श्री गुरू ग्रंथ साहिब दर्पण । टीकाकार: प्रोफैसर साहिब सिंह । अनुवादक भुपिन्दर सिंह भाईख़ेल |
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Page 1056 अगिआनी अंधा बहु करम द्रिड़ाए ॥ मनहठि करम फिरि जोनी पाए ॥ बिखिआ कारणि लबु लोभु कमावहि दुरमति का दोराहा हे ॥९॥ पूरा सतिगुरु भगति द्रिड़ाए ॥ गुर कै सबदि हरि नामि चितु लाए ॥ मनि तनि हरि रविआ घट अंतरि मनि भीनै भगति सलाहा हे ॥१०॥ मेरा प्रभु साचा असुर संघारणु ॥ गुर कै सबदि भगति निसतारणु ॥ मेरा प्रभु साचा सद ही साचा सिरि साहा पातिसाहा हे ॥११॥ से भगत सचे तेरै मनि भाए ॥ दरि कीरतनु करहि गुर सबदि सुहाए ॥ साची बाणी अनदिनु गावहि निरधन का नामु वेसाहा हे ॥१२॥ {पन्ना 1056} पद्अर्थ: अगिआनी = (आत्मिक जीवन से) बेसमझ मनुष्य। अंधा = (माया के मोह में) अंधा हुआ मनुष्य। बहु करम = (तीर्थ स्नान आदि) अनेकों (निहित धार्मिक) कर्म। द्रिढ़ाऐ = जोर देता है। हठि = हठ से। बिखिआ = माया। कारणि = की खातिर। दोराहा = दो रास्तों का मेल (जहाँ ये पता ना लग सके कि असल रास्ता कौन सा है), दुचिक्तापन। दुरमति = खोटी मति।9। कै सबदि = के शबद से। नामि = नाम में। मनि = मन में। तनि = तन में, हृदय में। घट अंतरि = हृदय में। मनि भीनै = अगर मन भीग जाए। सालाह = सिफत-सालाह।10। साचा = सदा कायम रहने वाला। असुर संघारणु = (कामादिक) दैत्यों का नाश करने वाला। निसतारणु = संसार समुंद्र से पार लंघाने वाला। सिरि = सिर पर।11। से = वह लोग (बहुवचन)। सचे = अडोल जीवन वाले। तेरै मनि = तेरे मन में। भाऐ = अच्छे लगे। दरि = (तेरे) दर पर। करहि = करते हैं (बहु वचन)। सुहाऐ = सुंदर आत्मिक जीवन वाले बन गए। साची बाणी = सदा स्थिर प्रभू की सिफत सालाह की बाणी। अनदिनु = हर रोज, हर वक्त। वेसाहा = पूँजी, सरमाया।12। अर्थ: हे भाई! (आत्मिक जीवन से) बेसमझ (और माया के मोह में) अंधा (हुआ) मनुष्य (हरी-नाम भुला के तीर्थ-स्नान आदि और और ही) अनेकों (मिथे हुए धार्मिक) कर्मों पर जोर देता है। पर जो मनुष्य मन के हठ से (ऐसे) कर्म (करता रहता है, वह) बार-बार जूनियों में पड़ता है। हे भाई! जो मनुष्य माया (कमाने) की खातिर लब-लोभ (को चमकाने वाले) कर्म करते हैं, उनकी जीवन-यात्रा में खोटी मति का दु-चिक्ता-पन आ जाता है।9। हे भाई! पूरा गुरू जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा की भक्ति करने का विश्वास पैदा करता है, वह मनुष्य गुरू के शबद द्वारा परमात्मा के नाम में (अपना) चिक्त जोड़ता है, उसके मन में तन में दिल में सदा परमात्मा बसा रहता है। हे भाई! (परमात्मा में) मन भीगने से मनुष्य उसकी भक्ति और सिफत-सालाह करता रहता है।10। हे भाई! मेरा परमात्मा सदा कायम रहने वाला है, (मनुष्य के अंदर से कामादिक) दैत्यों का नाश करने वाला है, गुरू के शबद में (जोड़ के) भक्ती में (लगा के संसार-समुंद्र से) पार लंघाने वाला है। हे भाई! मेरा प्रभू सदा-स्थिर रहने वाला है सदा ही कायम रहने वाला है, वह तो शाहों-पातशाहों के सिर पर (भी हुकम चलाने वाला) है।11। हे प्रभू! वही भगत अडोल आत्मिक जीवन वाले बनते हैं, जो तेरे मन को प्यारे लगते हैं; वे तेरे दर पर (टिक के, ठहर कर) तेरी सिफत-सालाह करते हैं, गुरू के शबद की बरकति से उनका आत्मिक जीवन सुंदर बन जाता है। हे भाई! वह भक्त-जन सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी हर वक्त गाते हैं। हे भाई! परमात्मा का नाम, (नाम-) धन से वंचित मनुष्यों के लिए राशि-पूँजी है।12। जिन आपे मेलि विछोड़हि नाही ॥ गुर कै सबदि सदा सालाही ॥ सभना सिरि तू एको साहिबु सबदे नामु सलाहा हे ॥१३॥ बिनु सबदै तुधुनो कोई न जाणी ॥ तुधु आपे कथी अकथ कहाणी ॥ आपे सबदु सदा गुरु दाता हरि नामु जपि स्मबाहा हे ॥१४॥ तू आपे करता सिरजणहारा ॥ तेरा लिखिआ कोइ न मेटणहारा ॥ गुरमुखि नामु देवहि तू आपे सहसा गणत न ताहा हे ॥१५॥ भगत सचे तेरै दरवारे ॥ सबदे सेवनि भाइ पिआरे ॥ नानक नामि रते बैरागी नामे कारजु सोहा हे ॥१६॥३॥१२॥ {पन्ना 1056} पद्अर्थ: आपे = (तू) स्वयं ही। मेलि = मेल के। कै सबदि = के शबद से। सालाही = सराहना करते हैं, सिफत सालाह करते हैं। सिरि = सिर पर। साहिबु = मालिक। सबदे = गुरू के शबद में (जुड़ के)।13। नो = को। न जाणी = नहीं जानता, सांझ नहीं डाल सकता। आपे = (गुरू रूप हो के तू) स्वयं ही। अकथ = जिसका सही रूप बयान ना किया जा सके। कहाणी = सिफत सालाह। जपि = जप के। संबाहा = (नाम) पहुँचाता है, देता है।14। मेटणहारा = मिटा सकने वाला। गुरमुखि = गुरू से। देवहि = (तू) देता है। सहसा = सहम। गणत = चिंता। ताहा = उसको।15। सचे = सुखरू। तेरै दरवारे = तेरे दरबार में। सेवनि = सेवा भगती करते हैं। भाइ = प्रेम से ('भाउ' से 'भाय' कर्ण कारक, एक वचन। भाउ = प्रेम)। रते = मस्त। बैरागी = त्यागी, विरक्त। नामे = नाम से ही। कारजु = (हरेक) काम। सोहा = सुंदर हो जाता है, सफल हो जाता है।16। अर्थ: हे प्रभू! तू स्वयं ही जिन मनुष्यों को (अपने चरणों में) जोड़ के (फिर) विछोड़ता नहीं है, वह मनुष्य गुरू के शबद से सदा तेरी सिफत-सालाह करते रहते हैं। हे प्रभू! सब जीवों के सिर पर तू खुद ही मालिक है। (तेरी मेहर से ही जीव गुरू के) शबद में (जुड़ के तेरा) नाम (जप सकते हैं और तेरी) सिफत सालाह कर सकते हैं।13। हे प्रभू! गुरू के शबद के बिना कोई मनुष्य तेरे साथ सांझ नहीं डाल सकता, (गुरू के शबद से) तू स्वयं ही अपना अकथ स्वरूप बयान करता है। तू स्वयं ही गुरू-रूप हो के सदा शबद की दाति देता आया है, गुरू-रूप हो के तू खुद ही हरी-नाम जप के (जीवों को भी यह दाति) देता आ रहा है।14। हे प्रभू! तू खुद ही (सारी सृष्टि को) पैदा कर सकने वाला करतार है। कोई जीव तेरे लिखे लेखों को मिटा सकने के काबिल नहीं है। गुरू की शरण में ला के तू खुद ही अपना नाम देता है, (और, जिसको तू नाम की दाति देता है) उसको कोई सहम कोई चिंता-फिक्र छू नहीं सकते।15। हे प्रभू! तेरे दरबार में तेरे भक्त सुर्खरू रहते हैं, क्योंकि, वे तेरे प्रेम-प्यार में गुरू के शबद द्वारा तेरी सेवा-भगती करते हैं। हे नानक! परमातमा के नाम-रंग में रंगे हुए मनुष्य (दर असल) त्यागी है, नाम की बरकति से उनका हरेक काम सफल हो जाता है।16।3।12। मारू महला ३ ॥ मेरै प्रभि साचै इकु खेलु रचाइआ ॥ कोइ न किस ही जेहा उपाइआ ॥ आपे फरकु करे वेखि विगसै सभि रस देही माहा हे ॥१॥ वाजै पउणु तै आपि वजाए ॥ सिव सकती देही महि पाए ॥ गुर परसादी उलटी होवै गिआन रतनु सबदु ताहा हे ॥२॥ अंधेरा चानणु आपे कीआ ॥ एको वरतै अवरु न बीआ ॥ गुर परसादी आपु पछाणै कमलु बिगसै बुधि ताहा हे ॥३॥ अपणी गहण गति आपे जाणै ॥ होरु लोकु सुणि सुणि आखि वखाणै ॥ गिआनी होवै सु गुरमुखि बूझै साची सिफति सलाहा हे ॥४॥ {पन्ना 1056} पद्अर्थ: प्रभि = प्रभू ने। साचै = सदा स्थिर रहने वाले ने। खेलु = तमाशा। उपाइआ = पैदा किया। आपे = स्वयं ही। वेखि = देख के। विगसै = खुश होता है। सभि रस = सारे चस्के (बहुवचन)। देही माहा = शरीर में ही।1। किस ही: 'किसु' की 'ु' मात्रा 'ही' क्रिया विशेषण के कारण हट गई है। वाजे = बजता है (बाजा)। पउणु = हवा, श्वास। तै = तू (हे प्रभू!)। शिव = शिव, जीवात्मा। सकती = शक्ति, माया। परसादी = कृपा से। उलटी होवै = (माया की ओर से) पलट जाए। गिआन सबदु = आत्मिक जीवन की सूझ देने वाला शबद। रतनु सबदु = कीमती शबद। ताहा = उस (मनुष्य) को (प्राप्त होता है)।2। अंधेरा = माया का मोह। चानणु = आत्मिक जीवन की सूझ। ऐको = सिर्फ़ खुद ही। वरतै = व्यापक है। बीआ = दूसरा। आपु = अपने आप को, अपने आत्मिक जीवन को। पछाणै = पड़तालता है। कमलु = हृदय कमल फूल। बिगसै = खिलता है। बुधि = (आत्मिक जीवन की सूझ वाली) बुद्धि। ताहा = उसको।3। गहणु = गहरी। गति = आत्मिक अवस्था। सुणि = सुन के। आखि = कह के। वखाणै = बयान कर देता है। गिआनी = आत्मिक जीवन की सूझ वाला। गुरमुखि = गुरू की शरण पड़ कर। साची = सदा स्थिर रहने वाली।4। अर्थ: हे भाई! सदा स्थिर रहने वाले मेरे प्रभू ने (यह जगत) एक तमाशा रचा हुआ है, (इसमें उसने) कोई जीव किसी दूसरे जैसा नहीं बनाया। खुद ही (जीवों में) अंतर पैदा करता है, और (ये अंतर) देख के खुश होता है। (फिर उसने) शरीर में ही सारे चस्के पैदा कर दिए हें।1। हे प्रभू! (तेरी अपनी कला से हरेक शरीर में) श्वासों का बाजा बज रहा है (श्वास चल रहे हैं), तू स्वयं ही ये साँसों के बाजे बजा रहा है। हे भाई! परमात्मा ने शरीर में जीवात्मा और माया (दोनों ही) डाल दिए हैं। गुरू की कृपा से जिस मनुष्य की सुरति माया की ओर से पलटती है, उसको आत्मिक जीवन वाला श्रेष्ठ गुरू-शबद प्राप्त हो जाता है।2। हे भाई! (माया के मोह का) अंधेरा और (आत्मिक जीवन की सूझ का) प्रकाश प्रभू ने स्वयं ही बनाया है। (सारे जगत में परमात्मा) स्वयं ही व्यापक है, (उसके बिना) कोई और नहीं है। जो मनुष्य गुरू की कृपा से अपने आत्मिक जीवन को पड़तालता रहता है, उसका हृदय-कमल-फूल खिला रहता है, उसको (आत्मिक जीवन की परख करने वाली) बुद्धि प्राप्त होती रहती है।3। हे भाई! अपनी गहरी आत्मिक अवस्था परमात्मा स्वयं ही जानता है। जगत तो (दूसरों से) सुन-सुन के (फिर) कह के (औरों को) सुनाता है। जो मनुष्य आत्मिक जीवन की सूझ वाला हो जाता है, वह गुरू के सन्मुख रह के (इस भेद को) समझता है, और, वह प्रभू की सदा कायम रहने वाली सिफत-सालाह करता रहता है।4। देही अंदरि वसतु अपारा ॥ आपे कपट खुलावणहारा ॥ गुरमुखि सहजे अम्रितु पीवै त्रिसना अगनि बुझाहा हे ॥५॥ सभि रस देही अंदरि पाए ॥ विरले कउ गुरु सबदु बुझाए ॥ अंदरु खोजे सबदु सालाहे बाहरि काहे जाहा हे ॥६॥ विणु चाखे सादु किसै न आइआ ॥ गुर कै सबदि अम्रितु पीआइआ ॥ अम्रितु पी अमरा पदु होए गुर कै सबदि रसु ताहा हे ॥७॥ आपु पछाणै सो सभि गुण जाणै ॥ गुर कै सबदि हरि नामु वखाणै ॥ अनदिनु नामि रता दिनु राती माइआ मोहु चुकाहा हे ॥८॥ {पन्ना 1056} पद्अर्थ: देही = शरीर। वसतु अपारा = बेअंत परमात्मा का नाम पदार्थ। आपे = आप ही। कपट = किवाड़, भिक्त। खुलावणहारा = खुलवाने वाला। गुरमुखि = गुरू की शरण पड़ कर। सहजे = आत्मिक अडोलता में। अंम्रितु = आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल।5। सभि रस = सारे चस्के। बुझाऐ = समझाता है, सूझ देता है। अंदरु = अंदरूनी, हृदय (शब्द 'अंदरि' और अंदरु' में फर्क है)। काहे जाहा = क्यों जाएगा? नहीं जाएगा।6। सादु = स्वाद, आनंद। कै सबदि = के शबद में (जोड़ के)। पीआइआ = पिलाता है। पी = पी के। अमरापदु = अमरपद, वह दर्जा जहाँ आत्मिक मौत अपना प्रभाव नहीं डाल सकती। रसु = आनंद। ताहा = उस को।7। आपु = अपने आप को, अपने आत्मिक जीवन को। सभि = सारे। जाणै = सांझ डालता है। सबदि = शबद से। वखाणै = उचारता है (एकवचन)। अनदिनु = हर रोज, हर वक्त। नामि = नाम में। रता = मस्त। चुकाहा = दूर कर लेता है।8। अर्थ: हे भाई! मनुष्य के शरीर में (ही) बेअंत परमात्मा का नाम-पदार्थ (मौजूद) है (पर मनुष्य की मति के चारों तरफ मोह की भिक्ति बनी रहती है), परमात्मा स्वयं ही इन किवाड़ों को खोलने में समर्थ है। जो मनुष्य गुरू के द्वारा आत्मिक अडोलता में टिक के आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीता है (वह मनुष्य अपने अंदर से माया की) तृष्णा की आग बुझा लेता है।5। हे भाई! परमात्मा ने मनुष्य के शरीर में ही सारे चस्के भी डाल दिए हुए हैं (नाम-वस्तु को ये कैसे मिले?)। किसी विरले को गुरू (अपने) शबद की सूझ बख्शता है। वह मनुष्य अपना अंदर खोजता है, शबद (के हृदय में बसा के परमात्मा की) सिफत-सालाह करता है, फिर वह बाहर भटकता नहीं।6। हे भाई! (नाम-अमृत मनुष्य के अंदर ही है, पर) चखे बिना किसी को (उसका) स्वाद नहीं आता। जिस मनुष्य को गुरू के शबद में जोड़ के परमात्मा यह अमृत पिलाता है, वह मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाला वह नाम-जल पी के उस अवस्था पर पहुँच जाता है, जहाँ आत्मिक मौत अपना असर नहीं डाल सकती, गुरू के शबद की बरकति से उसको (नाम-अमृत का) स्वाद आ जाता है।7। हे भाई! जो मनुष्य अपने आत्मिक जीवन को पड़तालता रहता है, वह सारे (रॅबी) गुणों से सांझ डालता है। गुरू के शबद में जुड़ के वह मनुष्य परमात्मा का नाम उचारता है। वह दिन-रात हर वक्त परमात्मा के नाम में मस्त रहता है, (और, इस तरह अपने अंदर से) माया का मोह दूर कर लेता है।8। |
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Sri Guru Granth Darpan, by Professor Sahib Singh |