श्री गुरू ग्रंथ साहिब दर्पण । टीकाकार: प्रोफैसर साहिब सिंह । अनुवादक भुपिन्दर सिंह भाईख़ेल

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घर मंदर खुसी नाम की नदरि तेरी परवारु ॥ हुकमु सोई तुधु भावसी होरु आखणु बहुतु अपारु ॥ नानक सचा पातिसाहु पूछि न करे बीचारु ॥४॥

पद्अर्थ: तुधु भावसी = तेरी रजा में रहना। होरु आखणु = और हुक्म करने का वचन। पूछि = पूछ के।4।

अर्थ: महलों का बसेरा (मेरे वास्ते) तेरा नाम जपने से पैदा हुई खुशी ही है। तेरी मेहर की नजर मेरा कुटंब है (जो खुशी मुझे अपना परिवार देख के होती है, वही तेरी मेहर की नज़र में से मिलेगी)। (दुनिया से अपना) हुक्म (मनवाना) तथा (हुक्म के) और-और बोल बोलने (और इसमें खुशी महसूस करनी मेरे वास्ते) तेरी रजा में राजी रहना है।

हे नानक! सदा स्थिर रहने वाला प्रभु पातशाह ऐसे जीवन वाले से (कोई) सवाल जवाब नहीं करता (भाव, उसका जीवन उसकी नज़रों में स्वीकार है)।4।

बाबा होरु सउणा खुसी खुआरु ॥ जितु सुतै तनु पीड़ीऐ मन महि चलहि विकार ॥१॥ रहाउ॥४॥७॥

पद्अर्थ: सउणा = दुनियावी मौजे मनानी। जितु सुतै = जिस शौ-ईश्रत के द्वारा। रहाउ।

अर्थ: हे भाई! (प्रभु की महिमा की खुशी छोड़ के) अन्य ऐशौ-ईश्रत की खुशी खुआर करती है, क्योंकि, और-और ऐशौ-ईश्रत शरीर को रोगी करते हैंऔर मन में भी विकार चल पड़ते हैं।1। रहाउ।4।7। रहाउ।

सिरीरागु महला १ ॥ कुंगू की कांइआ रतना की ललिता अगरि वासु तनि सासु ॥ अठसठि तीरथ का मुखि टिका तितु घटि मति विगासु ॥ ओतु मती सालाहणा सचु नामु गुणतासु ॥१॥

पद्अर्थ: कुंगू = केसर। कांइआ = काया, शरीर। रतन = (भाव) प्रभु की महिमा। ललिता = जीभ। अगरि = ऊद की लकड़ी से। वासु = सुगंधि। तनि = शरीर में। सासु = (हरेक) सुआस। अठसठि = अढ़सठ। मुखि = मुंह पे, माथे पे। तितु घ्टि = उस शरीर में, उस मनुष्य के अंदर। विगासु = आनन्द, खुशी। ओतु मती = उस मति से ही। गुण तासु = गुणों का खजाना प्रभु।1।

अर्थ: जिस मनुष्य का शरीर केसर (जैसा शुद्ध विकार रहित) हो, जिसकी जिहवा (प्रभु की महिमा के) रतनों से जड़ी हो, जिसके शरीर के हरेक श्वासउस की लकड़ी की सुगंधि वाली हो (भाव, प्रभु के नाम की याद से सुगन्धित हों), जिस मनुष्य के माथे पे अढ़सठ तीर्थों का टीका लगा हो (भाव, जो प्रभु का नाम जप के अढ़सठ तीरथों से भी ज्यादा पवित्र हो चुका हो) उस मनुष्य के अंदर मति खिलती है, उस प्रफूल्लित हुई बुद्धि से ही सच्चा नाम सलाहा जा सकता है, गुणों का खजाना प्रभु सराहा जा सकता है।1।

बाबा होर मति होर होर ॥ जे सउ वेर कमाईऐ कूड़ै कूड़ा जोरु ॥१॥ रहाउ॥

पद्अर्थ: बाबा = हे भाई! कमाईऐ = कमाई करें, उद्यम करें। कूड़ै = झूठ के साथ। रहाउ।

अर्थ: हे भाई! प्रभु के नाम से वंचित हुई बुद्धि (आदमी को) और-और ही तरफ ले जाती है। महिमा छोड़ के अगर और कर्म सैकड़ों बार भी करें (तो कुछ नहीं बनता, क्योंकि,) झूठा कर्म करने से झूठ का ही जोर बढ़ता है।1। रहाउ।

पूज लगै पीरु आखीऐ सभु मिलै संसारु ॥ नाउ सदाए आपणा होवै सिधु सुमारु ॥ जा पति लेखै ना पवै सभा पूज खुआरु ॥२॥

पद्अर्थ: पूज = पूजा, मान्यता। सभु = सारा। सिधु = योग साधनों में निपुण योगी। सभा = सारी। लेखै = किये कर्मों का हिसाब होने के समय।2।

अर्थ: अगर कोई मनुष्य पीर कहलाने लगे, सारा संसार आ के उसके दर्शन करे, उसकी पूजा होने लग जाए, यदि वह पहुँचा हुआ (करामाती) योगी गिना जाने लगे, बहुत नामवर मशहूर हो जाए (तो भी ये सब कुछ किसी अर्थ के नहीं, क्योंकि) अगर प्रभु की हजूरी में किये कर्मों का हिसाब होने के समय उसको इज्जत नहीं मिलती, तो (दुनिया में हुई) सारी पूजा खुआर ही करती है।2।

जिन कउ सतिगुरि थापिआ तिन मेटि न सकै कोइ ॥ ओना अंदरि नामु निधानु है नामो परगटु होइ ॥ नाउ पूजीऐ नाउ मंनीऐ अखंडु सदा सचु सोइ ॥३॥

पद्अर्थ: सतिगुरि = गुरु ने। थापिआ = थापना दी, दिलासा दी। नामो = नाम ही। अखण्ड = एकरस, सदा, लगातार।3।

अर्थ: जिस लोगों को सत्गुरू ने साबाशी दी है, उनकी उस इज्जत को कोई मिटा नहीं सकता (क्योंकि) उनके हृदय में प्रभु के नाम का खजाना बसता है उनके अंदर नाम ही बसता है। (ये पक्का नियम जानो कि) प्रभु का नाम ही पूजा जाता है, नाम हीसत्कारा जाता है। प्रभु ही सदा एक रस सदा स्थिर रहने वाला है।3।

खेहू खेह रलाईऐ ता जीउ केहा होइ ॥ जलीआ सभि सिआणपा उठी चलिआ रोइ ॥ नानक नामि विसारिऐ दरि गइआ किआ होइ ॥४॥८॥

पद्अर्थ: खेह = मिट्टी। जिउ = जान। केहा होइ = बुरी हालत होती है। सभि = सारी। रोइ = दुखी हो के। नाम विसारिऐ = यदि प्रभु का नाम विसार दिया जाए। दरि = (प्रभु के) दर पे। किआ होइ = बुरी हालत ही होती है।4।

अर्थ: (जो मनुष्यों ने कभी नाम नहीं जपा, उनका) शरीर जब मिट्टी हो के मिट्टी में मिल गया, तो नामहीन जिंद का हाल बुरा ही होता है। (दुनियां में की) सारी चतुराईयां राख हो जातीं हैं, जगत से जीव दुखी हो के ही चलता है।

हे नानक! अगर प्रभु का नाम भुला दें, तो प्रभु के दर पे पहुँच के बुरा हाल ही होता है।4।7।

सिरीरागु महला १ ॥ गुणवंती गुण वीथरै अउगुणवंती झूरि ॥ जे लोड़हि वरु कामणी नह मिलीऐ पिर कूरि ॥ ना बेड़ी ना तुलहड़ा ना पाईऐ पिरु दूरि ॥१॥

पद्अर्थ: गुणवंती = गुणवान स्त्री। वीथरे = विथार करती है, कथन करती है। झूरि = झुरती है, चिंतित रहती है। वरु = वर, खसम, प्रभु। कामणी = हे जीव-स्त्री! नह मिलिऐ पिर = पति को नहीं मिल सकते। कूरि = झूठ द्वारा, झूठे मोह में पड़े रहने से। तुलहड़ा = तुलहा, लकड़ी का बना हुआ आसरा जिस पे बैठ के नदी के किनारे रहने वाले नदी पार कर लेते हैं।1।

अर्थ: जिस जीव-स्त्री ने अपने हृदय में प्रभु की महिमा बसाई हई है वह प्रभु के गुणों की ही कथा वारता करती है। पर, जिसके अंदर (माया के मोह के कारण) औगुण ही औगुण हैं वह (अपने ही औगुणों के प्रभाव से) सदा चिंतातुर रहती है। हे जीव-स्त्री! तू प्रभु पति को मिलना चाहती है, तो (याद रख कि) झूठे मोह में फसे रहने से प्रभु-पति को नहीं मिल सकती। (तू तो मोह के समुंदर में गोते खा रही है) तेरे पास ना बेड़ी (नाव) है ना तुलहा है, इस तरह प्रभु पति नहीं मिल सकता, (क्योंकि) वह तो (इस संसार समुंदर से पार है) दूर है।1।

मेरे ठाकुर पूरै तखति अडोलु ॥ गुरमुखि पूरा जे करे पाईऐ साचु अतोलु ॥१॥ रहाउ॥

पद्अर्थ: मेरे ठाकुर अडोलु = मेरे ठाकुर का अहिल ठिकाना। तखति = तख्त पर। गुरमुखि पूरा = पूरा गुरु। जे करे = यदि मेहर करे।1। रहाउ।

अर्थ: मेरे पालनहार प्रभु का अहिल ठिकाना उस तख्त पर है जो (प्रभु की तरह ही) संपूर्ण है (जिसमें कोई कमी नहीं है)। वह प्रभु सदा स्थिर रहने वाला है, उसका तौल माप बताया नहीं जा सकता। पूरा गुरु यदि मेहर करे, तोही वह मिल सकता है।1। रहाउ।

प्रभु हरिमंदरु सोहणा तिसु महि माणक लाल ॥ मोती हीरा निरमला कंचन कोट रीसाल ॥ बिनु पउड़ी गड़ि किउ चड़उ गुर हरि धिआन निहाल ॥२॥

पद्अर्थ: तिसु महि = उस (हरिमंदर में)। माणक = मोती। कंचन कोट = सोने के किले। रीसाल = सुंदर, आनन्द का घर, आनंद देने वाले। गढ़ि = किले पर। गुर धिआन = गुरु (चरणों का) ध्यान। निहाल = दिखा देता है।2।

अर्थ: हरि प्रमात्मा (मानों) एक खूबसूरत सा मन्दिर है जिसमें माणक लाल मोती व चमकते हीरे हैं (जिसके चारों तरफ) सोने के सुन्दर किले हैं। पर उस (मंदिर) किले पर सीढ़ी के बिना चढ़ा नही जा सकता। हाँ, यदि गुरु चरणों का ध्यान धरा जाए, जो प्रभु चरणों का ध्यान धरा जाए, तो दर्शन हो जाता है।2।

गुरु पउड़ी बेड़ी गुरू गुरु तुलहा हरि नाउ ॥ गुरु सरु सागरु बोहिथो गुरु तीरथु दरीआउ ॥ जे तिसु भावै ऊजली सत सरि नावण जाउ ॥३॥

पद्अर्थ: सरु = तालाब। सागरु = समुंदर। बोहिथो = जहाज़। तिसु भावै = उस (गुरु) को अच्छा लगे। ऊजली = मति उज्जवल हो जाती है। सतसरि = सत्संग सरोवर में। नावण = स्नान करने के लिए, मन धोने के लिए।3।

अर्थ: उस (हरि मंदिर किले के ऊपर चढ़ने के लिए) गुरु सीढ़ी है। (इस संसार समुंदर से पार लांघने के वास्ते) गुरु नाव है, प्रभु का नाम (देने वाला) गुरु तुलहा है। गुरु सरोवर है, गुरु समुंदर है, गुरु ही जहाज है, गुरु ही तीर्थ है, और दरिया है। यदि प्रभु की रजा हो, तो (गुरु को मिल के) मनुष्य की बुद्धि शुद्ध हो जाती है। (क्योंकि) मनुष्य साधु-संगत सरोवर में (मानसिक) स्नान करने जाने लग पड़ता है।3।

पूरो पूरो आखीऐ पूरै तखति निवास ॥ पूरै थानि सुहावणै पूरै आस निरास ॥ नानक पूरा जे मिलै किउ घाटै गुण तास ॥४॥९॥

पद्अर्थ: थानि = जगह पर। पूरै = पूरी करता है। आस निरास = निराशों की आस। किउ घटै = नहीं घटते। तास = उस (जीव) के।4।

अर्थ: हर कोई कहता है कि परमात्मा में कोई कमी नही है, उसका निवास भी ऐसे तख्त पर है जिसमें कोई कमी नहीं है। वह पूरा प्रभु सुंदर कमी रहित जगह पर बैठा हैऔर टूटे दिल वालों की उम्मीदें पूरी करता है। हे नानक! वह पूर्ण प्रभु अगर मनुष्य को मिल जाए तो उसके गुणों में भी कैसे कोई कमी आ सकती है? 4।9।

सिरीरागु महला १ ॥ आवहु भैणे गलि मिलह अंकि सहेलड़ीआह ॥ मिलि कै करह कहाणीआ सम्रथ कंत कीआह ॥ साचे साहिब सभि गुण अउगण सभि असाह ॥१॥

पद्अर्थ: गलि = गले से। अंकि = अंक में, जफी में, अंग लगा के। भैणे सहेलड़ीआह = हे बहनो! हे सहेलियो! करह = आओ हम करें। संम्रथ = सभ ताकतों हवाले। सभि = सारे। असाह = हमारे ही।1।

अर्थ: हे सत्संगी सहेलियो व बहनों! आओ, प्यार से (सत्संग में) इकट्ठे हों, सत्संग में मिल के उस प्रभु-पति की बातें करें जो सर्व-शक्तिमान है। (हे सहेलिओ!) उस सदा स्थिर मालक में सारे ही गुण हैं (उस से विछुड़ के ही) सारे अवगुण हमारे में आ जाते हैं।1।

करता सभु को तेरै जोरि ॥ एकु सबदु बीचारीऐ जा तू ता किआ होरि ॥१॥ रहाउ॥

पद्अर्थ: करता = हे कर्तार! सभु को = हरेक जीव। तेरै जोरि = तेरे हुक्म में। एकु सबदु = प्रभु की महिमा की वाणी। किआ = क्या (बिगाड़ सकते हैं)? ।1। रहाउ।

अर्थ: हे कर्तार! हरेक जीव तेरे हुक्म में (ही चल सकता है)। जब तेरी महिमा की वाणी का विचार करते हैं (तब ये समझ आती है कि) जब तू (हमारे सिर पर रक्षक है, रखवाला है), तो और कोई हमारा क्या बिगाड़ सकते हैं।1 रहाउ।

जाइ पुछहु सोहागणी तुसी राविआ किनी गुणीं ॥ सहजि संतोखि सीगारीआ मिठा बोलणी ॥ पिरु रीसालू ता मिलै जा गुर का सबदु सुणी ॥२॥

पद्अर्थ: जाइ = जा के। राविआ = रचा मचा, व्याप्त, मिलाप हासिल किया। गुणी = गुणों से। सहजि = सहजता से, अडोल अवस्था से। रीसालु = सुंदर रस का घर, आनन्द दाता।2।

अर्थ: (हे सत्संगी बहिनों! बेशक) जा के सुहागन (जीव-स्त्री) को पूछ लो कि तुमने किन गुणों से प्रभु मिलाप हासिल किया है। वहाँ से यही पता लगेगा कि वे अडोलता से, संतोष से और मीठे बोलों से श्रिंगारी हुई हैं (तभी उन्हें मिल गया)। वह आनन्द दाता प्रभु-पति तभी मिलता है, जब गुरु का उपदेश ध्यान से सुना जाए (तथा संतोष, मृदुभाषी मीठे बोलों वाले गुण धारण किये जाएं)।2।

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Sri Guru Granth Darpan, by Professor Sahib Singh