श्री गुरू ग्रंथ साहिब दर्पण । टीकाकार: प्रोफैसर साहिब सिंह । अनुवादक भुपिन्दर सिंह भाईख़ेल |
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Page 162 गउड़ी गुआरेरी महला ३ ॥ सतिगुरु मिलै वडभागि संजोग ॥ हिरदै नामु नित हरि रस भोग ॥१॥ पद्अर्थ: वडभागि = बड़ी किस्मत से।1। अर्थ: जिस मनुष्य को बड़ी किस्मत से भले संजोगों से गुरु मिल जाता है, उसके दिल में परमात्मा का नाम बस जाता है। वह सदा परमात्मा के नाम रस का आनंद लेता है।1। गुरमुखि प्राणी नामु हरि धिआइ ॥ जनमु जीति लाहा नामु पाइ ॥१॥ रहाउ॥ पद्अर्थ: गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ के। जीति = जीत के। लाहा = लाभ, कमाई।1। रहाउ। अर्थ: जो प्राणी गुरु की शरण पड़ कर परमात्मा का नाम स्मरण करता रहता है, वह मानव जनम की बाजी जीत के (जाता है, और) परमात्मा के नाम-धन की कमाई कमा लेता है।1। रहाउ। गिआनु धिआनु गुर सबदु है मीठा ॥ गुर किरपा ते किनै विरलै चखि डीठा ॥२॥ पद्अर्थ: गिआनु = धर्म चर्चा। धिआनु = समाधि। चखि = चख के।2। अर्थ: जिस मनुष्य को सत्गुरू का शब्द मीठा लगता है, गुरु का शब्द ही (उसके वास्ते) धर्म-चर्चा है (गुरु शब्द ही उस वास्ते) समाधि है। पर किसी विरले भाग्यशाली मनुष्य ने गुरु की कृपा से (गुरु के मीठे शब्द का रस) चख के देखा है।2। करम कांड बहु करहि अचार ॥ बिनु नावै ध्रिगु ध्रिगु अहंकार ॥३॥ पद्अर्थ: करम कांड = वह कर्म जो शास्त्रों अनुसार जनम समय विवाह के समय, मरने के समय और जनेऊ आदि और समय में करने जरूरी समझे जाते हैं। आचार = धार्मिक रस्में। ध्रिगु = धृग, धिक्कारयोग्य।3। अर्थ: जो लोग (जनम, जनेऊ, विवाह, किरिया आदिक समय शास्त्रों के अनुसार माने हुए) धार्मिक कर्म करते हैं व अन्य अनेको धार्मिक रस्में करते हैं, पर परमात्मा के नाम से वंचित रहते हैं (ये कर्मकांड उनके अंदर) अहंकार (पैदा करता है और उनका जीवन) धिक्कारयोग्य ही (रहता है)।3। बंधनि बाधिओ माइआ फास ॥ जन नानक छूटै गुर परगास ॥४॥१४॥३४॥ पद्अर्थ: बंधनि = बंधन में। फास = फांसी। परगास = रोशनी।4। अर्थ: हे दास नानक! (परमात्मा से विछुड़ा मनुष्य) माया की फांसी में, माया के बंधन में बंधा रहता है (ये तभी इस बंधन से) आजाद होता है जब गुरु (के शब्द) का प्रकाश (उसे प्राप्त होता) है।4।14।34। नोट:
महला ३ गउड़ी बैरागणि ॥ जैसी धरती ऊपरिमेघुला बरसतु है किआ धरती मधे पाणी नाही ॥ जैसे धरती मधे पाणी परगासिआ बिनु पगा वरसत फिराही ॥१॥ पद्अर्थ: ऊपर मेघुला = ऊपर का बादल। मधे = मध्य में, बीच में। बिनु पगा = पैरों के बगैर, बादल। फिराही = फिरते हैं।1। अर्थ: (धरती और बादल का दृष्टांत ले के देख) जैसी धरती है वैसा ही ऊपर का बादल है, जो बरखा करता है। धरती में भी (वैसा ही) पानी है (जैसा बादलों में है)। (कूआँ खोदने से) जैसे धरती में से पानी निकल आता है वैसे ही बादल भी (पानी की) बरखा करते फिरते हैं। (जीवात्मा व परमात्मा में भी ऐसा ही फर्क समझो जैसे धरती के पानी और बादलों के पानी का है। पानी एक ही वही पानी है। जीव चाहे माया में फंसा हुआ है चाहे ऊँची उड़ाने भर रहा है, है एक ही परमात्मा का अंश)।1। बाबा तूं ऐसे भरमु चुकाही ॥ जो किछु करतु है सोई कोई है रे तैसे जाइ समाही ॥१॥ रहाउ॥ पद्अर्थ: बाबा = हे भाई! ऐसे = इस तरह, ये श्रद्धा बना के। चुकाही = दूर करके। सोई = वह ही, वैसा ही। तैसे = उसी तरफ। जाइ = जा के। समाही = समा के, व्यस्त रहते हैं।1। रहाउ। अर्थ: हे भाई! (आम भुलेखा ये है कि जीव, प्रभु से अलग अपनी हस्ती मान के अपने आप को कर्मों के करने वाले समझते हैं पर) तू अपना (ये) भुलेखा ये श्रद्धा बना के दूर कर कि प्रभु जैसा भी जिस जीव को बनाता है वैसा वह जीव बन जाता है, और उसी तरफ जीव व्यस्त रहते हैं।1। रहाउ। इसतरी पुरख होइ कै किआ ओइ करम कमाही ॥ नाना रूप सदा हहि तेरे तुझ ही माहि समाही ॥२॥ पद्अर्थ: नाना = अनेक।2। अर्थ: क्या स्त्री, क्या मर्द - तुझसे आकी हो के कोई कुछ नहीं कर सकते। (ये सब स्त्रीयां और मर्द) सदा तेरे ही अलग अलग रूप हैं, और आखिर में तेरे में ही समां जाते हैं।2। इतने जनम भूलि परे से जा पाइआ ता भूले नाही ॥ जा का कारजु सोई परु जाणै जे गुर कै सबदि समाही ॥३॥ पद्अर्थ: भूलि परे से = भूले पड़े थे। जा = जब। ता = तब। जा का = जिस (प्रभु) का। कारजु = जगत रचना। परु जाणै = अच्छी तरह जानता है। सबदि = शब्द में।3। अर्थ: (परमात्मा की याद से) भूल के जीव अनेक जन्मों में पड़े रहते हैं। जब परमात्मा का ज्ञान प्राप्त हो जाता है तब गलत रास्ते से हट जाते हैं। यदि जीव गुरु के शब्द में टिके रहें तो ये समझ आ जाती है कि जिस परमात्मा का ये जगत बनाया हुआ है, वही इसे अच्छी तरह समझता है।3। तेरा सबदु तूंहै हहि आपे भरमु कहाही ॥ नानक ततु तत सिउ मिलिआ पुनरपि जनमि न आही ॥४॥१॥१५॥३५॥ पद्अर्थ: सबदु = हुक्म। कहा ही = कहां? (भाव, कहीं नहीं रह जाता)। सिउ = साथ। पुनरपि = मुड़ मुड़ के। न आही = नहीं आते।4। अर्थ: (हे प्रभु! हर जगह) तेरा (ही) हुक्म (बरत रहा) है। (हर जगह) तू खुद ही (मौजूद) है - (जिस मनुष्य के अंदर ये निश्चय बन जाए, उसे) भुलेखा कहां रह जाता है? हे नानक! (जिस मनुष्यों के अंदर से अनेकता का भुलेखा दूर हो जाता है, उनकी तवज्जो परमात्मा की ज्योति में मिली रहती है जैसे, हवा, पानी आदि हरेक) तत्व (अपने) तत्व से मिल जाता है। ऐसे मनुष्य मुड़-मुड़ के जन्मों में नहीं आते।4।1।15।35। गउड़ी बैरागणि महला ३ ॥ सभु जगु कालै वसि है बाधा दूजै भाइ ॥ हउमै करम कमावदे मनमुखि मिलै सजाइ ॥१॥ पद्अर्थ: कालै वसि = मौत के वश में, आत्मिक मौत के वश में। बाधा = बंधा हुआ। दूजै भाइ = माया के मोह में। मनमुखि = अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य।1। अर्थ: (जब तक) ये जगत माया के मोह में बंधा रहता है (तब तक ये) सारा जगत आत्मिक मौत के काबू में आया रहता है। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (सारे) काम अहंकार के आसरे करते हैं और उन्हें (आत्मिक मौत की ही) सजा मिलती है।1। मेरे मन गुर चरणी चितु लाइ ॥ गुरमुखि नामु निधानु लै दरगह लए छडाइ ॥१॥ रहाउ॥ पद्अर्थ: मन = हे मन! गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ के। निधानु = खजाना।1। रहाउ। अर्थ: हे मेरे मन! गुरु के चरणों में तवज्जो जोड़। गुरु की शरण पड़ के परमात्मा का नाम खजाना इकट्ठा कर ले। (ये तूझे) परमात्मा की हजूरी में (तेरे किए कर्मों का लेखा करने के समय) सही स्वीकार करेगा।1। रहाउ। लख चउरासीह भरमदे मनहठि आवै जाइ ॥ गुर का सबदु न चीनिओ फिरि फिरि जोनी पाइ ॥२॥ पद्अर्थ: हठि = हठ से। मन हठि = मन के हठ के कारण। चीनिओ = पहचाना।2। अर्थ: (माया के मोह में बंधे हुए जीव) चौरासी लाख जोनियों में फिरते रहते हैं। अपने मन के हठ के कारण (माया के मोह में फंसा जीव) जनम मरण के चक्कर में पड़ा रहता है। जो मनुष्य गुरु के शब्द (की कद्र) को नहीं समझता वह मुड़ मुड़ जोनियों में पड़ता है।2। गुरमुखि आपु पछाणिआ हरि नामु वसिआ मनि आइ ॥ अनदिनु भगती रतिआ हरि नामे सुखि समाइ ॥३॥ पद्अर्थ: आपु = अपने आत्मिक जीवन को। पछाणिआ = परखा। मनि = मन में। अनदिनु = हर रोज। सुखि = आत्मिक आनंद में।3। अर्थ: जो मनुष्य गुरु के सन्मुख रहके आत्मिक जीवन को पड़तालता रहता है, उसके मन में परमात्मा का नाम आ बसता है। हर रोज परमात्मा की भक्ति (के रंग में) रंगा रहने के कारण वह परमात्मा के नाम में लीन रहता है वह आत्मिक आनंद में टिका रहता है।3। मनु सबदि मरै परतीति होइ हउमै तजे विकार ॥ जन नानक करमी पाईअनि हरि नामा भगति भंडार ॥४॥२॥१६॥३६॥ पद्अर्थ: सबदि = शब्द में। मरै = अहंकार से मरता है, अहंकार दूर करता है। परतीति = प्रतीति, श्रद्धा। करमी = (परमात्मा की) मेहर से ही (करम = बख्शिश)। पाईअनि = पाए जाते हैं, मिलते हैं। भण्डार = खजाने।4। अर्थ: जिस मनुष्य का मन गुरु के शब्द में जुड़ने के कारण स्वै-भाव की ओर से मर जाता है, उसकी (गुरु के शब्द में) श्रद्धा बन जाती है और वह अपने अंदर से अहंकार (आदि) विकार त्यागता है। हे दास नानक! परमात्मा के नाम के खजाने, परमात्मा की भक्ति के खजाने, परमात्मा की मेहर से ही मिलते हैं।4।2।16।36। गउड़ी बैरागणि महला ३ ॥ पेईअड़ै दिन चारि है हरि हरि लिखि पाइआ ॥ सोभावंती नारि है गुरमुखि गुण गाइआ ॥ पेवकड़ै गुण समलै साहुरै वासु पाइआ ॥ गुरमुखि सहजि समाणीआ हरि हरि मनि भाइआ ॥१॥ पद्अर्थ: पेइअड़ै = पिता के घर में, इस लोक में। दिन चारि है = चार दिन (रहने के वास्ते) मिले हैं, थोड़े दिन। लिखि = लिख के। पाइआ = (हरेक जीव के माथे पे) रख दिया है। गुरमुखि = गुरु के सन्मुख हो के। पेवकड़ै = पिता के घर में, इस लोक में। संमलै = संभालती है। वासु = जगह। सहजि = आत्मिक अडोलता में। मनि = मन में।1। अर्थ: परमात्मा ने (हरेक जीव के माथे पे यही लेख) लिख के रख दिए हैं कि हरेक को इस लोक में रहने के वास्ते थोड़े ही दिन मिले हुए हैं (फिर भी सब जीव माया के मोह में फंसे रहते हैं)। वह जीव-स्त्री (लोक परलोक में) शोभा कमाती है, जो गुरु की शरण पड़ के परमात्मा के गुण गाती है। जो जीव-स्त्री इस पिता के घर में रहने के समय परमात्मा के गुण अपने दिल में संभालती है उसे परलोक में (प्रभु की हजूरी में) आदर मिल जाता है। गुरु के सन्मुख रहके वह जीवस्त्री (सदा) आत्मिक अडोलता में लीन रहती है। परमात्मा (का नाम) उसे अपने मन में प्यारा लगता है।1। ससुरै पेईऐ पिरु वसै कहु कितु बिधि पाईऐ ॥ आपि निरंजनु अलखु है आपे मेलाईऐ ॥१॥ रहाउ॥ पद्अर्थ: ससुरे = ससुराल घर में, परलोक में। पेईऐ = इस लोक में। कहु = बताओ। कितु बिधि = किस तरीके से? निरंजनु = माया के प्रभाव से रहित। अलखु = अदृष्ट। आपे = खुद ही।1। रहाउ। अर्थ: (हे सत्संगी! हे बहिन!) बता, वह पति प्रभु किस ढंग से मिल सकता है जो इस लोक में और परलोक में (हर जगह) बसता है? (हे जिज्ञासु जीव-स्त्री!) वह प्रभु पति (हर जगह पर मौजूद होते हुए भी) माया के प्रभाव से परे है, और अदृश्य भी है। वह स्वयं ही अपना मेल कराता है।1। रहाउ। |
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Sri Guru Granth Darpan, by Professor Sahib Singh |