श्री गुरू ग्रंथ साहिब दर्पण । टीकाकार: प्रोफैसर साहिब सिंह । अनुवादक भुपिन्दर सिंह भाईख़ेल |
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Page 161 इसु कलिजुग महि करम धरमु न कोई ॥ कली का जनमु चंडाल कै घरि होई ॥ नानक नाम बिना को मुकति न होई ॥४॥१०॥३०॥ पद्अर्थ: चण्डाल = कुकर्मी मनुष्य। घरि = हृदय में।4। अर्थ: कुकर्मी मनुष्य के हृदय में (जैसे) कलियुग आ जाता है। इस कलियुग (भाव, कुकर्म दशा) के पंजे में फंसने से कोई कर्म-धर्म छुड़ा नहीं सकता। हे नानक! परमात्मा के नाम के बिना कोई मनुष्य (कलियुग से) मुक्ति नहीं पा सकता।4।10।30। गउड़ी महला ३ गुआरेरी ॥ सचा अमरु सचा पातिसाहु ॥ मनि साचै राते हरि वेपरवाहु ॥ सचै महलि सचि नामि समाहु ॥१॥ पद्अर्थ: सचा = सदा स्थिर कायम रहने वाला, अटल। अमरु = हुक्म। मनि = मन से। सचै = सदा स्थिर प्रभु में। महलि = महल में। समाहु = समाई, लीनता।1। अर्थ: परमात्मा (जगत का) सदा स्थिर रहने वाला पातशाह है, उसका हुक्म अटल है। जो मनुष्य (अपने) मन से सदा स्थिर परमात्मा (के नाम रंग) में रंगे जाते हैं, वे उस वेपरवाह हरि का रूप हो जाते हैं। वह उस सदा कायम रहने वाले परमात्मा की हजूरी में रहते हैं। उसके सदा स्थिर नाम में लीनता प्राप्त कर लेते हैं।1। सुणि मन मेरे सबदु वीचारि ॥ राम जपहु भवजलु उतरहु पारि ॥१॥ रहाउ॥ पद्अर्थ: मन = रे मन! वीचारि = सोच मंडल में टिकाए रख।1। रहाउ। अर्थ: हे मेरे मन! (गुरु की शिक्षा) सुन। गुरु के शब्द को (अपने) सोच मण्डल में बसा के रख। अगर तू परमात्मा का नाम सिमरेगा, तो संसार समुंदर से पार लांघ जाएगा।1। रहाउ। भरमे आवै भरमे जाइ ॥ इहु जगु जनमिआ दूजै भाइ ॥ मनमुखि न चेतै आवै जाइ ॥२॥ पद्अर्थ: भरमे = भटकना में ही। आवै = पैदा होता है। जाइ = मरताहै। दूजै भाइ = और-और प्यार में।2। अर्थ: पर ये जगत (अपने मन के पीछे चल के) माया के मोह में फंस के जनम-मरण के चक्र में पड़ा रहताहै। माया की भटकना में ही पैदा होता है और माया की भटकना में ही मरता है। अपने मन के पीछे चलने वाला जगत परमात्मा को याद नहीं करता और पैदा होता, मरता रहता है।2। आपि भुला कि प्रभि आपि भुलाइआ ॥ इहु जीउ विडाणी चाकरी लाइआ ॥ महा दुखु खटे बिरथा जनमु गवाइआ ॥३॥ पद्अर्थ: कि = या, चाहे। प्रभि = प्रभु ने। विडाणी = बेगानी।3। अर्थ: ये जीव खुद ही गलत रास्ते पर पड़ा है या परमात्मा ने खुद इसे गलत रास्ते पर डाला हुआ है (ये बात स्पष्ट है कि ये अपनी असलियत भुलाए बैठा है और माया के मोह में फंस के) ये जीव बेगानी नौकरी हीकर रहा है (जिससे) ये बहुत दुख ही कमाता है और मानव जन्म व्यर्थ गवा रहा है।3। किरपा करि सतिगुरू मिलाए ॥ एको नामु चेते विचहु भरमु चुकाए ॥ नानक नामु जपे नाउ नउ निधि पाए ॥४॥११॥३१॥ पद्अर्थ: नउनिधि = नौ खजाने।4। अर्थ: परमात्मा अपनी मेहर करके जिस मनुष्य को गुरु मिलाता है, वह मनुष्य (माया का मोह छोड़ के) केवल परमात्मा का नाम स्मरण करता है, तथा, अपने अंदर से माया वाली भटकना दूर कर लेता है। हे नानक! वह मनुष्य सदा हरि नाम स्मरण करता है और हरि-नाम-खजाना प्राप्त करता है जो (उसके वास्ते, जैसे, जगत के सारे) नौ खजाने हैं।4।11।31। गउड़ी गुआरेरी महला ३ ॥ जिना गुरमुखि धिआइआ तिन पूछउ जाइ ॥ गुर सेवा ते मनु पतीआइ ॥ से धनवंत हरि नामु कमाइ ॥ पूरे गुर ते सोझी पाइ ॥१॥ पद्अर्थ: गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ के। पूछउ = मैं पूछता हूँ। जाइ = जा के। पतीआइ = पतीजता है। ते = से।1। अर्थ: जिस मनुष्यों ने गुरु के राह पर चल कर परमात्मा का नाम स्मरण किया है (जब) मैं उनसे (नाम जपने की विधि) पूछता हूँ (तो वह बताते हैं कि) गुरु की बताई हुई सेवा से (ही) मनुष्य का मन (प्रभु स्मरण में) पतीजता है। (गुरु की शरण पड़ने वाले) वे मनुष्य परमात्मा का नाम-धन कमा के धनाढ हो जाते हैं। ये सद्बुद्धि पूरे गुरे से ही मिलती है।1। हरि हरि नामु जपहु मेरे भाई ॥ गुरमुखि सेवा हरि घाल थाइ पाई ॥१॥ रहाउ॥ पद्अर्थ: घाल = मेहनत। थाइ पाई = स्वीकार करता है।1। रहाउ। अर्थ: हे मेरे भाई! (गुरु की शरण पड़ के) सदा परमात्मा का नाम स्मरण करते रहो। गुरु के द्वारा की हुई सेवा भक्ति की मेहनत परमात्मा स्वीकार कर लेता है।1। रहाउ। आपु पछाणै मनु निरमलु होइ ॥ जीवन मुकति हरि पावै सोइ ॥ हरि गुण गावै मति ऊतम होइ ॥ सहजे सहजि समावै सोइ ॥२॥ पद्अर्थ: आपु = अपने आत्मिक जीवन को। पछाणै = पड़तालता है। सहजे = आत्मिक अडोलता में।2। अर्थ: (गुरु के द्वारा जो मनुष्य) अपने आत्मिक जीवन की पड़ताल करता है, उसका मन पवित्र हो जाता है। वह इस जनम में ही माया के बंधनों से मुक्ति हासिल कर लेता है और परमात्मा को मिल जाता है। जो मनुष्य (गुरु की शरण पड़ के) परमात्मा के गुण गाता है, उसक बुद्धि श्रेष्ठ हो जाती है। वह सदैव आत्मिक अडोलता में टिका रहता है।2। दूजै भाइ न सेविआ जाइ ॥ हउमै माइआ महा बिखु खाइ ॥ पुति कुट्मबि ग्रिहि मोहिआ माइ ॥ मनमुखि अंधा आवै जाइ ॥३॥ पद्अर्थ: दूजै भाइ = माया के प्यार में। महा बिखु = बड़ा जहर। खाइ = खा जाता है। पुति = पुत्र (के मोह) से। कुटंबि = परिवार (के मोह) से। ग्रिहि = घर (के मोह) से। माइ = माया।3। अर्थ: (हे मेरे भाई!) माया के मोह में फंसे रहने से ईश्वर की सेवा-भक्ति नहीं हो सकती। अहंकार एक बड़ा जहर है। माया का मोह बड़ा जहर है (ये जहर मनुष्य के आत्मिक जीवन को) समाप्त कर देता है। माया (मनुष्य को) पुत्र (के मोह) के द्वारा, परिवार (के मोह) के द्वारा, घर (के मोह) के द्वारा ठगती रहती है। (माया के मोह में) अंधा हुआ मनुष्य अपने मन के पीछे चल के जनम मरण के चक्र में पड़ा रहता है।3। हरि हरि नामु देवै जनु सोइ ॥ अनदिनु भगति गुर सबदी होइ ॥ गुरमति विरला बूझै कोइ ॥ नानक नामि समावै सोइ ॥४॥१२॥३२॥ पद्अर्थ: जनु = सेवक। अनदिनु = हर रोज।4। अर्थ: परमात्मा (गुरु के द्वारा जिस मनुष्य को) अपने नाम की दाति देता है, वह मनुष्य (उसका) सेवक बन जाता है। गुरु के शब्द द्वारा ही हर रोज परमात्मा की भक्ति हो सकती है। गुरु की मति लेकर ही कोई विरला मनुष्य (जीवन उद्देश्य को) समझता है। और, हे नानक! वह मनुष्य परमात्मा के नाम में लीन रहता है।4।12।32। गउड़ी गुआरेरी महला ३ ॥ गुर सेवा जुग चारे होई ॥ पूरा जनु कार कमावै कोई ॥ अखुटु नाम धनु हरि तोटि न होई ॥ ऐथै सदा सुखु दरि सोभा होई ॥१॥ पद्अर्थ: गुर सेवा = गुरु की बताई सेवा भक्ति। ऐथै = इस लोक मे। दरि = प्रभु की हजूरी में।1। अर्थ: गुरु की बताई सेवा करने का नियम सदा से ही चला आ रहा है (चारों युगों में ही स्वीकार है)। कोई पूर्ण मनुष्य ही गुरु की बताई सेवा (पूरी श्रद्धा से) करता है। (जो मनुष्य गुरु की बताई कार पूरी श्रद्धा से करता है वह) कभी ना खत्म होने वाला हरि नाम धन (एकत्र कर लेता है, उस धन में कभी) घाटा नहीं पड़ता। (ये नाम धन एकत्र करने वाला मनुष्य) इस लोक में सदा आत्मिक आनंद पाता है, प्रभु की हजूरी में भी उसे शोभा मिलती है।1। ए मन मेरे भरमु न कीजै ॥ गुरमुखि सेवा अम्रित रसु पीजै ॥१॥ रहाउ॥ पद्अर्थ: भरमु = शक। अंम्रित रसु = आत्मिक जीवन देने वाला नाम रस।1। रहाउ। अर्थ: हे मेरे मन! (गुरु की बताई शिक्षा पर) शक नहीं करना चाहिए। गुरु की बताई सेवा-भक्ति करके आत्मिक जीवन देने वाला हरि नाम रस पीना चाहिए।1। रहाउ। सतिगुरु सेवहि से महापुरख संसारे ॥ आपि उधरे कुल सगल निसतारे ॥ हरि का नामु रखहि उर धारे ॥ नामि रते भउजल उतरहि पारे ॥२॥ पद्अर्थ: संसारे = संसार में। उर = हृदय (उरस्)। भउजल = संसार समुंदर।2। अर्थ: जो मनुष्य गुरु की शरण पड़ते हैं, वे संसार में महापुरुष माने जाते हैं। अपनी सारी कुलों को भी पार लंघा लेते हैं। वे परमात्मा का नाम सदा अपने दिल में संभाल के रखते हैं। प्रभु-नाम (के रंग) में रंगे हुए वो मनुष्य संसार समुंदर से पार लांघ जाते हैं।2। सतिगुरु सेवहि सदा मनि दासा ॥ हउमै मारि कमलु परगासा ॥ अनहदु वाजै निज घरि वासा ॥ नामि रते घर माहि उदासा ॥३॥ पद्अर्थ: मनि = मन में। कमलु = हृदय कमल। अनहदु = एक रस (अनाहत् = बिना बजाए)।3। अर्थ: जो मनुष्य गुरु की शरण पड़ते हैं, वो अपने मन में सदा (सभी के) दास बन के रहते हैं, वे अपने अंदर से अहंकार दूर कर लेते हैं और उनका कमल रूपी हृदय खिला रहता है। उनके अंदर (महिमा का, जैसे, बाजा) एक रस बजता रहता है। उनकी तवज्जो प्रभु चरणों में टिकी रहती है। प्रभु नाम में रंगे हुए वे मनुष्य गृहस्थ में रहते हुए भी माया के मोह से निर्लिप रहते हैं।3। सतिगुरु सेवहि तिन की सची बाणी ॥ जुगु जुगु भगती आखि वखाणी ॥ अनदिनु जपहि हरि सारंगपाणी ॥ नानक नामि रते निहकेवल निरबाणी ॥४॥१३॥३३॥ पद्अर्थ: सची = सदा स्थिर। भगती = भक्तों ने। आखि = कह के, उचार के। सारंगपाणी = परमात्मा (सारंग = धनुष; पाणि = हाथ; जिसके हाथ में धनुष है, धर्नुधारी)। निरबाणी = निर्वाण, वासना रहित। निहकेवल = (निष्कैवल्य) शुद्ध।4। अर्थ: जो मनुष्य गुरु की शरण पड़ते हैं (परमात्मा की महिमा में उचारी हुई) उनकी वाणी सदा ही अटल हो जाती है। हरेक युग में (सदा ही) भक्तजन वह वाणी उचार के (और लोगों को भी) सुनाते हैं। वह मनुष्य हर रोज सारंग पाणी प्रभु का नाम जपते हैं। हे नानक! जो मनुष्य (गुरु की शरण पड़ कर) प्रभु के नाम में रंगे जाते हैं, उनका जीवन पवित्र हो जाता है, वे वासना रहित हो जाते हैं।4।13।33। |
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Sri Guru Granth Darpan, by Professor Sahib Singh |