श्री गुरू ग्रंथ साहिब दर्पण । टीकाकार: प्रोफैसर साहिब सिंह । अनुवादक भुपिन्दर सिंह भाईख़ेल |
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Page 508 गूजरी महला ५ घरु ४ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ नाथ नरहर दीन बंधव पतित पावन देव ॥ भै त्रास नास क्रिपाल गुण निधि सफल सुआमी सेव ॥१॥ हरि गोपाल गुर गोबिंद ॥ चरण सरण दइआल केसव तारि जग भव सिंध ॥१॥ रहाउ ॥ काम क्रोध हरन मद मोह दहन मुरारि मन मकरंद ॥ जनम मरण निवारि धरणीधर पति राखु परमानंद ॥२॥ जलत अनिक तरंग माइआ गुर गिआन हरि रिद मंत ॥ छेदि अह्मबुधि करुणा मै चिंत मेटि पुरख अनंत ॥३॥ सिमरि समरथ पल महूरत प्रभ धिआनु सहज समाधि ॥ दीन दइआल प्रसंन पूरन जाचीऐ रज साध ॥४॥ मोह मिथन दुरंत आसा बासना बिकार ॥ रखु धरम भरम बिदारि मन ते उधरु हरि निरंकार ॥५॥ धनाढि आढि भंडार हरि निधि होत जिना न चीर ॥ खल मुगध मूड़ कटाख्य स्रीधर भए गुण मति धीर ॥६॥ जीवन मुकत जगदीस जपि मन धारि रिद परतीति ॥ जीअ दइआ मइआ सरबत्र रमणं परम हंसह रीति ॥७॥ देत दरसनु स्रवन हरि जसु रसन नाम उचार ॥ अंग संग भगवान परसन प्रभ नानक पतित उधार ॥८॥१॥२॥५॥१॥१॥२॥५७॥ {पन्ना 508} पद्अर्थ: नाथ = हे जगत के मालिक! नरहर = (नर हरि, नर सिंह) हे परमात्मा! देव = हे प्रकाश रूप! त्रास = डर, सहम। भै = (‘भउ’ का बहुवचन)। गुण निधि = हे गुणों के खजाने। सफल सेव = जिसकी सेवा भगती फलदायक है।1। गुर = हे (सबसे) बड़े! केसव = हे सुंदर लंबे केसों वाले परमात्मा! भव सिंध = संसार समुंद्र। तारि = पार लंघा।1। रहाउ। हरन = दूर करने वाला। मद मोह दहन = हे मोह की मस्ती जलाने वाले! मन मकरंद = हे मन को सुगंधि देने वाले! धरणी धर = हे धरती के सहारे! पति = इज्जत। परमानंद = हे सबसे ऊँचे आनंद के मालिक! ।2। जलत = जल रहों को। तरंग = लहरें। हरि = हे हरी! रिद = हृदय में। छेदि = नाश कर। अहंबुद्धि = अहंकार। करुणा = तरस! करुणा मै = करुणामय, हे तरस स्वरूप प्रभू! पुरख अनंत = हे सर्व-व्यापक बेअंत प्रभू!।3। पल महूरत = हर पल हर घड़ी। सहज = आत्मिक अडोलता। जाचीअै = मांगनी चाहिए। रज = चरण धूड़। साध = संत जन।4। मिथन = झूठा। दुरंत = बुरे अंत वाली। बिदारि = नाश कर। ते = से। निरंकार = हे निरंकार!।5। आढि = आढय, धनाढ, धनी। निधि = खजाना। चीर = कपड़ा। खल = मूर्ख। मुगध = मूर्ख। कटाख् = निगाह। स्रीधर = लक्ष्मी पति।6। जीवन मुकत = दुनिया के कार्य-व्यवहार करता हुआ ही माया के मोह से स्वतंत्र। मन = हे मन! परतीति = श्रद्धा। मइआ = तरस। सरबत्र रमणं = सर्व व्यापक। परम हंसहि रीति = सबसे ऊँचे हंसों की जीवन जुगति। हंस = अच्छे बुरे कामों का निर्णय कर सकने वाला (जैसे हंस दूध और पानी को अलग-अलग कर देता है)।7। देत = देता है। स्रवन = श्रवण, कान। जसु = यश, सिफत सालाह। रसन = जीभ। परसन = छूह।8। अर्थ: हे हरी! हे गोपाल! हे गुर गोबिंद! हे दयालु! हे केशव! अपने चरणों की शरण में रख के मुझे इस संसार समुंद्र में से पार लंघा ले।1। रहाउ। हे जगत के मालिक! हे नरहर! हे दीनों के सहायक! हे विकारियों को पवित्र करने वाले! हे प्रकाश-स्वरूप! हे सारे डरों-सहमों के नाश करने वाले! हे कृपालु! हे गुणों के खजाने! हे स्वामी! तेरी सेवा-भक्ति जीवन को कामयाब बना देती है।1। हे काम-क्रोध को दूर करने वाले! हे मोह के नशे को जलाने वाले! हे मन को (जीवन-) सुगंधि देने वाले मुरारी प्रभू! हे धरती के आसरे! हे सबसे श्रेष्ठ आनंद के मालिक! (जगत के विकारों में, मेरी) लाज रख, मेरे जनम-मरण का चक्कर खत्म कर।2। हे हरी! माया-अग्नि की बेअंत लहरों में जल रहे जीवों के हृदय में गुरू के ज्ञान का मंत्र टिका। हे तरस-स्वरूप हरी! हे सर्व व्यापक बेअंत प्रभू! (हमारा) अहंकार दूर कर (हमारे दिलों में से) चिंता मिटा दे।3। हे समर्थ प्रभू! हर पल हर घड़ी (तेरा नाम) सिमर के मैं अपनी सुरति आत्मिक अडोलता की समाधि में जोड़े रखूँ। हे दीनों पर दया करने वाले! हे सदा खिले रहने वाले! सर्व-व्यापक! (तेरे दर से तेरे) संत-जनों की चरण-धूड़ (ही सदा) मांगनी चाहिए।4। हे हरी! हे निरंकार! मुझे (संसार समुंद्र से) बचा ले, मेरे मन से भटकना दूर कर दे। हे हरी! झूठे मोह से, बुरे अंत वाली आशा से, विकारों की वासनाओं से, मेरी लाज रख।5। हे हरी! जिनके पास (तन ढकने के लिए) कपड़े का टुकड़ा भी नहीं होता, वह तेरे गुणों के खजाने प्राप्त करके (मानो) धनाढों के धनाढ बन जाते हैं। हे लक्ष्मी-पति! महा-मूर्ख और दुष्ट तेरी मेहर की निगाह से गुणवान, बुद्धिमान, धैर्यवान बन जाते हैं।6। हे मन! जीवन-मुक्त करने वाले जगदीश का नाम जप। हे भाई! दिल में उसके वास्ते श्रद्धा टिका, सब जीवों से दया-प्यार वाला सलूक रख, परमात्मा को सर्व-व्यापक जान- उच्च जीवन वाले हंस (मनुष्यों) की ये जीवन-जुगति है।7। हे भाई! परमात्मा खुद ही अपने दर्शन बख्शता है, कानों में अपनी सिफत-सालाह देता है, जीवों को अपने नाम का उच्चारण देता है, सदा अंग-संग बसता है। हे नानक! (कह–) हे हरी! हे भगवान! तेरी छूह विकारियों का भी पार-उतारा करने योग्य है।8।1।2।5।1।1।2।57। गूजरी की वार महला ३॥ भाव पउड़ी वार: एक वह भी वक्त था जब प्रभू खुद ही खुद था, सृष्टि का वजूद नहीं था। पैदा होने और मरने के नियम बना के प्रभू ने अपने हुकम मेुं सृष्टि रची, अपनी ज्योति इसमें टिका दी, त्रिगुणी माया रच के जीवों को धंधे में लगा दिया। इस त्रिगुणी माया का मोह बहुत विशाल है और पापों का मूल है। जो मनुष्य गुर-शबद के द्वारा भक्ति करता है वह निर्मल रहता है। इस मोह से चतुराई से नहीं बचा जा सकता। जो गुर-शबद के द्वारा ‘अहंकार’ को गवाता है वह प्रभू में मिल जाता है। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख हो के सिफत सालाह करता है, वह प्रभू-चरणों में पहुँचता है। ढंग-तरीकों से रॅब नहीं मिलता। गुर-शबद के द्वारा जो मनुष्य प्रभू के ‘नाम’ रूप ‘अमृतसर’ में नहाता है उसकी तृष्णा बुझ जाती है। जिस पर मेहर करे उसको गुरू मिलता है, गुरू की कृपा से ‘निहचल नाम धनु’ मिलता है। प्रभू की कृपा से अगर गुरू मिल जाए तो ‘अहंकार’ दूर होता है, तृष्णा मिट के मन सुखी होता है। गुरू के सन्मुख होने से कपट विकार अगिआन’ दूर हो जाते हैं; सिफत सलाह की बरकति से अंदर ज्योति प्रकाश हो के ‘अनंद’ प्राप्त होता है। गुरू के सन्मुख होने से ‘अहंकार’ मिट जाता है, रजा में चलता है; इस तरह ‘नाम’ जपने से ‘हरि का महलु’ मिल जाता है। जो मनुष्य गुरू का हो रहता है; उसके अंदर परमात्मा का प्यार पैदा होता है; वह सदा रॅबी प्यार की मौज में और याद में मस्त रहता है। दूसरी तरफ, अपने मन के पीछे चल के मनुष्य कामादिक विकारों में फंसते हैं। ये विकार मानो, यमो का मार्ग है, इस राह पड़ के दुखी होते हैं। परमात्मा मनुष्य के शरीर में ही बसता है, पर जीव रसों के भोगने में ही लगा रहता है और परमात्मा भोगों से निर्लिप है; इस लिए एक ही जगह बसते हुए भी जीव और प्रभू का विछोड़ा बना रहता है। झूठ, कुसत्य, अभिमान आदि, जैसे, काया-रूप किले को कठिन किवाड़ लगे हुए हैं, मन के पीछे चलने वाले को ये किवाड़ दिखाई नहीं देते; इन्होंने ही जीव की प्रभू से दूरी बना रखी है। लोभी मन लोभ में फंसा हुआ माया के लिए भटकता फिरता है। दुनिया वाली इज्जत अथवा ऊँची जाति तो परलोक में सहायता नहीं करती; सो मनमुख दोनों जहानों में दुखी रहता है। जिन पर प्रभू की कृपा हो उनको गुरू मिलता है, वह बंदगी करते हैं, प्रभू उनके मन में प्रगट होता है उन्हें सुख रूपी ‘फायदा’ मिलता है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं वे गफ़लत की नींद में नहीं सोते, परमात्मा के नाम का रस चखते हैं और ‘सहज’ अवस्था में टिके रहते हैं। गुरू शबद के द्वारा जो मनुष्य माया की ओर से सुचेत रहके प्रभू की सिफत सालाह करता है वह प्रभू की हजूरी में टिका रहता है। ‘दूजा भाव’ माया का मोह भी प्रभू ने खुद ही पैदा किया है; बड़े-बड़े कहने-कहाने वाले इस ‘दूजे भाव’ में ही फंसे रहे। गुरमुख को सूझ पड़ती है और उसे ‘सोग विजोग’ नहीं व्यापता। जिसने माया का मोह पैदा किया है अगर उसीके दर पर अरदास करते रहें तो इस मोह का जोर नहीं पड़ता और इससे उपजा दुख मिट जाता है। माया के मोह से रक्षा करने वाला प्रभू खुद ही है, जो मनुष्य उसे ध्याते हैं वे माया वाली चिंता छोड़ के ‘अचिंत’ रहते हैं। संसार-समुंद्र भी प्रभू है, इसमें से तैराने वाला जहाज और मल्लाह भी खुद प्रभू ही है, खुद ही राह बताने वाला है। उसका ‘नाम’ सिमरने से सारे पाप काटे जाते हैं। समूचा भाव: ये जगत-रचना प्रभू ने स्वयं की है, इसमें अपनी ज्योति टिका रखी है। त्रिगुणी माया भी खुद ही बनाने वाला है; इसके प्रभाव तले जीवों को उसने धंधे में जोड़ा हुआ है। किसी तरह की चतुराई मनुष्य को इस मोह से नहीं बचा सकती। (पउड़ी 1 से 4) जिस पर मेहर हो उसे गुरू मिलता है। गुरू के सन्मुख हो के सिफत-सालाह करें, नाम ‘अमृतसर’ में नहाएं तो तृष्णा-अग्नि बुझ जाती है, अहंकार मिटता है, कपट-विकार दूर होते हैं, रजा में चलने की जाच आती है और हृदय में प्रभू का प्यार पैदा होता है। (पउड़ी 5 से 11) प्रभू काया-किले के अंदर ही बसता है; पर मनमुख कामादिक किले के अंदर ही फंसे रहते हैं और प्रभू से विछुड़े रहते हैं। झूठ-कुसत्य के कठोर किवाड़ प्रभू से उनकी दूरी बनाए रखते हैं। लोभ का ग्रसा हुआ मनुष्य सारी उम्र नाक-नमूज की खातिर भटकता है, ये नाक-नमूज यहीं रह जाने हैं, सो, दोनों जहानों में दुख पाता है। (पउड़ी 12 से 15) जिन पर मेहर हो वे गुरू की शरण पड़ के बंदगी करते हैं; गफ़लत की नींद में नहीं सोते। माया की तरफ से सुचेत रहके सिफत-सालाह करते हैं और प्रभू की हजूरी में रहते हैं। (पउड़ी 16 से 18) माया का मोह प्रभू ने खुद ही पैदा किया है; बड़े-बड़े कारण वाले भी इस में फंस जाते हैं। संसार-समुंद्र भी खुद है और जहाज और मल्लाह भी खुद ही है, खुद ही राह बताने वाला है। अगर उसके दर पर अरदास करते रहें तो इससे बचा लेता है। (पउड़ी 19 से 22) मुख्य भाव: प्रभू की रची हुई इस जगत माया के मोह से सिर्फ वही मनुष्य बचता है जिसको प्रभू की अपनी मेहर से गुरू मिले, और गुरू के बताए हुए राह पर चल के वह मनुष्य प्रभू की सिफत सालाह करता रहे। वार की बनावट: ये ‘वार’ गुरू अमरदास जी की रचना है, इसमें 22 पउड़ियां हैं, हरेक पौड़ी में पाँच–पाँच तुकें हैं। हरेक पौड़ी के साथ 2–2 शलोक हैं; पौड़ी नंबर 4 के साथ पहला शलोक कबीर जी का है, बाकी सारे शलोक गुरू अमरदास जी के हैं। कबीर जी का एक शलोक होना भी बताता है कि ‘वार’ और ‘शलोक’ एक ही वक्त नहीं लिखे गए क्योंकि ‘वार’ के शलोकों की बनावट में एक–सुरता नहीं रह गई। अगर इनके लिखे जाने का वक्त एक ही होता तो पौड़ी नंबर 4 के साथ सिर्फ एक ही शलोक ना होता। इस पौड़ी के शलोकों को पढ़ के देखो; गुरू अमरदास जी ने ये शलोक उच्चारा भी कबीर जी के शलोक के प्रथाय ही है (देखें शलोक कबीर जी नं:58)। सो, ये दोनों शलोक गुरू अरजन साहिब जी ने इस पउड़ी के भाव के साथ मिलते देख के दर्ज किए हैं पर ये नहीं हो सकता कि अगर गुरू अमरदास जी के सारे शलोक भी साथ ही उचारते तो इस पौड़ी नं:4 को खाली छोड़ देते। सो, सारे ही शलोक बीड़ तैयार करते समय गुरू अरजन साहिब ने दर्ज किए। गूजरी की वार महला ३ सिकंदर बिराहिम की वार की धुनी गाउणी॥ (508) सिकंदर और इब्राहिम एक ही कुल के थे और तुरने–सिर थे। इब्राहिम कुचरित्र था। इसने एक बार एक नवयुवक ब्राहमण नव–ब्याहुता से जबरन छेड़खानी की, ब्राहमण ने सिकंदर के पास फरियाद की। सिकंदर और इब्राहिम दोनों में टकराव हुआ, इब्राहिम पकड़ा गया। पर, जब वह अपने किए पर पछताया तो सिकंदर ने उसे छोड़ दिया। इस घटना को ढाढियों ने ‘वारों’ में गाया। उसी ही सुर पर गुरू अमरदास जी की ये वार गाने की आज्ञा है। उस वार का नमूना: पापी खान बिराहम पर चढ़िआ सेकंदर। भेड़ दुहां दा मचिआ बड रण दे अंदर। गूजरी की वार महला ३ सिकंदर बिराहिम की वार की धुनी गाउणी ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ सलोकु मः ३ ॥ इहु जगतु ममता मुआ जीवण की बिधि नाहि ॥ गुर कै भाणै जो चलै तां जीवण पदवी पाहि ॥ ओइ सदा सदा जन जीवते जो हरि चरणी चितु लाहि ॥ नानक नदरी मनि वसै गुरमुखि सहजि समाहि ॥१॥ {पन्ना 508} पद्अर्थ: मम = मेरा। ममता = (हरेक चीज को) ‘मेरी’ बनाने का ख्याल। बिधि = जाच। पदवी = दर्जा। सहजि = सहज अवस्था में, अडोलता में, वह अवस्था जहाँ दुनिया के लालच में हरेक पदार्थ को अपना बनाने की चाह ना कूदे। नदरी = मेहर करने वाला प्रभू! अर्थ: ये जगत (भाव, हरेक जीव) (ये चीज ‘मेरी’ बन जाए, ये चीज ‘मेरी’ हो जाए- इस) अपनत्व में इतना फसा पड़ा है कि इसे जीने की जाच (विधि) नहीं रही। जो जो मनुष्य सतिगुरू के कहने पर चलता है वह जीवन-जुगति सीख लेता है। जो मनुष्य प्रभू के चरणों में चित्त जोड़ता है, वह समझो सदा ही जीते हैं, (क्योंकि) हे नानक! गुरू के सन्मुख रहने से मेहर का मालिक प्रभू मन में आ बसता है और गुरमुखि उस अवस्था में आ पहुँचते हैं जहाँ पदार्थों की ओर मन नहीं डोलता।1। मः ३ ॥ अंदरि सहसा दुखु है आपै सिरि धंधै मार ॥ दूजै भाइ सुते कबहि न जागहि माइआ मोह पिआर ॥ नामु न चेतहि सबदु न वीचारहि इहु मनमुख का आचारु ॥ हरि नामु न पाइआ जनमु बिरथा गवाइआ नानक जमु मारि करे खुआर ॥२॥ {पन्ना 508} पद्अर्थ: सहसा = संशय, तौखला। आपै = खुद ही। धंधै मार = धंधों की मार। आचारु = रहणी। अर्थ: जिन मनुष्यों का माया से मोह-प्यार है जो माया के प्यार में मस्त हो रहे हैं (इस गफ़लत में से) कभी जागते नहीं, उनके मन में संशय और कलेश टिका रहता है, उन्होंने दुनिया के झमेलों का ये खपाना अपने सिर पर लिया हुआ है। अपने मन के पीछे चलने वाले लोगों की रहणी ये है कि वे कभी गुर-शबद नहीं विचारते। हे नानक! उन्हें परमात्मा का नाम नसीब नहीं हुआ, वह जनम व्यर्थ गवाते हैं और जम उन्हें मार के ख्वार करता है (भाव, वे मौत से सदा सहमे रहते हैं)।2। |
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Sri Guru Granth Darpan, by Professor Sahib Singh |