श्री गुरू ग्रंथ साहिब दर्पण । टीकाकार: प्रोफैसर साहिब सिंह । अनुवादक भुपिन्दर सिंह भाईख़ेल |
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Page 565 जिहवा सची सचि रती तनु मनु सचा होइ ॥ बिनु साचे होरु सालाहणा जासहि जनमु सभु खोइ ॥२॥ अर्थ: जो जीभ सदा-स्थिर हरि (के प्रेम) में रंगी जाती है वह जीभ सफल हो जाती है, (ऐसी जीभ वाले मनुष्य का) मन सफल हो जाता है, शरीर सफल हो जाता है। (हे भाई!) अगर तू सदा-स्थिर प्रभु को छोड़ के किसी और को सलाहता रहेगा, तो अपना सारा जनम गवा के (यहाँ से) जाएगा।2। सचु खेती सचु बीजणा साचा वापारा ॥ अनदिनु लाहा सचु नामु धनु भगति भरे भंडारा ॥३॥ पद्अर्थ: सचु = सदा स्थिर प्रभु का नाम। लाहा = लाभ।3। अर्थ: जो मनुष्य सदा-स्थिर हरि-नाम को अपनी खेती बनाता है, जो सदा-स्थिर नाम-बीज (अपने हृदय में) बीजता है, जो सदा-स्थिर हरि-नाम का व्यापार करता है, उसे हर वक्त सदा-स्थिर हरि-नाम-धन (बतौर) लाभ प्राप्त होता रहता है, उसके हृदय में भक्ति के खजाने भर जाते हैं।3। सचु खाणा सचु पैनणा सचु टेक हरि नाउ ॥ जिस नो बखसे तिसु मिलै महली पाए थाउ ॥४॥ पद्अर्थ: टेक = आसरा। महली = प्रभु की हजूरी में।4। नोट: ‘जिस नो’ में से शब्द ‘जिसु’ की ‘ु’ की मात्रा संबंधक ‘नो’ के कारण हटा दी गई है। अर्थ: हे भाई! जिस मनुष्य पर परमात्मा कृपा करता है, उसको सदा-स्थिर हरि-नाम (आत्मिक) खुराक, हरि-नाम ही पोशाक, हरि-नाम ही (जीवन का) आसरा मिल जाता है। वह मनुष्य परमात्मा की हजूरी में जगह पा लेता है।4। आवहि सचे जावहि सचे फिरि जूनी मूलि न पाहि ॥ गुरमुखि दरि साचै सचिआर हहि साचे माहि समाहि ॥५॥ पद्अर्थ: सचे = सदा स्थिर प्रभु में (लीन)। मूलि न = बिल्कुल ही नहीं। दरि = दर पर। दरि साचै = सदा स्थिर प्रभु के दर पे। सचिआर = सही रास्ते पर।5। अर्थ: हे भाई! गुरु के सन्मुख रहने वाले बंदे हरि-नाम में लीन ही (जगत में) आते हैं, हरि-नाम में लीन ही (यहाँ से) जाते हैं, वे दुबारा कभी भी जूनियों के चक्कर में नहीं पड़ते। गुरु के सन्मुख रहने वाले मनुष्य सदा-स्थिर प्रभु के दर पर सुर्ख-रू हो जाते हैं, वे सदा कायम रहने वाले परमात्मा में लीन हो जाते हैं।5। अंतरु सचा मनु सचा सची सिफति सनाइ ॥ सचै थानि सचु सालाहणा सतिगुर बलिहारै जाउ ॥६॥ पद्अर्थ: अंतरु = अंदरूनी, हृदय। सचा = सफल। सनाइ = (स्ना = अरबी शब्द) कीर्ति महिमा। सचै थानि = सदा स्थिर रहने वाले स्थान में। जाउ = जाऊँ, मैं जाता हूँ।6। अर्थ: हे भाई! मैं अपने गुरु से सदके जाता हूँ (जिसकी मेहर से मेरा) हृदय सफल हो गया है, मेरा मन सफल हो गया है, और, मैं सदा-स्थिर प्रभु की महिमा करता रहता हूँ। हे भाई! जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभु की महिमा करता है उसे सदा-स्थिर हरि की हजूरी में जगह प्राप्त हो जाती है।6। सचु वेला मूरतु सचु जितु सचे नालि पिआरु ॥ सचु वेखणा सचु बोलणा सचा सभु आकारु ॥७॥ पद्अर्थ: सचु = सफल। मूरतु = महूरत। जितु = जिस में। सचु = सदा स्थिर प्रभु। आकारु = दिखता जगत।7। अर्थ: हे भाई! वह समय सफल है, वह महूरत सफल है जब किसी मनुष्य का प्यार सदा कायम रहने वाले परमात्मा से बन जाता है। (जिस मनुष्य का प्रभु से प्यार बनता है, वह मनुष्य) उस सदा-स्थिर प्रभु को ही हर जगह देखता है, सदा-स्थिर हरि-नाम ही जपता है, ये सारा संसार उस को सदा कायम रहने वाले का स्वरूप ही दिखता है।7। नानक सचै मेले ता मिले आपे लए मिलाइ ॥ जिउ भावै तिउ रखसी आपे करे रजाइ ॥८॥१॥ पद्अर्थ: सचै = सदा स्थिर प्रभु ने। रजाइ = हुक्म।8। अर्थ: हे नानक! (कह:) जब सदा-स्थिर प्रभु (जीवों को अपने साथ) मिलाता है तब ही (जीव उसके चरणों में) मिलते हैं, वह खुद ही अपने (साथ) मिला लेता है। जैसे उसे अच्छा लगता है, वह खुद हुक्म करता है और (जीवों को अपने चरणों से जोड़े) रखता है।8।1। वडहंसु महला ३ ॥ मनूआ दह दिस धावदा ओहु कैसे हरि गुण गावै ॥ इंद्री विआपि रही अधिकाई कामु क्रोधु नित संतावै ॥१॥ पद्अर्थ: मनूआ = होछा मन। दह दिस = दसों दिशाओं में। दिस = दिशाएं, तरफ। इंद्री = काम-वासना। विआपि रही = जोर डाले रखती है। अधिकाई = बहुत। संतावै = दुखी करता है।1। अर्थ: हे भाई! वह मनुष्य परमात्मा के गुण नहीं गा सकता, जिसका होछा मन दसों दिशाओं में दौड़ता रहता है, जिस पर काम-वासना बहुत जोर डाले रहती है, जिसे काम सदा सताता रहता है जिसको क्रोध सदा दुखी करता रहता है।1। वाहु वाहु सहजे गुण रवीजै ॥ राम नामु इसु जुग महि दुलभु है गुरमति हरि रसु पीजै ॥१॥ रहाउ॥ पद्अर्थ: वाहु वाहु = महिमा। सहजे = सहज ही, आत्मिक अडोलता में टिक के ही। रवीजै = विलीन रहा जा सकता है। इसु जुग महि = मानव जनम में। दुलभु = मुश्किल से मिलने वाला। पीतै = पीया जा सकता है।1। रहाउ। अर्थ: हे भाई! आत्मिक अडोलता में टिक के ही परमात्मा के गुणों की महिमा की जा सकती है। मानव जनम में परमात्मा का नाम एक अमूल्य वस्तु है। गुरु की मति पर चल के ही परमात्मा के नाम का रस पीया जा सकता है।1। रहाउ। सबदु चीनि मनु निरमलु होवै ता हरि के गुण गावै ॥ गुरमती आपै आपु पछाणै ता निज घरि वासा पावै ॥२॥ पद्अर्थ: चीनि = पहचान के, सांझ डाल के। ता = तब। आपै आपु = अपने आप को। निज घरि = अपने (असल) घर में, प्रभु चरणों में।2। अर्थ: हे भाई! जब गुरु के शब्द से सांझ डाल के मनुष्य का मन पवित्र हो जाता है तब वह परमात्मा के महिमा के गीत गाता है। जब मनुष्य गुरु की मति पर चल के अपने आत्मिक जीवन को पड़तालता है (आत्मिक जीवन का विष्लेशण करता है) तब वह परमात्मा के चरणों में जगह प्राप्त कर लेता है।2। ए मन मेरे सदा रंगि राते सदा हरि के गुण गाउ ॥ हरि निरमलु सदा सुखदाता मनि चिंदिआ फलु पाउ ॥३॥ पद्अर्थ: रंगि = रंग में। राते = रंगे हुए। निरमलु = पवित्र। मनि = मन में। चिंदिआ = चितवा हुआ। पाउ = प्राप्त कर।3। अर्थ: हे मेरे मन! सदा परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगा रह, सदा परमात्मा के महिमा के गीत गाता रह। (हे भाई!) परमात्मा सदा पवित्र है, सदा सुख देने वाला है (उसकी महिमा किया कर) मन-इच्छित फल हासिल करेगा।3। हम नीच से ऊतम भए हरि की सरणाई ॥ पाथरु डुबदा काढि लीआ साची वडिआई ॥४॥ पद्अर्थ: से = से। साची = सदा कायम रहने वाली। वडिआई = इज्जत।4। अर्थ: हे भाई! परमात्मा की शरण पड़ने से हम जीव नीच से उत्तम हो जाते हैं। परमात्मा पत्थर-चिक्त मनुष्य को भी (विकारों में) डूबते हुए को निकाल लेता है, उनके अंदर (स्वच्छ आत्मिक जीवन की) सुगंधि आ बसती है।4। बिखु से अम्रित भए गुरमति बुधि पाई ॥ अकहु परमल भए अंतरि वासना वसाई ॥५॥ अर्थ: जो गुरु की मति पर चल कर श्रेष्ठ मति प्राप्त कर लेते हैं, वे (मानो) विष से अमृत बन जाते हैं। वे मानो धतूरे से चँदन बन जाते हैं। उनके अँदर (स्वच्छ आत्मिक जीवन की) सुगँधि आ बसती है।5। माणस जनमु दुल्मभु है जग महि खटिआ आइ ॥ पूरै भागि सतिगुरु मिलै हरि नामु धिआइ ॥६॥ अर्थ: हे भाई! मानव जनम बड़ी मुश्किल से मिलता है, जगत में आ के (मनुष्य जनम के द्वारा उसी मनुष्य ने कुछ) कमाया समझो, जिसे पूरे भाग्यों से गुरु मिल जाता है, और (वह) परमात्मा का नाम स्मरण करता है।6। मनमुख भूले बिखु लगे अहिला जनमु गवाइआ ॥ हरि का नामु सदा सुख सागरु साचा सबदु न भाइआ ॥७॥ पद्अर्थ: बिखु = जहर। से = से। अकहु = आक से, धतूरे से। परमल = चंदन। वासना = कीमती। सागरु = समुंदर। भाइआ = अच्छा लगा।7। अर्थ: हे भाई! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य गलत रास्ते पर पड़े रहते हैं (आत्मिक मौत लाने वाले विकारों के) जहर में मस्त रहते हैं, और, कीमती मानव जन्म को (व्यर्थ) गवा लेते हैं। सदा ही सुखों से भरपूर हरि-नाम उन्हें पसंद नहीं आता, सदा-स्थिर हरि की महिमा वाला गुरु-शब्द उनको अच्छा नहीं लगता।7। मुखहु हरि हरि सभु को करै विरलै हिरदै वसाइआ ॥ नानक जिन कै हिरदै वसिआ मोख मुकति तिन्ह पाइआ ॥८॥२॥ पद्अर्थ: मुखहु = मुँह से। सभु को = हरेक जीव। हिरदै = हृदय में। मुकति = विकारों से खलासी।8। अर्थ: हे भाई! मुँह से (बाहर-बाहर से) तो हरेक परमात्मा का नाम उचार देता है, पर किसी दुर्लभ व्यक्ति ने ही हरि-नाम अपने हृदय में बसाया है। हे नानक! (कह:) जिस मनुष्यों के हृदय में परमात्मा का नाम आ बसता है वे मनुष्य विकारों से मुक्ति पा लेते हैं।8।2। वडहंसु महला १ छंत ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ काइआ कूड़ि विगाड़ि काहे नाईऐ ॥ नाता सो परवाणु सचु कमाईऐ ॥ जब साच अंदरि होइ साचा तामि साचा पाईऐ ॥ लिखे बाझहु सुरति नाही बोलि बोलि गवाईऐ ॥ जिथै जाइ बहीऐ भला कहीऐ सुरति सबदु लिखाईऐ ॥ काइआ कूड़ि विगाड़ि काहे नाईऐ ॥१॥ पद्अर्थ: काइआ = शरीर। कूड़ि = माया के मोह में। विगाड़ि = मैला करके। काहे नाईऐ = (तीर्थ-) स्नान का कोई लाभ नहीं। सचु = सदा स्थिर नाम का स्मरण। साच अंदरि = सदा स्थिर प्रभु के चरणों में टिक के। साचा = सदा स्थिर प्रभु (का रूप)। तामि = तब। लिखे बाझहु = प्रभु के लिखें हुकमों के बगैर। सुरति = ऊँची सोच, ध्यान।1। अर्थ: शरीर को (हृदय को) माया के मोह में गंदा करके (तीर्थ-) स्नान करने का कोई लाभ नहीं है। वही मनुष्य नहाया हुआ (पवित्र) है और वही (प्रभु की हजूरी में) स्वीकार है जो सदा-स्थिर प्रभु-नाम-जपने की कमाई करता है। जब सदा-स्थिर-प्रभु के चरणों में जुड़ के जीव सदा स्थिर-प्रभु के साथ एक-मेक हो जाता है तब सदा-स्थिर रहने वाला परमात्मा मिल जाता है। पर, प्रभु के हुक्म के बिना मनुष्य की सूझ (झूठ में से निकल के) ऊँची नहीं हो सकती। सिर्फ जबानी (ज्ञान की) बातें करके बल्कि आत्मिक जीवन और खराब करता है। जहाँ भी (भाव, साधु-संगत में) जा के बैठें, प्रभु की महिमा ही करनी चाहिए, अपनी सूझ में प्रभु की महिमा की वाणी परोनी चाहिए। (नहीं तो) हृदय को माया के मोह में मैला करके (तीर्थ-) स्नान करने का क्या लाभ?।1। |
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Sri Guru Granth Darpan, by Professor Sahib Singh |