श्री गुरू ग्रंथ साहिब दर्पण । टीकाकार: प्रोफैसर साहिब सिंह । अनुवादक भुपिन्दर सिंह भाईख़ेल

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मूड़े काइचे भरमि भुला ॥ नह चीनिआ परमानंदु बैरागी ॥१॥ रहाउ॥

पद्अर्थ: मूढ़ै = हे मूर्ख! काइचे = किसलिए? क्यों? भरमि = भुलेखे में पड़ कर। भुला = भूल रहा है। चीनिआ = पहचाना। परमानंदु = वह परमात्मा जो सबसे ऊँचे आनंद का मालिक है। बैरागी = माया से उपराम (हो के)।1। रहाउ।

अर्थ: (हे जोगी!) तू जगत की माया से वैराग हो के ऊँचे से ऊँचे आत्मिक आनंद के मालिक परमात्मा को अभी तक पहचान नहीं सका, हे मूर्ख! तू (प्राणायाम के) भुलेखे में पड़ के क्यों (जीवन के अस्लियत से) अलग राह पर जा रहा है?।1। रहाउ।

अजर गहु जारि लै अमर गहु मारि लै भ्राति तजि छोडि तउ अपिउ पीजै ॥ मीन की चपल सिउ जुगति मनु राखीऐ उडै नह हंसु नह कंधु छीजै ॥२॥

पद्अर्थ: जरा = बुढ़ापा। अजर = (अ+जरा) जिसको बुढ़ापा छू नहीं सकता वह परमात्मा। गहु = पकड़, रोक। अजर गहु = जरा रहित प्रभु के मिलाप के रास्ते में रुकावट डालने वाला (मोह)। जारि लै = जला दे। अमर = मौत रहित प्रभु। अमर गहु = मौत रहित हरि के मेल की राह में रुकावट डालने वाला (मन)। मारि लै = वश में कर ले। भ्राति = भ्रांति, भटकना। तजि छोडि = त्याग दे। तउ = तब। अपिउ = अमृत, आत्मिक जीवन देने वाला नाम रस। पीजै = पी सकते हैं।2।

अर्थ: (हे जोगी!) जरा-रहित प्रभु से मिलाप के राह में रुकावट डालने वाले मोह को (अपने अंदर से) जला दे, मौत-रहित हरि के मिलाप के रास्ते में विघन डालने वाले मन को वश में कर रख, भटकना छोड़ दे, तब ही आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पीया जा सकता है। इसी प्रकार मछली जैसा चंचल मन काबू में रखा जा सकता है, मन विकारों की तरफ दौड़ने से हट जाता है, शरीर भी विकारों में पड़ कर दुखी होने से बच जाता है।2।

भणति नानकु जनो रवै जे हरि मनो मन पवन सिउ अम्रितु पीजै ॥ मीन की चपल सिउ जुगति मनु राखीऐ उडै नह हंसु नह कंधु छीजै ॥३॥९॥

पद्अर्थ: भणति = कहता है। नानकु जनो = नानकु जनु, दास नानक। मनो = मनु। रवै = स्मरण करे। मन सिउ = मन से, मन (की ऐकाग्रता) से। पवन = हवा, श्वास, सांस सांस में। अंम्रितु = आत्मिक जीवन देने वाला नाम रस।3।

अर्थ: दास नानक कहता है अगर मनुष्य का मन परमात्मा का स्मरण करे, तो मनुष्य मन की एकाग्रता के साथ श्वास-श्वास (नाम जप के) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पीता है। इस तरीके से मछली की चंचलता वाला मन वश में रखा जा सकता है, मन विकारों की ओर नहीं दौड़ता, और शरीर भी विकारों में खचित नहीं होता।3।9।

मारू महला १ ॥ माइआ मुई न मनु मुआ सरु लहरी मै मतु ॥ बोहिथु जल सिरि तरि टिकै साचा वखरु जितु ॥ माणकु मन महि मनु मारसी सचि न लागै कतु ॥ राजा तखति टिकै गुणी भै पंचाइण रतु ॥१॥

पद्अर्थ: माइआ = माया का प्रभाव। सरु = हृदय सरोवर। लहिर = लहरों से (भरपूर)। मै लहरी = मैं मैं की लहरों से। मतु = मस्त, नाको नाक भरा हुआ। बोहिथु = जहाज। जल सिरि = (मैं मैं की लहरों के) पानी के सिर पर। तरि = तैर के। साचा वखरु = सदा कायम रहने वाला नाम सौदा। जितु = जिस (बोहिथ) में। माणकु = मोती। मारसी = वश में रखेगा। सचि = सच में (जुड़े रहने से)। कतु = चीर, दरार, (मन में) चीरा। राजा = जीवात्मा। तखति = हृदय-तख़्त पर, अडोलता के तख़्त पर। गुणी = गुणों के कारण। भै पंचाइण = पंचायण के डर में। रतु = रंगा हुआ। पंचाइण = परमात्मा (पंच+अयन = पाँचों तत्वों का घर, पाँच तत्वों का श्रोत)।1।

अर्थ: (जो मनुष्य मालिक-प्रभु को अपने अंदर बसता नहीं देखता, प्रभु को अपने हृदय में नहीं बसाता) उसकी माया की तृष्णा नहीं समाप्त होती, उसका मन विकारों से नहीं हटता, उसका हृदय-सरोवर मैं-मैं की लहरों से भरा रहता है। वही जीवन-बेड़ा (संसार-समुंदर की विकार-लहरों के) पानियों पर तैर के (प्रभु-चरणों में) टिका रहता है जिसमें सदा-स्थिर रहने वाला नाम-सौदा है। जिस मन में नाम-मोती बसता है, उस मन को वह मोती विकारों से बचा लेता है, सच्चे नाम में जुड़े रहने के कारण उस मन में दरार नहीं आता (वह मन माया में डोलता नहीं); प्रभु के डर-अदब में रंगी हुई जीवात्मा प्रभु के गुणों में प्रवृति रहने के कारण अंदर ही हृदय-तख़्त पर टिका रहता है (बाहर नहीं भटकता)।1।

बाबा साचा साहिबु दूरि न देखु ॥ सरब जोति जगजीवना सिरि सिरि साचा लेखु ॥१॥ रहाउ॥

पद्अर्थ: बाबा = हे भाई! साचा = सदा कायम रहने वाला। दूरि = अपने आप से दूर। सरब = सब जीवों में। जग जीवना = जगत का जीवन प्रभु। जोति जग जीवना = जगत के जीवन प्रभु की ज्योति। सिरि सिरि = हरेक (जीव) के सिर पर। साचा = अटल, अमिट। लेखु = प्रभु का हुक्म।1। रहाउ।

अर्थ: हे भाई! सदा कायम रहने वाले मालिक प्रभु को (अपने आप से) दूर बसता ना समझ (सच्चा मालिक तेरे अपने अंदर बस रहा है)। उस जगत-के-आसरे प्रभु की ज्योति सब जीवों के अंदर मौजूद है। प्रभु का हुक्म हरेक जीव पर सदा अटल है।1। रहाउ।

ब्रहमा बिसनु रिखी मुनी संकरु इंदु तपै भेखारी ॥ मानै हुकमु सोहै दरि साचै आकी मरहि अफारी ॥ जंगम जोध जती संनिआसी गुरि पूरै वीचारी ॥ बिनु सेवा फलु कबहु न पावसि सेवा करणी सारी ॥२॥

पद्अर्थ: संकरु = शिव। इंदु = इंद्र देवता। तपै = तप करता है। भेखारी = भिखारी, त्यागी। मानै = मानता है। सोहै = सुशोभित होता है। दरि साचै = सदा स्थिर प्रभु के दर पर। आकी = हुक्म मानने से आकी। अफारी = आफरे हुए, अहंकारी। मरहि = आत्मिक मौत मरते हैं। जोधे = योद्धे। जंगम = घंटी बजाने वाले शिव के उपासक जोगी। गुरि पूरै = पूरे गुरु से। वीचारी = हमने ये विचार। न पावसि = नहीं पाएगा। सारी = श्रेष्ठ।2।

अर्थ: ब्रहमा-विष्णु शिव-इंद्र और अनेक ऋषि-मुनि, चाहे कोई तप करता है चाहे कोई त्यागी है, वही परमात्मा के दर पर शोभा पाता है जो परमात्मा का हुक्म मानता है (जो परमात्मा की रजा में अपनी मर्जी लीन करता है), अपनी मन-मर्जी करने वाले अहंकारी आत्मिक मौत मरते हैं। हमने गुरु के द्वारा ये विचार (करके देख) लिया है कि जंगम हों, योद्धे हों, जती हों, सन्यासी हों, प्रभु की भक्ति के बिना कभी भी कोई अपनी मेहनत-कमाई का फल प्राप्त नहीं कर सकता। सेवा-नाम-जपना ही सबसे श्रेष्ठ करणी है।2।

निधनिआ धनु निगुरिआ गुरु निमाणिआ तू माणु ॥ अंधुलै माणकु गुरु पकड़िआ निताणिआ तू ताणु ॥ होम जपा नही जाणिआ गुरमती साचु पछाणु ॥ नाम बिना नाही दरि ढोई झूठा आवण जाणु ॥३॥

पद्अर्थ: निगुरिआ = जिसका कोई गुरु ना हो, जिनको कोई जीवन-राह ना बताए। अंधुलै = अंधे ने, उसने जिसकी ज्ञान की आँखें नहीं। नही जाणिआ = पहचाना नहीं जा सकता, सांझ नहीं पाई जा सकती। साचु = सदा स्थिर प्रभु। पछाणु = जान पहचान वाला, मित्र, सहायक। दरि = प्रभु के दर पर। ढोई = आसरा, सहारा। झूठा = नाशवान। आवण जाणु = जनम मरण।3।

अर्थ: हे प्रभु! गरीबों के लिए तेरा नाम खजाना है (गरीब होते हुए भी वह बादशाहों वाला दिल रखते हैं), जिनकी कोई बाँह नहीं पकड़ता, उनका तू रहबर बनता है; जिसको कोई आदर-मान नहीं देता (नाम की दाति दे के) उनको (जगत में) आदर-सम्मान दिलाता है। जिस भी (आत्मिक आँखों से) अंधे ने गुरु-ज्योति (का पल्ला) पकड़ा है उस निआसरे का तू आसरा बन जाता है। हवन-जप आदि से परमात्मा से सांझ नहीं बनती, गुरु की दी हुई मति पर चलने से वह सदा-स्थिर प्रभु (जीव का) दर्दी बन जाता है। परमात्मा के नाम के बिना परमात्मा के दर पर सहारा नहीं मिलता, जनम-मरण का नाशवान चक्कर बना रहता है।3।

साचा नामु सलाहीऐ साचे ते त्रिपति होइ ॥ गिआन रतनि मनु माजीऐ बहुड़ि न मैला होइ ॥ जब लगु साहिबु मनि वसै तब लगु बिघनु न होइ ॥ नानक सिरु दे छुटीऐ मनि तनि साचा सोइ ॥४॥१०॥

पद्अर्थ: त्रिपति = तृप्ति, संतोष। रतनि = रतन से। माजीऐ = साफ करना चाहिए। बहुड़ि = दोबारा। बिघनु = रुकावट। सिरु दे = सिर दे के, स्वैभाव गवा के। छुटीऐ = (मैं मैं की लहरों से) खलासी होती है।4।

अर्थ: हे भाई! परमात्मा का सदा कायम रहने वाला नाम सदा सलाहना चाहिए, सच्चे नाम की ही इनायत से संतोषी जीवन मिलता है। प्रभु की गहरी-सांझ रूप रतन से मन को चमकाना चाहिए, फिर ये (विकारों में) मैला नहीं होता। प्रभु-मालिक जब तक मन में बसा रहता है (जीवन-सफर में विकारों की ओर से) कोई रुकावट नहीं पैदा होती।

हे नानक! स्वैभाव गवाने से ही विकारों से निजात मिलती है, और वह सदा-थिर प्रभु मन में और शरीर में टिका रहता है।4।10।

मारू महला १ ॥ जोगी जुगति नामु निरमाइलु ता कै मैलु न राती ॥ प्रीतम नाथु सदा सचु संगे जनम मरण गति बीती ॥१॥

पद्अर्थ: जुगति = तरीका, रहत बहत। निरमाइलु = निर्मल, पवित्र। ता कै = उस (जोगी के मन) में। राती = रक्ती भर भी। नाथ = पति प्रभु। सचु = सदा स्थिर रहने वाला प्रभु। सदा संगे = (जिसके) सदा साथ है। गति = आत्मिक अवस्था। बीती = बीत जाती है, समाप्त हो जाती है।1।

अर्थ: जिस जोगी की जीवन-जुगति परमात्मा का पवित्र-नाम (स्मरणा) है, उसके मन में (विकारों वाली) रक्ती भर भी मैल नहीं रह जाती। सबका प्यारा, सबका पति और सदा कायम रहने वाला प्रभु सदा उस (योगी) के हृदय में बसता है (इस वास्ते) जनम-मरण का चक्कर पैदा करने वाली उसकी आत्मिक अवस्था समाप्त हो जाती है।1।

गुसाई तेरा कहा नामु कैसे जाती ॥ जा तउ भीतरि महलि बुलावहि पूछउ बात निरंती ॥१॥ रहाउ॥

पद्अर्थ: गुसाई = हे गो साई! हे धरती के पति प्रभु! कहा = कहाँ? कैसे = कैसे? कहा नामु = कहाँ तेरा खास नाम है? तेरा कोई विशेष नाम नहीं है। कैसे जाती = कैसे तेरी खासि जाति है? तेरी कोई खास जाति नहीं है। तउ = तू। भीतरि = धुर अंदर। महलि = महल में, अपने चरणों में। जा = जब। पूछउ = मैं पूछता हूँ। निरंती बात = भेद की बात।1। रहाउ।

अर्थ: हे धरती के पति-प्रभु! जब तू मुझे अंतरात्मे चरणों में बुलाता है (जोड़ता है) तब मैं (तुझसे) ये भेद की बात पूछता हूँ कि तेरा कहीं कोई खास नाम है और कैसे तेरे कोई विशेष जाति है (भाव, जब तू अपनी मेहर से मुझे अपने चरणों में जोड़ता है तब मुझे समझ आती है कि ना कोई तेरा खास नाम है और ना ही तेरी कोई खास जाति है)।1। रहाउ।

ब्रहमणु ब्रहम गिआन इसनानी हरि गुण पूजे पाती ॥ एको नामु एकु नाराइणु त्रिभवण एका जोती ॥२॥

पद्अर्थ: गिआन इसनानी = ज्ञान का स्नानी, परमातमा के ज्ञान (के जल) का स्नान करने वाला, प्रभु के ज्ञान-जल में अपने मन को पवित्र करने वाला। हरि पूजे = परमात्मा को पूजता है। पाती = पतरों से। एका जोती = प्रभु की एक-ज्योति का पसारा।2।

अर्थ: वह ब्राहमण ब्रहम (परमात्मा का रूप हो जाता) है जो परमात्मा के ज्ञान-जल में अपने मन को स्नान कराता है जो सदा प्रभु के गुण गाता है (मानों, पुष्प) पत्रों से प्रभु को पूजता है, जो सिर्फ परमात्मा को जो सिर्फ परमात्मा के नाम को (हृदय में सदा बसाए रखता है, जिसको) ये सारा संसार प्रभु की ज्योति का पसारा दिखता है।2।

जिहवा डंडी इहु घटु छाबा तोलउ नामु अजाची ॥ एको हाटु साहु सभना सिरि वणजारे इक भाती ॥३॥

पद्अर्थ: जिहवा = जीभ। डंडी = तराजू की डंडी जिसके दोनों सिरों से छाबे लटकते हैं। घटु = हृदय। तोलउ = मैं तोलता हूँ। अजाची = जो जाचा ना जा सके। अजाची नामु = अतुल प्रभु का नाम। हाटु = हाट, जगत। सिरि = सिर पर। वणजारे = व्यापारी, वणज करने वाले, जीव व्यापारी। इक भाती = एक ही किस्म के। इक भाती वणजारे = प्रभु के नाम के ही व्यापारी।3।

अर्थ: (ज्यों-ज्यों) मैं अपनी जीभ को तराजू की डण्डी बनाता हूँ, अपने इस हृदय की तराजू का एक छाबा बनाता हूँ, (इस छाबे में) अतुल्य प्रभु का नाम तौलता हूँ (और दूसरे छाबे में अपने अंदर स्वै भाव को निकाल के रखता जाता हूँ, त्यों-त्यों ये जगत मुझे) एक हाट की तरह दिखता है जहाँ सारे ही जीव एक ही किस्म के (भाव, प्रभु नाम के) बनजारे दिखते हैं और सबके सिर के ऊपर (भाव, सबको जिंद-पिंड की राशि देने वाला) शाहूकार परमात्मा स्वयं खुद है।3।

दोवै सिरे सतिगुरू निबेड़े सो बूझै जिसु एक लिव लागी जीअहु रहै निभराती ॥ सबदु वसाए भरमु चुकाए सदा सेवकु दिनु राती ॥४॥

पद्अर्थ: दोवै सिरे = जनम मरण। निबेड़े = समाप्त कर दिए। जीअहु = अंदर से, मन से। निभराती = नि+भ्रांति, भ्रांति रहित, भटकना रहित, अडोल। चुकाए = दूर कर देता है।4।

अर्थ: जो मनुष्य गुरु का शब्द अपने हृदय में बसाता है (इस तरह अपने मन की) भटकना समाप्त करता है और दिन-रात सदा का सेवक बना रहता है, (गुरु-शब्द की इनायत से) जिस मनुष्य की तवज्जो एक परमात्मा में टिकी रहती है जो अंतरात्मे भटकना-रहित हो जाता है उसको सही जीवन-जुगति की समझ आ जाती है, सतिगुरु उसका जनम-मरण का चक्र समाप्त कर देता है।4।

ऊपरि गगनु गगन परि गोरखु ता का अगमु गुरू पुनि वासी ॥ गुर बचनी बाहरि घरि एको नानकु भइआ उदासी ॥५॥११॥

पद्अर्थ: गगनु = आकाश, चिदाकाश, चिक्त आकाश, दिमाग। गोरखु = धरती का मालिक प्रभु। ता का = उस (प्रभु) का। अगमु = अगम्य (पहुँच से परे) (ठिकाना)। गुरू = गुरु (के द्वारा)। वासी = वसनीक। पुनि = पुनः , दोबारा। घरि = हृदय में। बाहरि = जगत में। उदासी = उपराम, निर्लिप।5।

अर्थ: (दुनिया के मायावी फुरनों की पहुँच से दूर) ऊँचा वह चिक्त-आकाश है (वह आत्मिक अवस्था है) जहाँ सृष्टि का पालक परमात्मा बस सकता है; उस प्रभु (के मिलाप) का वह ठिकाना अगम्य (पहुँच से परे) है (क्योंकि जीव बार-बार माया की ओर पलटता रहता है)। फिर भी गुरु के द्वारा उस ठिकाने का वाशिंदे बन जाया जाता है।

नानक गुरु के बताए हुए रास्ते पर चल के जगत के मोह से उपराम हो गया है, (इस तरह) अपने अंदर और सारे जगत में एक प्रभु को ही देखता है।5।11।

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Sri Guru Granth Darpan, by Professor Sahib Singh