श्री गुरू ग्रंथ साहिब दर्पण । टीकाकार: प्रोफैसर साहिब सिंह । अनुवादक भुपिन्दर सिंह भाईख़ेल |
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Page 216 गउड़ी माला महला ५ ॥ हरि बिनु अवर क्रिआ बिरथे ॥ जप तप संजम करम कमाणे इहि ओरै मूसे ॥१॥ रहाउ ॥ बरत नेम संजम महि रहता तिन का आढु न पाइआ ॥ आगै चलणु अउरु है भाई ऊंहा कामि न आइआ ॥१॥ तीरथि नाइ अरु धरनी भ्रमता आगै ठउर न पावै ॥ ऊहा कामि न आवै इह बिधि ओहु लोगन ही पतीआवै ॥२॥ चतुर बेद मुख बचनी उचरै आगै महलु न पाईऐ ॥ बूझै नाही एकु सुधाखरु ओहु सगली झाख झखाईऐ ॥३॥ नानकु कहतो इहु बीचारा जि कमावै सु पार गरामी ॥ गुरु सेवहु अरु नामु धिआवहु तिआगहु मनहु गुमानी ॥४॥६॥१६४॥ {पन्ना 216} पद्अर्थ: अवर = और। क्रिया = कर्म। संजम = मन को विकारों से रोकने का यत्न। इहि = (‘इह’ का बहुवचन)। ओरै = पास पास ही। मूसे = ठॅगे जाते हैं, लूटे जाते हैं।1। रहाउ। आढु = आधी कौड़ी। आगै = आगे परलोक में। चलणु = साथ जाने वाला पदार्थ। कामि = काम में। ऊहा = परलोक में, प्रभू की दरगाह में।1। तीरथि = तीर्थ पर। नाइ = नहाता है। अरु = तथा (‘अरु’ और ‘अरि’ में फर्क याद रखें)। धरनी = धरती। ठउर = जगह। बिधि = तरीका। लोगन ही = लोगों को ही। पतीआवै = तसल्ली देता है, निश्चय कराता है।2। चतुर = चार। मुख बचनी = मुंह के वचनों से, जबानी। महलु = ठिकाना। सुधाखरु = शुद्ध अक्षर, पवित्र शब्द, परमात्मा क नाम। ओहु = वह मनुष्य। झाख झखाईअै = खुआरी ही सहता है।3। नानकु कहतो = नानक कहता है (शब्द ‘नानक’ व ‘नानकु’ का फर्क)। जि = जो मनुष्य। पार गरामी = तैराक, पार लांघने लायक। मनहु = मन से। गुमानी = गुमान, अहंकार।4। अर्थ: (हे भाई!) परमात्मा के सिमरन के बिना और सारे (निहित धार्मिक) काम व्यार्थ हैं। (देवतों को प्रसन्न करने वाले) जप करने, तप साधने, इन्द्रियों को विकारों से रोकने के लिए हठ योग के साधन करने- ये सारे (प्रभू की दरगाह से) पहले ही छीन लिए जाते हैं।1। मनुष्य वर्तों संजमों के नियमों में ही व्यस्त रहता है, पर उन उद्यमों का मूल्य उसे एक कौड़ी भी नहीं मिलता। हे भाई! जीव के साथ परलोक में साथ निभाने वाला पदार्थ और है (वर्त नेम संजम आदिक में से कोई भी) परलोक में काम नहीं आता।1। जो मनुष्य तीर्थों पर स्नान करता है और (त्यागी बन के) धरती पर रटन करता फिरता है (वह भी) प्रभू की दरगाह में जगह नहीं ढूँढ सकता। ऐसा कोई तरीका प्रभू की हजूरी में काम नहीं आता। वह (त्यागी इन तरीकों से) सिर्फ लोगों को ही (अपने धर्मी होने का) निश्चय दिलाता है।2। (हे भाई! अगर पण्डित) चारों वेद जुबानी उचार सकता है (तो इस तरह भी) प्रभू की हजूरी में ठिकाना नहीं मिलता। जो मनुष्य परमात्मा का पवित्र नाम (सिमरना) नहीं समझता वह (और और उद्यमों के साथ) निरी ख्वारी ही बर्दाश्त करता है।3। (हे भाई!) नानक ये एक विचार की बात कहता है, जो मनुष्य इसे इस्तेमाल में ले आता है वह संसार समुंद्र से पार लांघने के लायक हो जाता है (वह विचार ये है - हे भाई!) गुरु की शरण पड़। अपने मन में से अहंकार दूर कर, और परमात्मा का नाम सिमर।4।6।164। गउड़ी माला ५ ॥ माधउ हरि हरि हरि मुखि कहीऐ ॥ हम ते कछू न होवै सुआमी जिउ राखहु तिउ रहीऐ ॥१॥ रहाउ ॥ किआ किछु करै कि करणैहारा किआ इसु हाथि बिचारे ॥ जितु तुम लावहु तित ही लागा पूरन खसम हमारे ॥१॥ करहु क्रिपा सरब के दाते एक रूप लिव लावहु ॥ नानक की बेनंती हरि पहि अपुना नामु जपावहु ॥२॥७॥१६५॥ {पन्ना 216} पद्अर्थ: माधउ = (मा = धव। मा = माया। धव = पति) हे माया के पति परमात्मा। मुखि = मुंह से। कहीअै = कह सकें। हम ते = हमसे। सुआमी = हे स्वामी! ।1। रहाउ। कि = क्या? इसु हाथि = इस (जीव) के हाथि में। जितु = जिस तरफ। तित ही = उस तरफ ही । खसम = हे पति!।1। (नोट: शब्द ‘जितु’ की तरह ‘तितु’ के आखिर में भी ‘ु’ मात्रा थी, जो क्रिया विशेषण ‘ही’ के कारण हट गई है)। दाते = हे दातार! ऐक रूप लिव = अपने एक स्वरूप की लगन। लावहु = पैदा करो। पहि = पास।2। अर्थ: (हे स्वामी प्रभू!) हम जीवों से कुछ नहीं हो सकता। जिस तरह तू हमें रखता है, उसी तरह हम रहते हैं। हे माया के पति प्रभू! हे हरी! (मेहर कर, ताकि हम) तेरा नाम मुंह से उचार सकें।1। रहाउ। हे मेरे सर्व-व्यापक खसम प्रभू! ये जीव क्या करें? ये हैं क्या करने के काबिल? इन बिचारों के हाथ में है क्या? (ये जीव अपने आप कुछ नहीं करता, कुछ नहीं कर सकता, इसके हाथ में कोई ताकत नहीं)। जिस तरफ तू इसे लगाता है, उसी तरफ ये लगा फिरता है।1। हे सारे जीवों को दातें देने वाले प्रभू! मेहर कर, मुझे सिर्फ अपने ही स्वरूप की लगन बख्श। मैं नानक की परमात्मा के पास (यही) विनती है (-हे प्रभू!) मुझसे अपना नाम जपा।2।7।165। रागु गउड़ी माझ१ महला ५ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ दीन दइआल दमोदर राइआ जीउ ॥ कोटि जना करि सेव लगाइआ जीउ ॥ भगत वछलु तेरा बिरदु रखाइआ जीउ ॥ पूरन सभनी जाई जीउ ॥१॥ किउ पेखा प्रीतमु कवण सुकरणी जीउ ॥ संता दासी सेवा चरणी जीउ ॥ इहु जीउ वताई बलि बलि जाई जीउ ॥ तिसु निवि निवि लागउ पाई जीउ ॥२॥ पोथी पंडित बेद खोजंता जीउ ॥ होइ बैरागी तीरथि नावंता जीउ ॥ गीत नाद कीरतनु गावंता जीउ ॥ हरि निरभउ नामु धिआई जीउ ॥३॥ भए क्रिपाल सुआमी मेरे जीउ ॥ पतित पवित लगि गुर के पैरे जीउ ॥ भ्रमु भउ काटि कीए निरवैरे जीउ ॥ गुर मन की आस पूराई जीउ ॥४॥ जिनि नाउ पाइआ सो धनवंता जीउ ॥ जिनि प्रभु धिआइआ सु सोभावंता जीउ ॥ जिसु साधू संगति तिसु सभ सुकरणी जीउ ॥ जन नानक सहजि समाई जीउ ॥५॥१॥१६६॥ {पन्ना 216-217} पद्अर्थ: दीन दइआल = हे गरीबों पे तरस करने वाले! दामोदर = (दामन् = रस्सी, तड़ागी। उदर = पेट, कमर। दामोदर = जिसके कमर पे तगाड़ी है, कृष्ण) हे प्रभू! राइआ = हे पातशाह! जन = सेवक। वछलु = वत्सल, प्यारा। बिरद = गरीब निवाज वाला मूल स्वभाव। जाई = जगहों में।1। किउ = कैसे? पेखा = मैं देखूँ। सुकरणी = श्रेष्ठ करनी। चरणी = चरणों की। जीउ = जीवात्मा। वताई = मैं सदके करूँ। बलि जाई = बलिहार जाऊँ, कुर्बान जाऊँ। निवि निवि = झुक झुक के। लागउ = मैं लगूँ। पाई = पैरों में।2। तीरथि = तीर्थ पर। धिआई = मैं ध्याता हूँ।3। पतित = विकारों में गिरे हुए। लगि = लग के। भ्रमु = भटकना। काटि = काट के। कीऐ = कर दिए, बना दिए। गुर = हे गुरू! पूराई = पूरी की है।4। जिनि = जिस ने। जिसु = जिस को। तिसु = उस की। सभ = सारी। सहजि = आत्मिक अडोलता में। समाई = लीनता।5। अर्थ: हे गरीबों पर तरस करने वाले प्रभू पातशाह जी! तूने करोड़ों लोगों को अपने सेवक बना के अपनी सेवा-भक्ति में लगाया हुआ है। भगतों का प्यारा होना- ये तेरा मूल स्वभाव बना आ रहा है। हे प्रभू! तू सब जगहों पर मौजूद है।1। (हे भाई!) मैं कैसे उस प्रभू प्रीतम का दर्शन करूँ? वह कौन सी श्रेष्ठ करनी है (जिससे मैं उसे देखूँ) ? (जहां भी पूछूँ यही उक्तर मिलता है कि) मैं संत जनों की दासी बनूँ ओर उनके चरणों की सेवा करूँ। मैं अपनी ये जिंद उस प्रभू पातशाह पर से सदके करूँ, और, उस पर से कुर्बान हो जाऊँ। झुक झुक के मैं सदा उसके पैर लगती रहूँ।2। (हे भाई!) कोई पण्डित (बन के) वेद आदिक धर्म-पुस्तकें खोजता रहता है, कोई (दुनिया से) वैरागवान हो के (हरेक) तीर्थ पर स्नान करता फिरता है, कोई गीत गाता है, नाद बजाता है, कीर्तन करता है, पर मैं परमात्मा का वह नाम जपता रहता हूँ जो (मेरे अंदर) निर्भयता पैदा करता है।3। (हे भाई!) जिन मनुष्यों पे मेरे स्वामी प्रभू जी दयावान होते हैं, वे मनुष्य गुरू के चरणों में लग के (पहले विकारों में) गिरे हुए (होने के बावजूद भी) स्वच्छ आचरण वाले बन जाते हैं। गुरू (उनके अंदर से माया की) भटकना दूर करके (हरेक किस्म का मलीन) डर दूर कर के उन मनुष्यों को निर्वेर बना देता है। हे गुरू! तूने ही मेरे मन की भी (सिमरन की) आस पूरी की है।4। हे दास नानक! (कह–) जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम धन ढूँढ लिया, वह धनाढ बन गया। जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम सिमरन किया वह (लोक परलोक में) शोभा वाला हो गया। जिस मनुष्य को गुरू की संगति मिल गई, उसकी सारी करनी श्रेष्ठ बन गई। उस मनुष्य को आत्मिक अडोलता में लीनता प्राप्त हो गई।5।1।166। |
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Sri Guru Granth Darpan, by Professor Sahib Singh |