श्री गुरू ग्रंथ साहिब दर्पण । टीकाकार: प्रोफैसर साहिब सिंह । अनुवादक भुपिन्दर सिंह भाईख़ेल |
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Page 183 संत सभा कउ सदा जैकारु ॥ हरि हरि नामु जन प्रान अधारु ॥ कहु नानक मेरी सुणी अरदासि ॥ संत प्रसादि मो कउ नाम निवासि ॥४॥२१॥९०॥ पद्अर्थ: जैकारु = नमस्कार। संत सभा = साधु-संगत। निवासि = निवास में, घर में।4। अर्थ: (हे भाई!) साधु-संगत के आगे हमेशा सिर झुकाओ, क्योंकि परमात्मा का नाम साधु जनों (गुरमुखों) की जिंदगी का आसरा होता है, (उनकी संगति में तुझे भी नाम की प्राप्ति होगी)। हे नानक! कह: (कर्तार ने) मेरी विनती सुन ली और उसने गुरु की कृपा से मुझे अपने नाम के घर में (टिका दिया) है।4।21।90। गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥ सतिगुर दरसनि अगनि निवारी ॥ सतिगुर भेटत हउमै मारी ॥ सतिगुर संगि नाही मनु डोलै ॥ अम्रित बाणी गुरमुखि बोलै ॥१॥ पद्अर्थ: सतिगुर दरसनि = गुरु के दर्शन की इनायत से। अगनि = तृष्णा आग। निवारी = दूर कर ली। भेटत = मिलने से। संगि = संगति में। अंम्रित बाणी = आत्मिक जीवन देने वाली वाणी। गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ कर।1। अर्थ: (हे भाई!) गुरु के दीदार की इनायत से (मनुष्य अपने अंदर से तृष्णा की आग) बुझा लेता है। गुरु को मिल के (अपने मन में से) अहम् को मार लेता है। गुरु की संगति में रह के (मनुष्य का) मन (विकारों की तरफ) डोलता नहीं (क्योंकि) गुरु की शरण पड़ कर मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाली गुरबाणी उचारता रहता है।1। सभु जगु साचा जा सच महि राते ॥ सीतल साति गुर ते प्रभ जाते ॥१॥ रहाउ॥ पद्अर्थ: साचा = सदा स्थिर (प्रभु का रूप)। जा = जब। सच महि = सदा सिथर प्रभु में। सीतल = ठंडे। साति = शांति, ठंड। ते = से, के द्वारा। जाते = जान पहिचान डाली।1। रहाउ। अर्थ: (हे भाई!) जब गुरु के द्वारा प्रभु के साथ गहरी सांझ डाल लेते हैं, जब सदा सिथर प्रभु के प्रेम रंग में रंगे जाते हैं, तब हृदय ठंडा-ठार हो जाता है, तब (मन में) शांति पैदा हो जाती है, तब सारा जगत सदा स्थिर परमात्मा का रूप दिखता है।1। रहाउ। संत प्रसादि जपै हरि नाउ ॥ संत प्रसादि हरि कीरतनु गाउ ॥ संत प्रसादि सगल दुख मिटे ॥ संत प्रसादि बंधन ते छुटे ॥२॥ पद्अर्थ: संत प्रसादि = गुरु की कृपा से। बंधन ते = बंधनों से।2। अर्थ: (हे भाई!) गुरु की कृपा से मनुष्य परमात्मा का नाम जपता है, गुरु की कृपा से हरि कीर्तन गायन करता है। (इसका परिणाम ये निकलता है कि) सतिगुरु की कृपा से मनुष्य के सारे दुख-कष्ट मिट जाते हैं (क्योंकि) गुरु की मेहर से मनुष्य (माया के मोह के) बंधनों से निजात पा लेता है।2। संत क्रिपा ते मिटे मोह भरम ॥ साध रेण मजन सभि धरम ॥ साध क्रिपाल दइआल गोविंदु ॥ साधा महि इह हमरी जिंदु ॥३॥ पद्अर्थ: ते = से, साथ। साध रेण = गुरु के चरणों की धूल। मजन = स्नान। सभ = सारे।3। अर्थ: (हे भाई!) गुरु की कृपा से माया का मोह और माया खातिर भटकना दूर हो जाती है। गुरु के चरणों की धूड़ी का स्नान ही सारे धर्मों का (सार) है। (जिस मनुष्य पर गुरु के सन्मुख रहने वाले) गुरमुख दयावान होते हैं, उस पर परमात्मा भी दयावान हो जाता है। (हे भाई!) मेरी जीवात्मा भी गुरमुखों के चरणों पे वारी जाती है।3। किरपा निधि किरपाल धिआवउ ॥ साधसंगि ता बैठणु पावउ ॥ मोहि निरगुण कउ प्रभि कीनी दइआ ॥ साधसंगि नानक नामु लइआ ॥४॥२२॥९१॥ पद्अर्थ: किरपा निधि = कृपा का खजाना प्रभु। धिआवउ = मैं ध्याता हूँ। ता = तब। बैठण पावउ = मैं बैठना प्राप्त करता हूँ, मेरा जीअ लगता है। मोहि = मुझे। प्रभि = प्रभु ने।4। अर्थ: हे नानक! (कह: हे भाई!) मुझ गुणहीन पर प्रभु ने दया की, साधु-संगत में मैं प्रभु का नाम जपने लग पड़ा। गुरु की मेहर से जब मैं कृपा के खजाने, कृपा के घर का नाम स्मरण करता हूँ, साधु-संगत में मेरा जीअ लगता है।4।22।91। गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥ साधसंगि जपिओ भगवंतु ॥ केवल नामु दीओ गुरि मंतु ॥ तजि अभिमान भए निरवैर ॥ आठ पहर पूजहु गुर पैर ॥१॥ पद्अर्थ: साध संगि = साधु-संगत में। गुरि = गुरु ने। केवल = सिर्फ। मंतु = मंत्र। तजि = छोड़ के।1। अर्थ: (हे भाई!) आठों पहर (हर वक्त) गुरु के पैर पूजो। (गुरु की कृपा से जिस मनुष्यों ने) साधु-संगत में भगवान का स्मरण किया है, जिन्हें गुरु ने परमात्मा के नाम का मंत्र दिया है (उस मंत्र की इनायत से) वे अहंकार त्याग के निर्वैर हो गए हैं।1। अब मति बिनसी दुसट बिगानी ॥ जब ते सुणिआ हरि जसु कानी ॥१॥ रहाउ॥ पद्अर्थ: दुसट = बुरी। बिगानी = बेज्ञानी, बेसमझी वाली। जब ते = जब से। कानी = कानों से।1। रहाउ। अर्थ: हे भाई! जब से परमात्मा की महिमा मैंने कानों से सुनी है, तब से मेरी बुरी व बेसमझी वाली मति दूर हो गई है।1। रहाउ। सहज सूख आनंद निधान ॥ राखनहार रखि लेइ निदान ॥ दूख दरद बिनसे भै भरम ॥ आवण जाण रखे करि करम ॥२॥ पद्अर्थ: सहज = आत्मिक अडोलता। निधान = खजाने। रखि लेइ = बचा लेता है। रखे = रोक लेता है। करम = बख्शिश। करि = कर के।2। नोट: ‘भै’ शब्द ‘भउ’ का बहुवचन है। अर्थ: (हे भाई! जिस मनुष्यों ने हरि-जस कानों से सुना है) आत्मिक अडोलता, सुख, आनंद के खजाने रखने वाले परमात्मा ने आखिर उनकी सदा रक्षा की है। उनके दुख-दर्द-डर-वहिम सारे नाश हो जाते हैं। परमात्मा मेहर करके उनके जनम मरण के चक्र भी खत्म कर देता है।2। पेखै बोलै सुणै सभु आपि ॥ सदा संगि ता कउ मन जापि ॥ संत प्रसादि भइओ परगासु ॥ पूरि रहे एकै गुणतासु ॥३॥ पद्अर्थ: सभु = हर जगह। ता कउ = उस प्रभु को। परगास = प्रकाश, रौशनी। गुणतासु = गुणों का खजाना प्रभु।3। अर्थ: हे (मेरे) मन! जो परमात्मा हर जगह (सब जीवों में व्यापक हो के) स्वयं देखता है, खुद ही बोलता है, खुद ही सुनता है, जो हर वक्त तेरे अंग संग है, उसका भजन कर। गुरु की कृपा से जिस मनुष्य के अंदर आत्मिक जीवन वाला प्रकाश पैदा होता है, उसे गुणों का खजाना एक परमात्मा ही हर जगह व्यापक दिखाई देता है।3। कहत पवित्र सुणत पुनीत ॥ गुण गोविंद गावहि नित नीत ॥ कहु नानक जा कउ होहु क्रिपाल ॥ तिसु जन की सभ पूरन घाल ॥४॥२३॥९२॥ पद्अर्थ: पुनीत = पवित्र। होहु = तुम होते हो। घाल = मेहनत। पूरन = सफल।4। अर्थ: (हे भाई!) जो मनुष्य सदा ही गोबिंद के गुण गाते हैं वे महिमा करने वाले और महिमा सुनने वाले सभी पवित्र जीवन वाले बन जाते हैं। हे नानक! कह: (हे प्रभु!) जिस मनुष्य पे तू दयावान होता है (वह तेरी महिमा करता है) उसकी सारी ये मेहनत सफल हो जाती है।4।23।92। गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥ बंधन तोड़ि बोलावै रामु ॥ मन महि लागै साचु धिआनु ॥ मिटहि कलेस सुखी होइ रहीऐ ॥ ऐसा दाता सतिगुरु कहीऐ ॥१॥ पद्अर्थ: बोलावै रामु = राम नाम मुंह से निकलवाता है, परमात्मा का स्मरण कराता है। साचु = अटल। मिटहि = मिट जाते हैं। रहीऐ = जीते हैं। कहीऐ = कहते हैं।1। अर्थ: (हे भाई!) गुरु (मनुष्य के माया के मोह के) बंधन तोड़ के (उससे) परमात्मा का स्मरण करवाता है। (जिस मनुष्य पर गुरु मेहर करता है उसके) मन में (प्रभु चरणों की) अटल तवज्जो बंध जाती है। (हे भाई! गुरु की शरण पड़ने से मन के सारे) कष्ट मिट जाते हैं, सुखी जीवन वाले हो जाते हैं। सो, गुरु ऐसी ऊँची दाति बख्शने वाला कहा जाता है।1। सो सुखदाता जि नामु जपावै ॥ करि किरपा तिसु संगि मिलावै ॥१॥ रहाउ॥ पद्अर्थ: सुखदाता = आत्मिक आनंद देने वाला। जि = जो (गुरु), क्योंकि वह (गुरु)। तिसु संगि = उस (परमात्मा) के साथ।1। रहाउ। अर्थ: (हे भाई!) वह सत्गुरू आत्मिक आनंद की दाति बख्शने वाला है क्योंकि वह परमात्मा का नाम जपाता है, और मेहर करके उस परमात्मा के साथ जोड़ता है।1। रहाउ। जिसु होइ दइआलु तिसु आपि मिलावै ॥ सरब निधान गुरू ते पावै ॥ आपु तिआगि मिटै आवण जाणा ॥ साध कै संगि पारब्रहमु पछाणा ॥२॥ पद्अर्थ: निधान = खजाने। ते = से। आपु = स्वैभाव। साध कै संगि = गुरु की संगति में।2। नोट: शब्द ‘आपि’ और ‘आपु’ में फर्क पर ध्यान दें। अर्थ: (पर) परमात्मा जिस मनुष्य पर दयावान हो उसे खुद (ही) गुरु मिलाता है, वह मनुष्य (फिर) गुरु से (आत्मिक जीवन के) सारे खजाने हासिल कर लेता है। वह (गुरु की शरण पड़ कर) स्वैभाव त्याग देता है, और उसके जनम मरण का चक्र समाप्त हो जाता है। गुरु की संगति में (रह के) वह मनुष्य परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल लेता है।2। |
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Sri Guru Granth Darpan, by Professor Sahib Singh |