा में समाधि लगाई हुई है और सबसे ऊँचे अकाल पुरख के चरणों में बढ़िया ठिकाना बना लिया है।1।

फिरि घिरि अपुने ग्रिह महि आइआ ॥ जो लोड़ीदा सोई पाइआ ॥ त्रिपति अघाइ रहिआ है संतहु गुरि अनभउ पुरखु दिखारिआ जीउ ॥२॥

पद्अर्थ: फिरि घिरि = बारंबार। ग्रिह महि = हृदय घर में। अघाइ रहिआ = तृप्त रहा है। संतहु = हे संत जनों! गुरि = गुरु ने। अनभउ = अनुभव, आत्मिक प्रकाश। पुरखु = सर्व व्यापक प्रभु।2।

अर्थ: हे संत जनों! गुरु ने (मुझे) आत्मिक प्रकाश दे के सब में व्यापक परमात्मा के दर्शन करा दिए हैं। अब (मेरा मन) मुड़ मुड़ के अंतरात्में में आ टिकता है। जो (आत्मिक शांति) मुझे चाहिए थी वह मैंने हासिल कर ली है, और (मेरा मन दुनिया की वासनाओं से) पूरी तरह से भर चुका है।2।

आपे राजनु आपे लोगा ॥ आपि निरबाणी आपे भोगा ॥ आपे तखति बहै सचु निआई सभ चूकी कूक पुकारिआ जीउ ॥३॥

पद्अर्थ: राजनु = बादशाह। निरबाणी = निर्वाण, वासना रहित। तखति = तख्त पर। सचु = सदा स्थिर रहने वाला। निआई = न्याय करने वाला।3।

अर्थ: (गुरु की कृपा से मुझे दिखाई दे गया है कि) प्रभु स्वयं ही बादशाह है और स्वयं ही प्रजा-रूप है। प्रभु वासना रहित भी है और (सब जीवों में व्यापक होने करके) स्वयं ही सारे पदार्थ भोग रहा है। वह सदा स्थिर रहने वाला प्रभु स्वयं ही तख्त पर बैठा हुआ है और न्याय कर रहा है (इसलिए सुख आए चाहे दुख आए, मेरा) सारा गिला-शिकवा खत्म हो चुका है।3।

जेहा डिठा मै तेहो कहिआ ॥ तिसु रसु आइआ जिनि भेदु लहिआ ॥ जोती जोति मिली सुखु पाइआ जन नानक इकु पसारिआ जीउ ॥४॥३॥१०॥

पद्अर्थ: तिसु = उस मनुष्य को। जिनि = जिस (मनुष्य) ने। लहिआ = ढूंढ लिया। इक = परमात्मा ही। पसरिआ = व्याप रहा है।4।

अर्थ: (गुरु की मेहर से) मैंने परमात्मा को जिस (सर्व-व्यापक) रूप में देखा है वैसा ही कह दिया है। जिस मनुष्य ने ये भेद पा लिया है उसे (उसके मिलाप) का आनंद आता है। हे नानक! उस मनुष्य की तवज्जो प्रभु की ज्योति में मिली है, उसे आत्मिक आनंद प्राप्त होता है, उसे सिर्फ परमात्मा ही सारे जगत में व्यापक दिखता हैं।4।3।10।

माझ महला ५ ॥ जितु घरि पिरि सोहागु बणाइआ ॥ तितु घरि सखीए मंगलु गाइआ ॥ अनद बिनोद तितै घरि सोहहि जो धन कंति सिगारी जीउ ॥१॥

पद्अर्थ: जितु = जिसमें। घरि = हृदय घर में। पिरि = पिर ने। सखीए = हे सखी! गइआ = गाया जा सकता है। बिनोद = खुशियां। सोहहि = शोभायमान होते हैं। तितै घरि = उसी घर में। तितु घरि = उस घर में। धन = स्त्री। कंति = कंत ने।1।

अर्थ: हे सखी! जिस हृदय घर में प्रभु पति ने (अपने प्रकाश से) अच्छे भाग्य लगा दिये हों, उसके हृदय घर में (प्रभु पति की) महिमा का गीत गाए जाते है। जिस जीव-स्त्री को पति प्रभु ने आत्मिक सुंदरता बख्श दी हो, उसके हृदय घर में आतिमक आनंद शोभते हैं, आत्मिक खुशिआं शोभती हैं।1।

सा गुणवंती सा वडभागणि ॥ पुत्रवंती सीलवंति सोहागणि ॥ रूपवंति सा सुघड़ि बिचखणि जो धन कंत पिआरी जीउ ॥२॥

पद्अर्थ: सा = वह स्त्री। सीलवंति = मीठे स्वभाव वाली। सुघड़ि = सुचज्जी (जिसका मन सुंदर घड़ा हुआ है)। बिचखणि = विलक्षण, सिआनी। कंत पिआरी = पति की प्यारी।2।

अर्थ: जो जीव-स्त्री पति प्रभु की प्यारी बन जाए, वह सब गुणों की मलिका बन जाती है। वह भाग्यशाली हो जाती है। वह (आत्मिक ज्ञान-रूपी) पुत्रवती, सु-स्वाभाव वाली और सुहाग-भाग वाली बन जाती है। उसका आत्मिक जीवन सुंदर बन जाता है। वह सुचज्जे घाढ़त वाले मन वाले व्यक्तित्व और अच्छी सूझ की मलिका बन जाती है।2।

अचारवंति साई परधाने ॥ सभ सिंगार बणे तिसु गिआने ॥ सा कुलवंती सा सभराई जो पिरि कै रंगि सवारी जीउ ॥३॥

पद्अर्थ: अचारवंति = अच्छे आचरणवाली। साई = सा ही, वही स्त्री। परधान = जानी मानी। बणे = फबते हैं। गिआने = ज्ञान से, गहरी समझ के सदके। सभराई = स+भराई, भाईयों वाली। पिर कै रंगि = पति के प्रेम में।3।

अर्थ: जो जीव-स्त्री प्रभु पति के प्रेम रंग में (रंग के) सुंदर जीवन वाली बन जाती है उसका आचरण ऊँचा हो जाता है वह (संगति में) जानी मानी जाती है। प्रभु पति के साथ गहरी सांझ के सदका सारे आत्मिक गुण उसके जीवन को संवार देते है। वह ऊँचे कुल वाली समझी जाती है। वह भाईयों वाली हो जाती है।3।

महिमा तिस की कहणु न जाए ॥ जो पिरि मेलि लई अंगि लाए ॥ थिरु सुहागु वरु अगमु अगोचरु जन नानक प्रेम साधारी जीउ ॥४॥४॥११॥

पद्अर्थ: महिमा = उपमा, बड़िआई। तिस की = उसकी। पिरि = पिया ने। अंगि = अंग से, शरीर के साथ। लाए = लगा के। थिरु = स्थिर, सदा कायम रहने वाला। वरु = पति। अगमु = अगम्य (पहुँच से परे)। अगोचरु = अ+गो+चर (गो = ज्ञानेंद्रिया, चर = पहुँच), जिस तक ज्ञानेंद्रियों की पहुँच नहीं हो सकती। साधारी = स+आधरी, आसरे वाली।4।

नोट: ‘तिस की’ में ‘तिसु’ और “तिस’ का फर्क ध्यानयोग है; यहां ‘तिसु’ में से ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘की’ के कारण हट के ‘तिस’ बना है।

अर्थ: जिस जीव-स्त्री को प्रभु पति ने अपने चरणों में जोड़ के अपने में लीन कर लिया हो, उसकी उपमा बयान नही की जा सकती। हे दास नानक! जो परमात्मा अगम्य (पहुँच से परे) है जिस तक ज्ञानेंद्रियों की पहुँच नहीं हो सकती वह उस जीव-स्त्री का सदा कायम रहने वाला सुहाग-भाग बन जाता है। उस जीव-स्त्री को उसके प्रेम का आसरा सदैव मिला रहता है।4।4।11।

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Sri Guru Granth Darpan, by Professor Sahib Singh