श्री गुरू ग्रंथ साहिब दर्पण । टीकाकार: प्रोफैसर साहिब सिंह । अनुवादक भुपिन्दर सिंह भाईख़ेल

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गउड़ी महला ५ माझ ॥ आउ हमारै राम पिआरे जीउ ॥ रैणि दिनसु सासि सासि चितारे जीउ ॥ संत देउ संदेसा पै चरणारे जीउ ॥ तुधु बिनु कितु बिधि तरीऐ जीउ ॥१॥ संगि तुमारै मै करे अनंदा जीउ ॥ वणि तिणि त्रिभवणि सुख परमानंदा जीउ ॥ सेज सुहावी इहु मनु बिगसंदा जीउ ॥ पेखि दरसनु इहु सुखु लहीऐ जीउ ॥२॥ चरण पखारि करी नित सेवा जीउ ॥ पूजा अरचा बंदन देवा जीउ ॥ दासनि दासु नामु जपि लेवा जीउ ॥ बिनउ ठाकुर पहि कहीऐ जीउ ॥३॥ इछ पुंनी मेरी मनु तनु हरिआ जीउ ॥ दरसन पेखत सभ दुख परहरिआ जीउ ॥ हरि हरि नामु जपे जपि तरिआ जीउ ॥ इहु अजरु नानक सुखु सहीऐ जीउ ॥४॥२॥१६७॥ {पन्ना 217}

पद्अर्थ: हमारै = मेरे हृदय घर में। रैणि = रात। सासि सासि = हरेक श्वास के साथ। चितारे = मैं तुझे याद करता हूँ। संत देउ = मैं संतों को देता हूँ। संदेसा = संदेश। पै = पड़ कर।1।

संगि तुमारै = तेरी संगति में। वणि = वन में। त्रिणि = तृण में। वणि त्रिणि = सारी बनस्पति में। त्रिभवहण = तीनों भवनों वाले संसार में। सेज = हृदय सेज। बिगसंदा = खिला हुआ। लहीअै = मिलता है।2।

पखारि = धो के। करी = करूँ। अरचा = अर्चना, फूलों की भेट। बिनउ = विनती। कहीअै = (हे संत जनो!) कह देनी।3।

इछ = चाह। पुंनी = पूरी हो गई है। परहरिआ = दूर हो गया है। जपै जपि = जप जप के। अजरु = जरा रहित, जिसे बुढ़ापा नहीं आ सकता, कम ना होने वाला।4।

अर्थ: हे मेरे प्यारे राम जी! मेरे हृदय घर में आ बस। मैं रात दिन हरेक सांस के साथ तुझे याद करता हूँ। (तेरे) संत जनों के चरणों में पड़ कर मैं (तेरे को) संदेश भेजता हूँ (कि, हे मेरे प्यारे राम जी!) मैं तेरे बगैर किसी तरह भी (इस संसार समुंद्र को) पार नहीं लांघ सकता।1।

(हे मेरे प्यारे राम जी!) तेरी संगति में रह के मैं आनंद लेता हूँ। सारी बनस्पति में और तीन भवनों वाले संसार में (तुझे देख के) मैं परम सुख परम आनंद (अनुभव करता हूँ)। मेरे हृदय की सेज सुंदर बन गई है, मेरा ये मन खिल गया है। (हे मेरे प्यारे राम जी!) तेरा दर्शन करके ये (आत्मिक) सुख मिलता है।2।

(हे मेरे प्यारे राम जी! तेरे संत जनों के पास मैं विनती करता हूँ कि) मालिक प्रभू के पास मेरी ये विनती कहना- (हे मेरे राम जी! मेहर कर, मैं तेरे संत जनों के) चरण धो के उनकी सदा सेवा करता रहूँ- यही मेरे वास्ते देव-पूजा है, यही मेरे लिए देवताओं के लिए फूल भेट है और यही देवताओं के आगे नमस्कार है।3।

(हे भाई! प्यारे राम की किरपा से) मेरी (उससे मिलाप की) अभिलाषा पूरी हो गई है, मेरा मन आत्मिक जीवन वाला हो गया है, मेरा शरीर (भाव, हरेक ज्ञानेंद्रिय) हरा हो गया है, (प्यारे राम का) दर्शन करके मेरा सारा दुख दूर हो गया है, प्यारे राम जी का नाम जप जप के मैंने (संसार-समुंद्र को) पार कर लिया है।

हे नानक! (उस प्यारे राम जी का दर्शन करने से) ये एक ऐसा सुख पा लेते हैं जो कभी कम होने वाला नहीं है।4।2।167।

गउड़ी माझ महला ५ ॥ सुणि सुणि साजन मन मित पिआरे जीउ ॥ मनु तनु तेरा इहु जीउ भि वारे जीउ ॥ विसरु नाही प्रभ प्राण अधारे जीउ ॥ सदा तेरी सरणाई जीउ ॥१॥ जिसु मिलिऐ मनु जीवै भाई जीउ ॥ गुर परसादी सो हरि हरि पाई जीउ ॥ सभ किछु प्रभ का प्रभ कीआ जाई जीउ ॥ प्रभ कउ सद बलि जाई जीउ ॥२॥ एहु निधानु जपै वडभागी जीउ ॥ नाम निरंजन एक लिव लागी जीउ ॥ गुरु पूरा पाइआ सभु दुखु मिटाइआ जीउ ॥ आठ पहर गुण गाइआ जीउ ॥३॥ रतन पदारथ हरि नामु तुमारा जीउ ॥ तूं सचा साहु भगतु वणजारा जीउ ॥ हरि धनु रासि सचु वापारा जीउ ॥ जन नानक सद बलिहारा जीउ ॥४॥३॥१६८॥ {पन्ना 217}

पद्अर्थ: साजन = हे सज्जन हरी! मन मित = हे मेरे मन के मित्र हरी! जीउ भि = जिंद भी। वारे = सदके। प्राण अधारे = हे मेरी जिंद के आसरे!।1।

मनु जीवै = मन जीअ पड़ता है, आत्मिक जीवन मिल जाता है। भाई = हे भाई! परसादी = कृपा से। पाई = पैरों में, मैं पड़ता हूँ, मैं प्राप्त करता हूँ। कीआ = की। जाई = सारी जगहें। कउ = को से। बलि जाई = मैं कुर्बान जाता हूँ।2।

निधानु = खजाना। लिव = लगन।3।

सचा = सदा कायम रहने वाला। साहु = शाहूकार। वणजारा = व्यापारी। रासि = पूँजी, सरमाया। सचु = सदा टिके रहने वाला।4।

अर्थ: हे मेरे प्यारे सज्जन प्रभू! हे मेरे मन के मित्र प्रभू! हे मेरी जिंद के आसरे प्रभू! (मेरी विनती) ध्यान से सुन। (मेरा ये) मन तेरा दिया हुआ है, मेरी ये जीवात्मा भी तेरी ही दी हुई है। मैं (ये सब कुछ तुझ पर से) कुर्बान करता हूँ। मुझे भूलना नहीं, मैं सदा तेरी शरण पड़ा रहूँ।1।

हे भाई! जिस हरी प्रभू को मिलने से आत्मिक जीवन प्राप्त हो जाता है, वह हरी प्रभू गुरू की किरपा से ही मिल सकता है। (हे भाई! मेरा मन तन) सब कुछ प्रभू का ही दिया हुआ है, (जगत की) सभी जगहें प्रभू की ही हैं। मैं सदा उस प्रभू से ही सदके जाता हूँ।2।

(हे भाई! परमात्मा का) ये (नाम सारे पदार्थों का) खजाना (है, कोई) भाग्यशाली मनुष्य ही ये नाम जपता है। पवित्र स्वरूप प्रभू के नाम से (उस भाग्यशाली मनुष्य की लगन लग जाती है, जिस भाग्यशाली मनुष्य को) पूरा गुरू मिल जाता है, वह हरेक किस्म का दुख दूर कर लेता है, वह आठों पहर परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गाता रहता है।3।

(हे मेरे प्यारे सज्जन प्रभू! हे हरी! तेरा नाम कीमती पदार्थों का श्रोत) है। हे हरी! तू सदा कायम रहने वाला (उन रत्न पदार्थों का) शाहूकार है, तेरा भक्त उन रत्न पदार्थों का व्यापार करने वाला है। हे हरी! तेरा नाम-धन (तेरे भक्तों का) सरमाया है, तेरा भक्त यही सदा स्थिर रहने वाला वणज करता है। हे दास नानक! (कह– हे हरी!) मैं (तुझसे और तेरे भक्त से) सदा कुर्बान जाता हूँ।4।3।168।

रागु गउड़ी माझ२ महला ५    ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

तूं मेरा बहु माणु करते तूं मेरा बहु माणु ॥ जोरि तुमारै सुखि वसा सचु सबदु नीसाणु ॥१॥ रहाउ ॥ सभे गला जातीआ सुणि कै चुप कीआ ॥ कद ही सुरति न लधीआ माइआ मोहड़िआ ॥१॥ देइ बुझारत सारता से अखी डिठड़िआ ॥ कोई जि मूरखु लोभीआ मूलि न सुणी कहिआ ॥२॥ इकसु दुहु चहु किआ गणी सभ इकतु सादि मुठी ॥ इकु अधु नाइ रसीअड़ा का विरली जाइ वुठी ॥३॥ भगत सचे दरि सोहदे अनद करहि दिन राति ॥ रंगि रते परमेसरै जन नानक तिन बलि जात ॥४॥१॥१६९॥ {पन्ना 217-218}

पद्अर्थ: करते = हे करतार! माणु = फखर, गर्व। जोरि तुमारै = तेरी ताकत के आसरे। सुखि = सुख से। वसा = बसूँ, मैं बसता हूँ। नीसाणु = परवाना, राहदारी।1। रहाउ।

सभे = सारी। जातीआ = मैंने समझीं। चुप कीआ = लापरवाह हुआ रहा। सुरति = सूझ।1।

देइ = देता है। सारता = इशारा। अखी = आँखों से। मूलि न = बिल्कुल नहीं। कहिआ = कहा हुआ।2।

किआ गणी = मैं क्या गिनूँ? मैं क्या बताऊूं। इकतु = एक में। सादि = स्वाद में। इकतु सादि = एक ही स्वाद में। मुठी = ठगी जा रही है। इकु अधु = कोई एक-आध, कोई विरला। नाइ = नाम में। रसीअड़ा = रस लेने वाला। जाइ = जगह। वुठी = कृपा करके दी हुई।3।

सचे दरि = सदा स्थिर प्रभू के दर पर। रंगि = रंग में, पे्रम रंग में। तिन = उनसे।4।

अर्थ: हे करतार!तू मेरे वास्ते गर्व वाली जगह है, तू मेरा मान है। हे करतार! तेरे बल पर मैं सुखी बसता हूँ, तेरी सदा स्थिर सिफत सालाह की बाणी (मेरे जीवन सफर में मेरे वास्ते) राहदारी है।1। रहाउ।

हे करतार! माया में मोहित जीव पदार्थों की सारी बातें सुन के समझता भी है, फिर भी परवाह नहीं करता, और कभी भी (परमार्थ की तरफ) ध्यान नहीं देता।1।

अगर कोई गुरमुखि कोई इशारा अथवा संकेत देता भी है (कि यहां सदा स्थिर नहीं रहना, फिर) ये बातें आँखों से भी देख लेते हैं (कि सब चले जा रहे हैं) पर जीव ऐसा कोई मूर्ख लोभी है कि (ऐसी) कही हुई बात बिल्कुल नहीं सुनता।2।

(हे भाई!) मैं किसी एक की, दो या चार की क्या बात बताऊँ? सारी ही सृष्टि एक ही स्वाद में ठॅगी जा रही है। कोई विरला मनुष्य परमातमा के नाम में रस लेने वाला है, कोई एक-आध हृदय-स्थल ही कृपा पात्र मिलता है।3।

(हे भाई!) परमात्मा की भक्ति करने वाले लोग सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के दर पर शोभा पाते हैं, और दिन रात आत्मिक आनंद का लुत्फ लेते हैं। हे दास नानक! (कह– जो मनुष्य) परमेश्वर के प्रेम रंग में रंगे रहते हैं, मैं उनसे कुर्बान जाता हूँ।4।1।169।

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Sri Guru Granth Darpan, by Professor Sahib Singh