श्री गुरू ग्रंथ साहिब दर्पण । टीकाकार: प्रोफैसर साहिब सिंह । अनुवादक भुपिन्दर सिंह भाईख़ेल

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मः १ ॥ मति पंखेरू किरतु साथि कब उतम कब नीच ॥ कब चंदनि कब अकि डालि कब उची परीति ॥ नानक हुकमि चलाईऐ साहिब लगी रीति ॥२॥ {पन्ना 148}

पद्अर्थ: पंखेरू = पंछी। किरतु = किया हुआ काम (भाव, किए हुए कामों के संस्कारों का एकत्र, पिछले किए कामों के कारण बना स्वभाव)।

अर्थ: (मनुष्य की) मति (मानो एक) पंछी है। उसके पिछले किए कामों के कारण बना हुआ स्वभावउसके साथ (साथी) है। (इस स्वभाव के संग करक ‘मति’) कभी ठीक है कभी गलत। कभी (ये मति रूपी पंछी) चंदन (के पौधे) पे (बैठता है) कभी धतूरे की डाली पे। कभी ( इसके अंदर) ऊँची (प्रभू चरणों की) प्रीति है।

(पर किसी के बस की बात नहीं) मालिक की (धुर से) रीत चली आ रही है, कि वह ( सब जीवों को अपने) हुकम में चला रहा है (भाव, उसके हुकम अनुसार ही कोई अच्छी तो बुरी मति वाला है)।2।

पउड़ी ॥ केते कहहि वखाण कहि कहि जावणा ॥ वेद कहहि वखिआण अंतु न पावणा ॥ पड़िऐ नाही भेदु बुझिऐ पावणा ॥ खटु दरसन कै भेखि किसै सचि समावणा ॥ सचा पुरखु अलखु सबदि सुहावणा ॥ मंने नाउ बिसंख दरगह पावणा ॥ खालक कउ आदेसु ढाढी गावणा ॥ नानक जुगु जुगु एकु मंनि वसावणा ॥२१॥ {पन्ना 148}

पद्अर्थ: केते = बेअंत जीव। वखाण कहहि = बयान करते हैं। पढ़िअै = पढ़ने से। बुझिअै = मति ऊँची होने से। खटु दरसन = छे भेख (जोगी, जंगम, सन्यासी, बोधी, सरेवड़े, बैरागी)। भेखि = बाहर के धार्मिक लिबास से। किसै = किस ने? (भाव, किसी ने नहीं)। अलखु = (संस्कृत: अलख्य), अदृश्य, जिस के कोई खास निशान ना दिखें। बिखंम = असंख का, बेअंत हरी का। आदेसु = नमस्कार। जुगु जुगु = हरेक युग में मौजूद।

अर्थ: बेअंत जीव (परमात्मा के गुणों का) बयान करते आए हैं और बयान करके (जगत से) चले गए हैं। वेद (आदि धर्म पुस्तकें भी उसके गुण) बताते आए हैं, (पर) किसी ने भी उसके गुणों का अंत नहीं पाया। (पुस्तकें) पढ़ने से (भी) उसका भेद नहीं पता चलता। मति ऊँची होने से ही ये राज समझ में आता है (कि वह बेअंत है)। छे भेस वाले साधुओं के बाहरी लिबास से भी कोई सत्य के साथ नहीं जुड़ सका।

वह सदा स्थिर रहने वाला अकाल-पुरख है तो अदृश्य, (पर गुरू) शबद के द्वारासुंदर लगता है। जो मनुष्य बेअंत प्रभू के ‘नाम’ को मानता है (भाव, जो नाम में जुड़ता है), वह उसकी हजूरी में पहुँचता है। वह अकाल पुरख को सिर झुकाता है। ढाढी बन के उसके गुण गाता है, और, हे नानक! हरेक युग में मौजूद रहने वाले एक प्रभू को अपने मन में बसाता है।21।

सलोकु महला २ ॥ मंत्री होइ अठूहिआ नागी लगै जाइ ॥ आपण हथी आपणै दे कूचा आपे लाइ ॥ हुकमु पइआ धुरि खसम का अती हू धका खाइ ॥ गुरमुख सिउ मनमुखु अड़ै डुबै हकि निआइ ॥ दुहा सिरिआ आपे खसमु वेखै करि विउपाइ ॥ नानक एवै जाणीऐ सभ किछु तिसहि रजाइ ॥१॥ {पन्ना 148}

पद्अर्थ: मंत्री = मांदरी (बिच्छू के डंक से इलाज करने वाला)। अठूहिआ = बिच्छुओं का। नागी = नागों से। कूचा = लांबू, आग की चिंगारी लगाना। धुरि = धुर से। अती हू = अति करने के कारण। अड़ै = अड़ता है। हकि निआइ = सच्चे न्याय के कारण। विउपाइ = निर्णय।

अर्थ: बिच्छुओं का मांदरी हो के (जो मनुष्य) सापों कोजा के हाथ डालता है, वह अपने आप को अपने ही हाथों से (जैसे) लांबू लगाता है। धुर से मालिक का हुकम ही ऐसे होता है कि इस अति के कारण (भाव, अति के मूर्खपने के कारण) उसे धक्का लगता है। मनमुख मनुष्य गुरमुख से खहिबाजी करता है (करतार के) सच्चे न्याय अनुसार वह (संसार समुंद्र में) डूबता है (भाव, विकारों की लहरों में उसकी जिंदगी के बेड़ी ग़रक हो जाती है)।

पर (किसी को दोष नहीं दिया जा सकता, क्या गुरमुख और क्या मनमुख) दोनों तरफ पति प्रभू खुद (सिर पे खड़ा हुआ) है, खुद ही निर्णय करके देख रहा है। हे नानक! (असल बात) ऐसे ही समझनी चाहिए कि हरेक काम उसकी रजा में हो रहा है।

महला २ ॥ नानक परखे आप कउ ता पारखु जाणु ॥ रोगु दारू दोवै बुझै ता वैदु सुजाणु ॥ वाट न करई मामला जाणै मिहमाणु ॥ मूलु जाणि गला करे हाणि लाए हाणु ॥ लबि न चलई सचि रहै सो विसटु परवाणु ॥ सरु संधे आगास कउ किउ पहुचै बाणु ॥ अगै ओहु अगमु है वाहेदड़ु जाणु ॥२॥ {पन्ना 148}

पद्अर्थ: सुजाणु = सियाना। मामला = झमेला। वाट = राह में। मूलु = असल। लबि = लालच से। विसटु = विचोला। परवाणु = जाना माना। सरु = तीर। संधै = चलाए। बाणु = तीर। अगंमु = जिस तक पहुँचा ना जा सके। वाहेदड़ु = तीर वाहने वाला। हाणु = उम्र, जिंदगी का समय। हाणि = हम उम्र, अपने स्वभाव वाले, सतसंगी।

अर्थ: हे नानक! (दूसरों की पड़ताल करने की जगह) अगर मनुष्य अपने आप को परखे, तो उसे (असल) पारखू समझो। (दूसरों के विकार रूपी रोग ढूँढने के बजाए) अगर मनुष्य अपना (आत्मिक) रोग और रोग का इलाज दोनों समझ ले तो उसे अकलमंद हकीम जान लो। (ऐसा ‘सुजान वैद्य’) (जिंदगी के) राह में (औरों के साथ) झगड़े नहीं डाल बैठता, वह (अपने आप को जगत में) मुसाफिर समझता है। (अपने) असल (प्रभू) के साथ गहरी सांझ डाल के, जो भी बात करता है अपना समय सत्संगियों के साथ (मिल के) गुजारता है। वह मनुष्य लालच के आसरे नही चलता, सच में टिका रहता है (ऐसा मनुष्य खुद तो तैरता ही है औरों के लिए भी) प्रमाणिक बिचोलिया बन जाता है।

(पर, अगर खुद हो मनमुख, और झगड़े गुरमुखों से, वह ऐसे ही है जैसे आकाश में तीर मारता है) जो मनुष्य आकाश की ओर तीर मारता है, (उसका) तीर कैसे (निशाने पे) पहुँचे? वह आकाश तो आगे से अपहुँच है, सो, (यकीन) जानों कि तीर चलाने वाला ही (खुद ही भेदा जाता है)।2।

पउड़ी ॥ नारी पुरख पिआरु प्रेमि सीगारीआ ॥ करनि भगति दिनु राति न रहनी वारीआ ॥ महला मंझि निवासु सबदि सवारीआ ॥ सचु कहनि अरदासि से वेचारीआ ॥ सोहनि खसमै पासि हुकमि सिधारीआ ॥ सखी कहनि अरदासि मनहु पिआरीआ ॥ बिनु नावै ध्रिगु वासु फिटु सु जीविआ ॥ सबदि सवारीआसु अम्रितु पीविआ ॥२२॥ {पन्ना 148}

पद्अर्थ: नारी = जीव स्त्री। प्रेम = (प्रभू) प्यार (रूपी गहनों) से। सीगारीआ = सजी हुई। वारीआ = वरजी हुई, मना की हुई। सिधारीआ = पहुँची हुई। सखी = सहेलियां, सेविकाएं। मनहु = दिल से, सच्चे दिल से। ध्रिगु = धिक्कार, धिक्कारयोग्य। सवारीआसु = जो उसने सवारी है, जो उस ने सुधारी है।

अर्थ: जिन जीव सि्त्रयों को प्रभू पति से प्यार है, वह इस प्यार (रूपी गहने से) सजी हुई हैं। वह दिन रात (प्रभू पति की) भगती करती हैं। मना करने से (भी भक्ति से) हटती नहीं। सत्गुरू के शबद की बरकति से सुधरी हुई वे (मानो) महलों में बसती हैं। वह विचारवान (हो जाने के कारण) सदा स्थिर रहने वाली अरदास करती हैं (भाव, दुनिया के नाशवंत पदार्थ नहीं मांगती, सदा कायम रहने वाला ‘प्यार’ ही मांगती हैं), (पति प्रभू के) हुकम मुताबिक (पति प्रभू तक) पहुँची हुई वे पति प्रभू के पास (बैठी) शोभती हैं। प्रभू को दिल से प्यार करती हैं और सखी भाव के साथ उसके आगे अरदास करती हैं।

(पर) वह जीना धिक्कारयोग्य है, उस बसेरे को लाहनत है जो नाम से विहीन है। जिस जीव-स्त्री को (अकाल पुरख) ने गुरू-शबद के द्वारा सुधारा है उसने (नाम-) अमृत पिया है।22।

सलोकु मः १ ॥ मारू मीहि न त्रिपतिआ अगी लहै न भुख ॥ राजा राजि न त्रिपतिआ साइर भरे किसुक ॥ नानक सचे नाम की केती पुछा पुछ ॥१॥ {पन्ना 148}

पद्अर्थ: मीहि = बरसात से। मारू = मरुस्थल। राजि = राज से। साइर भरे = भरे हुए समुंद्र को। कि = क्या? सुक = पानी का सूखना। केती पुछा पुछ = अंत पाया नही जा सकता, कितनी कि तमन्ना होती है, ये बात बताई नहीं जा सकती।

(नोट: मारुस्थल के सूखा रहने का स्वभाव बरसात से नहीं हटता। लकड़ियां आग के जलाने के स्वभाव को मिटा नहीं सकती। भरे समुंद्र की अगाधता को सूखा खत्म नहीं कर सकता। इसी तरह नाम रस वालों की नाम की भूख का कभी खात्मा नहीं होता)।

अर्थ: मरुस्थलबरसात से (कभी) तृप्त नहीं होता। आग की (जलाने की) भूख (कभी ईधन से) नहीं मिटती। (कोई) राजा कभी राज (करने) से नहीं अघाया। भरे समुंद्र को सूखा क्या कह सकता है? (भाव, कितनी ही तपष क्यूँ ना पड़े भरे समुंद्रों के गहरे पानियों को सूखा नहीं मिटा सकता)। (वैसे ही) हे नानक! (नाम जपने वालों के अंदर) सच्चे नाम की कितनी कि चाहत होती है– ये बात कही नहीं जा सकती।1।

महला २ ॥ निहफलं तसि जनमसि जावतु ब्रहम न बिंदते ॥ सागरं संसारसि गुर परसादी तरहि के ॥ करण कारण समरथु है कहु नानक बीचारि ॥ कारणु करते वसि है जिनि कल रखी धारि ॥२॥ {पन्ना 148}

पद्अर्थ: तसि = (संस्कृत: तस्य) उस (मनुष्य) का। जनमसि = (संस्कृत: जनम+अस्ति) जनम है। जावतु = (सं: यावत) जब तक। बिंदते = जानता है। संसारसि = (सं: संसारस्य) संसार का। तरहि = तैरते हैं। के = कई जीव।

(नोट: शब्द ‘के’ का अर्थ ‘कोई विरला’ करना गलत है। क्योंकि इसके साथ की क्रिया ‘तरहि’ बहुवचन है। ‘जपु जी’ के आखिर में ‘के नेड़े के दूरि’ – यहां ‘के’ अर्थ है ‘कई’)। करण–जगत। कल–कला, सत्ता।

अर्थ: जब तक (मनुष्य) अकाल-पुरख को नहीं पहचानता तब तक उसका जनम व्यर्थ है। पर, गुरू की कृपा से जो लोग (नाम में जुड़ते हैं वह) संसार के समुंद्र से तैर जाते हैं।

हे नानक! जो प्रभू जगत का मूल सब कुछ करने योग्य है, जिस ईश्वर के वश में जगत का सृजन है, जिस ने (सारे जगत में) अपनी सत्ता टिकाई हुई है, उसका ध्यान धर।2।

पउड़ी ॥ खसमै कै दरबारि ढाढी वसिआ ॥ सचा खसमु कलाणि कमलु विगसिआ ॥ खसमहु पूरा पाइ मनहु रहसिआ ॥ दुसमन कढे मारि सजण सरसिआ ॥ सचा सतिगुरु सेवनि सचा मारगु दसिआ ॥ सचा सबदु बीचारि कालु विधउसिआ ॥ ढाढी कथे अकथु सबदि सवारिआ ॥ नानक गुण गहि रासि हरि जीउ मिले पिआरिआ ॥२३॥ {पन्ना 148}

पद्अर्थ: ढाढी = सिफत करने वाला। कलाणि = सिफत सलाह करके। विगसिआ = खिल पड़ा। पूरा = पूरा मरतबा, पूर्ण गौरव। रहसिआ = खिल आया। दुसमन = कामादिक विकार, वैरी। सजण = नाम में लगी ज्ञान इंद्रियां। सेवनि = सेवा करते हैं, हुकम में चलते हैं। मारगु = रास्ता। विधउसिआ = (विध्वंश) नाश किया। गुण रासि = गुणों की पूँजीं। गहि = ग्रहण करके, ले के।

अर्थ: जो मनुष्य प्रभू की सिफत सलाह करता है वह (सदा) मालिक की हजूरी में बसता है। सदा कायम रहने वाले पति की प्रशंसा करके उसका हृदय रूपी कमल खिला जाता है। मालिक से पूरा गौरव (भाव, पूर्ण अवस्था) हासिल करके वह अंदर से उल्लास में आता है (क्योंकि, कामादिक विकार) वैरियों को वह (अंदर से) मार के निकाल देता है (तो फिर नाम में लगे उसके ज्ञानेंद्रिय रूप) मित्र प्रसन्न हो जाते हैं। ये (ज्ञानेंद्रियां) गुरू की रजा में चलने लग जाती हैं। सत्गुरू इन्हें (अब जीवन का) सच्चा राह दिखता है।

सिफत सालाह करने वाला मनुष्य सच्चा गुरू शबद विचार के (आत्मिक) मौत (का डर) दूर कर लेता है। गुरू शबद की बरकति से सुधरा हुआ ढाढी अकॅथ प्रभू के गुण गाता है। (इस तरह) हे नानक! प्रभू के गुणों की पूँजी एकत्र करके प्यारे प्रभू के साथ मिल जाता है।23।

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Sri Guru Granth Darpan, by Professor Sahib Singh