श्री गुरू ग्रंथ साहिब दर्पण । टीकाकार: प्रोफैसर साहिब सिंह । अनुवादक भुपिन्दर सिंह भाईख़ेल |
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Page 1356 नह समरथं नह सेवकं नह प्रीति परम पुरखोतमं ॥ तव प्रसादि सिमरते नामं नानक क्रिपाल हरि हरि गुरं ॥२२॥ {पन्ना 1356} पद्अर्थ: समरथं = समर्था, ताकत। पुरखोतमं = उक्तम पुरुष, परमात्मा। तव = तेरी। प्रसादि = (प्रसादेन) कृपा से। गुर = सबसे बड़ा। अर्थ: हे परम उक्तम अकाल पुरख! हे कृपालु हरी! हे गुरू हरी! (मेरे अंदर सिमरन की) ना ही स्मर्थता है, ना ही मैं सेवक हूँ, ना ही मेरे अंदर (तेरे चरनों की) प्रीति है। (तेरा दास) नानक तेरी मेहर से (ही) तेरा नाम सिमरता है।22। भाव: जिस पर परमात्मा मेहर करे वह ही उसका नाम सिमरता है। अपने प्रयासों से मनुष्य भगती नहीं कर सकता। भरण पोखण करंत जीआ बिस्राम छादन देवंत दानं ॥ स्रिजंत रतन जनम चतुर चेतनह ॥ वरतंति सुख आनंद प्रसादह ॥ सिमरंत नानक हरि हरि हरे ॥ अनित्य रचना निरमोह ते ॥२३॥ {पन्ना 1356} पद्अर्थ: भरण पोखण = पालन पोषण। बिस्राम = विश्राम, ठिकाना, सहारा। छादन = कपड़ा। स्रिजंत = सृजंत (सृज = to create) पैदा करता है। चतुर = सियाना, स्मर्थ। चेतनह = (चित् = to pervceive), सजिंद, सब कुछ अनुभव कर सकने वाला। निरमोह = मोह से बचे हुए। ते = वे मनुष्य। प्रसादह = कृपा से। अर्थ: समर्थ चेतन्य-स्वरूप परमात्मा श्रेष्ठ मनुष्य जनम देता है, सारे जीवों का पालन-पोषण करता है, कपड़ा आसरा आदि दातें देता है। उस आनंद-रूप प्रभू की कृपा से जीव सुखी रहते हैं। हे नानक! जो जीव उस हरी को सिमरते हैं, वे इस नाशवान रचना से निर्मोह रहते हैं। भाव: जो मनुष्य सब दातें देने वाले परमात्मा का नाम सिमरते हैं, वे इन नाशवंत पदार्थों के मोह से बचे रहते हैं। दानं परा पूरबेण भुंचंते महीपते ॥ बिपरीत बुध्यं मारत लोकह नानक चिरंकाल दुख भोगते ॥२४॥ {पन्ना 1356} पद्अर्थ: परा पूरबेण = पूर्बले जन्मों में। भुंचंते = (भुज् = to possess) भोगते हैं, मल्कियत पाते हैं। महीपते = धरती के पति, (मही = धरती) राजा। बिपरीत = विपरीत, उल्टी। मारत लोकह = मातृ लोक, जगत। मारत = (मात्र्य = mortal) नाशवंत। दुख = (दु:ख) दुख। अर्थ: पिछले जन्मों में किए पुन्य कर्मों के सदका राजे (यहाँ राज-मिलख की) मल्कियत पाते हैं। पर, हे नानक! यहाँ नाशवंत जगत में (उन सुखों के कारण) जिनकी बुद्धि उल्टी हो जाती है, वे चिरंकाल तक दुख भोगते हैं।24। भाव: जगत में मल्कियतों और मौज-मेलों के कारण जो मनुष्य जीवन के उलट राह पर पड़ जाते हैं उनको अनेकों जूनियों के दुख सहने पड़ते हैं। ब्रिथा अनुग्रहं गोबिंदह जस्य सिमरण रिदंतरह ॥ आरोग्यं महा रोग्यं बिसिम्रिते करुणा मयह ॥२५॥ {पन्ना 1356} पद्अर्थ: ब्रिथा = व्यर्थ, खाली। अनुग्रहं = (अनुग्रह:क्ष् a favour) कृपा। जस्य = (येषां) जिन के। रिदंतरह = रिद+अंतर:, हृदय में। आरोग्यं = रोग रहित, अरोग, नरोए। बिसिम्रिते = भुला देते हैं। करुणायह = करुणा+मय:, तरस रूप, दया स्वरूप। अर्थ: जो मनुष्य गोबिंद की मेहर से खाली रह गए हैं, जिनके हृदय उसके सिमरने से वंचित हैं, वे नरोए मनुष्य भी बहुत बड़े रोगी हैं, क्योंकि वे दया-स्वरूप गोबिंद को बिसार रहे हैं। भाव: जो मनुष्य परमात्मा की याद भुला देते हैं वे शारीरिक तौर पर निरोगी होते हुए भी अनेकों रोग सहेड़ लेते हैं। रमणं केवलं कीरतनं सुधरमं देह धारणह ॥ अम्रित नामु नाराइण नानक पीवतं संत न त्रिप्यते ॥२६॥ {पन्ना 1356} पद्अर्थ: रमणं = जपना। सुधरमं = श्रेष्ठ धर्म। देह धारणह = देहधारी, मनुष्य। त्रिपते = (तृप् = to be contented तृप्यति) अघाते, संतुष्ट होते। केवलं = (कद्धवलं = Solely) सिर्फ। अंम्रित = आत्मिक जीवन देने वाला। अर्थ: केवल सिफतसालाह करनी मनुष्य का श्रेष्ठ धर्म है। हे नानक! संत जन परमात्मा का आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीते हुए अघाते नहीं।26। भाव: जिस मनुष्य को परमात्मा का नाम जपने की आदत पड़ जाती है वह इसके बिना नहीं रह सकता। सहण सील संतं सम मित्रस्य दुरजनह ॥ नानक भोजन अनिक प्रकारेण निंदक आवध होइ उपतिसटते ॥२७॥ {पन्ना 1356} पद्अर्थ: सहण = सहन। सील = शील, मीठा स्वभाव। सहण सील = सहन शील (patient, forgiving)। सम = बराबर। मित्रस्य = मित्र का। दुरजनह = (दुर्जन) बुरे मनुष्य। आवध = (आयुद्ध) शस्त्र, हथियार। उपतिसटते = (उपतिष्ठति = comes near) नजदीक आते हैं। अर्थ: संत जनों के लिए मित्र और शत्रु एक समान होते हैं। दूसरों की ज्यादती को सहना - ये उनका स्वभाव बन जाता है। हे नानक! मित्र तो अनेकों किस्मों का भोजन ले के, पर निंदक (उनको मारने के लिए) शस्त्र ले के उनके पास जाते हैं (वे दोनों को प्यार की दृष्टि से देखते हैं)।27। भाव: जो मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरते हैं, दूसरों की ज्यादती सहना उनका स्वभाव बन जाता है। तिरसकार नह भवंति नह भवंति मान भंगनह ॥ सोभा हीन नह भवंति नह पोहंति संसार दुखनह ॥ गोबिंद नाम जपंति मिलि साध संगह नानक से प्राणी सुख बासनह ॥२८॥ {पन्ना 1356} पद्अर्थ: तिरसकार = (तिरस्कार:) निरादरी। भवंति = (भवति, भवन:, भवन्ति। भु = to become) होता। मान भंगनह = निरादरी, अपमान। मिलि = मिल के। से प्रानी = वह लोग। जपंति = जपते हैं। पोहंति = (प्रभावयन्ति)। अर्थ: हे नानक! जो लोग साध-संगति में मिल के गोबिंद का नाम जपते हें, वह सुखी बसते हैं; उनकी कभी निरादरी नहीं हो सकती, उनका कभी अपमान नहीं हो सकता। उनकी कभी भी शोभा नहीं मिटती, और उनको संसार के दुख छू नहीं सकते।28। भाव: परमात्मा का नाम सिमरने वाले मनुष्य पर किसी के द्वारा की गई निरादरी अपना असर नहीं डाल सकती, कोई दुख-कलेश अपना जोर नहीं डाल सकता। सैना साध समूह सूर अजितं संनाहं तनि निम्रताह ॥ आवधह गुण गोबिंद रमणं ओट गुर सबद कर चरमणह ॥ आरूड़ते अस्व रथ नागह बुझंते प्रभ मारगह ॥ बिचरते निरभयं सत्रु सैना धायंते गुोपाल कीरतनह ॥ जितते बिस्व संसारह नानक वस्यं करोति पंच तसकरह ॥२९॥ {पन्ना 1356} पद्अर्थ: सैना = सेना, फौज। सूर = सूरमे। संनाहं = संजोअ (संनाह = armour)। तनि = तन पर। आवधह = शस्त्र (आयुद्ध)। कर = हाथ। चरमणह = (चर्मन) चमड़ी, ढाल। कर चरमणह = हाथ की ढाल। आरूड़ते = सवार होते हैं। अस्व = (अश्व) घोड़े। नागह = (नाग) हाथी। बिचरते = चलते फिरते हैं। सत्रु = (शत्रु) वैरी (कामादिक)। बिस्व = (विश्व) सारा। तसकरह = (तस्कर) चोर। साध समूह = सारे साध, संत जन। धायंते = (धावन्ति) हमला करते हैं। गुोपाल: अक्षर 'ग' के साथ दो मात्राएं 'ु' और 'ो' हैं। असल शब्द है 'गोपाल', यहां 'गुपाल' पढ़ना है। अर्थ: संत-जन अजीत शूरवीरों की सेना है। गरीबी स्वभाव उनके शरीर पर संजोअ है, गोबिंद के गुण गाने उनके पास शस्त्र हैं। गुरू-शबद की ओट उनके हाथ की ढाल है। संत-जन परमात्मा (के मिलाप) का रास्ता तलाशते रहते हैं- ये मानो, वे घोड़े रथ हाथियों की सवारी करते हैं। संत-जन परमात्मा की सिफतसालाह (की सहायता) से (कामादिक) वैरी-दल पर हमला करते हैं, और (इस तरह उनमें) निडर हो के उनमें चलते फिरते हैं। हे नानक! संत-जन उन पाँच चोरों को अपने वश में कर लेते हैं जो सारे संसार को जीत रहे हैं। भाव: विनम्रता, सिमरन, शबद की ओट -जिस मनुष्य के पास हर वक्त ये हथियार हैं, कामादिक विकार उस पर अपना प्रभाव नहीं डाल सकते। म्रिग त्रिसना गंधरब नगरं द्रुम छाया रचि दुरमतिह ॥ ततह कुट्मब मोह मिथ्या सिमरंति नानक राम राम नामह ॥३०॥ {पन्ना 1356} पद्अर्थ: म्रिग त्रिसना = मृग तृष्णा, हिरन की प्यास। मृग मरीचिका, ठगनीरा, रेतीला इलाका जो सूरज की तपश में पानी का दरिया प्रतीत होता है। प्यास से घबराया हिरन पानी की ओर दौड़ता है, वह ठॅगनीरा आगे और आगे बढ़ता जाता है। इस तरह हिरन दौड़ते-दौड़ते प्यासा तड़प के मर जाता है (mirage)। गंधरब नगरं = आकाश में बसती नगरी। द्रुम = वृक्ष। रचि = रच के, सही मान लेता है। ततह = वहाँ, उसी तरह (for that reason)। मिथ्या = नाशवंत, झूठा (मिथ्या = to no purpose)। दुरमतहि = (दुर्मति:) बुरी मति वाले। अर्थ: दुर्मति वाला व्यक्ति मृग मारीचिका को हवाई किले को और वृक्ष की छाया को सही समझ लेता है। उसी तरह नाशवंत कुटंब का मोह है। हे नानक! (इसको त्याग के संत-जन) परमात्मा के नाम का सिमरन करते हें।30। भाव: जो मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरता है, वह परिवार के मोह में नहीं फसता। नच बिदिआ निधान निगमं नच गुणग्य नाम कीरतनह ॥ नच राग रतन कंठं नह चंचल चतुर चातुरह ॥ भाग उदिम लबध्यं माइआ नानक साधसंगि खल पंडितह ॥३१॥ {पन्ना 1356} पद्अर्थ: न च = और नहीं, ना ही। निगमं = वेद। निधान = खजाना। गुणग्य = (गुणज्ञ) गुणों को जानने वाला। चातुरह = समझदार। खल = मूर्ख। चतुर चातुरह = समझदारों का भी समझदार। चंचल = चुस्त। कंठ = गला। निधान = खजाना। साध संगि = साध-संगति में। अर्थ: ना ही मैं वेद-विद्या का खजाना हूँ, ना ही मैं गुणों का पारखू हूँ, ना ही मेरे पास परमात्मा की सिफत-सालाह है। मेरे गले में श्रेष्ठ राग भी नहीं, ना ही मैं चुस्त और बहुत समझदार हूँ। पूर्बले भाग्यों अनुसार उद्यम करने से माया मिलती है (वह भी मेरे पास नहीं)। (पर) हे नानक! साध-संगति में आ के मूर्ख भी पंडित (बन जाता है, यही मेरा भी आसरा है)।31। भाव: साध-संगति में टिक के मूर्ख मनुष्य भी समझदार बन जाता है, क्योंकि वहाँ वह जीवन का सही रास्ता पा लेता है। कंठ रमणीय राम राम माला हसत ऊच प्रेम धारणी ॥ जीह भणि जो उतम सलोक उधरणं नैन नंदनी ॥३२॥ {पन्ना 1356} पद्अर्थ: कंठ = गला। रमणीय = सुंदर। हसत = हस्त, हाथ। हसत ऊच = गोमुखी, मालधानी, एक थैली जिसका आकार गऊ के मुख जैसा होता है, जिसमें माला डाल के फेरी जाती है। हिन्दू शास्त्रों के अनुसार इसको जमीन से छूहाने की आज्ञा नहीं, छाती की कौडी से हाथ लगा के जप करने की आज्ञा है। इसीलिए इसका नाम 'हस्त ऊच' है। धारणी = टिकाई। जीह = जीभ। भणि = उचारता है, भणै। नंदनी = (नन्दन = pleasing) खुश करने वाली। नैन नंदनी = आँखों को खुश करने वाली, माया। नैन = नयन, आँखें। अर्थ: जो मनुष्य (गले से) परमात्मा के नाम के उच्चारण को गले की सुंदर माला बनाता है, (हृदय में) प्रेम टिकाने को माला की थैली बनाता है, जो मनुष्य जीभ से सिफत-सालाह की बाणी उचारता है, वह माया के प्रभाव से बच जाता है।32। भाव: परमात्मा का नाम जपने से और हृदय में प्रभू का पयार टिकाने से मनुष्य सोहणी माया के प्रभाव से बचा रहता है। गुर मंत्र हीणस्य जो प्राणी ध्रिगंत जनम भ्रसटणह ॥ कूकरह सूकरह गरधभह काकह सरपनह तुलि खलह ॥३३॥ {पन्ना 1356} पद्अर्थ: हीणस्य = हीन। भ्रसटणह = भ्रष्ट बुद्धि वाला। कूकरह = कुक्ता। सूकरह = सूअर। गरबह = गधा। काकह = कौआ। तुलि = तुल्य, बराबर। खलह = (खल:) मूर्ख। अर्थ: जो मनुष्य सतिगुरू के उपदेश से वंचित है, उस भ्रष्ट बुद्धि वाले का जीवन धिक्कार-योग्य है। वह मूर्ख कुत्ते, सूअर, गधे, कौए, साँप के बराबर है।33। भाव: जो मनुष्य गुरू के बताए हुए रास्ते पर नहीं चलता, वह विकारों में गलतान रहता है और चारों तरफ से उसको धिक्कारें ही पड़ती हैं। चरणारबिंद भजनं रिदयं नाम धारणह ॥ कीरतनं साधसंगेण नानक नह द्रिसटंति जमदूतनह ॥३४॥ {पन्ना 1356-1357} पद्अर्थ: चरणारबिंद = चरण+अरबिंद, चरण कमल (अरविंद = कमल का फूल)। जम दूतनह = जमराज के दूत। अर्थ: जो मनुष्य अपने हृदय में परमात्मा का नाम बसाता है, परमात्मा के चरण-कमलों को सिमरता है, साध-संगति में जुड़ के परमात्मा की सिफतसालाह करता है, हे नानक! जमराज के दूत उस मनुष्य की ओर देख (भी) नहीं सकते (क्योंकि विकार उसके नजदीक नहीं आते)।34। भाव: साध-संगति का आसरा ले के जो मनुष्य सदा परमात्मा का नाम सिमरता है, विकार उसके नजदीक नहीं फटक सकते। |
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Sri Guru Granth Darpan, by Professor Sahib Singh |