श्री गुरू ग्रंथ साहिब दर्पण । टीकाकार: प्रोफैसर साहिब सिंह । अनुवादक भुपिन्दर सिंह भाईख़ेल |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
Page 736 हउमै रोगि सभु जगतु बिआपिआ तिन कउ जनम मरण दुखु भारी ॥ गुर परसादी को विरला छूटै तिसु जन कउ हउ बलिहारी ॥३॥ पद्अर्थ: रोगि = रोग में। बिआपिआ = फसा हुआ। परसादी = कृपा से। को = कोई मनुष्य। हउ = मैं। बलिहारी = सदके।3। अर्थ: हे भाई! सारा जगत अहंकार के रोग में फसा रहता है (और, अहंकार में फसे हुए) उन मनुष्यों को जन्म-मरण के चक्कर का बहुत सारा दुख लगा रहता है। कोई विरला मनुष्य गुरु की कृपा से (इस अहंम् रोग से) खलासी पाता है। मैं (ऐसे) उस मनुष्य के सदके जाता हूँ।3। जिनि सिसटि साजी सोई हरि जाणै ता का रूपु अपारो ॥ नानक आपे वेखि हरि बिगसै गुरमुखि ब्रहम बीचारो ॥४॥३॥१४॥ पद्अर्थ: सिसटि = दुनिया। साजी = पैदा की हुई। ता का = उस (परमात्मा) का। अपारो = अपार, जिसका दूसरा छोर ना दिखे। आपे = खुद ही। वेखि = देख के। विगसै = खुश होता है। ब्रहम बीचारो = परमात्मा के गुणों की विचार।4। अर्थ: हे भाई! जिस परमात्मा ने ये सारी सृष्टि पैदा की है, वह खुद ही (इसके रोग को) जानता है (और, दूर करता है)। उस परमात्मा का स्वरूप किसी भी हदबंदी से परे है। हे नानक! वह परमात्मा खुद ही (अपनी रची सृष्टि को) देख के खुश होता है। गुरु की शरण पड़ कर ही परमात्मा के गुणों की समझ आती है।4।3।14। सूही महला ४ ॥ कीता करणा सरब रजाई किछु कीचै जे करि सकीऐ ॥ आपणा कीता किछू न होवै जिउ हरि भावै तिउ रखीऐ ॥१॥ पद्अर्थ: रजाई = रजा के मालिक प्रभु ने। कीचै = (हम) करें। भावै = अच्छा लगता है।1। अर्थ: हे भाई! जो कुछ जगत में बना है जो कुछ कर रहा है, ये सब रजा का मालिक परमात्मा कर रहा है। हम जीव (तब ही) कुछ करें, अगर कुछ कर सकते हों। हम जीवों का किया कुछ नहीं हो सकता। जैसे परमात्मा को अच्छा लगता है, वैसे जीवों को रखता है।1। मेरे हरि जीउ सभु को तेरै वसि ॥ असा जोरु नाही जे किछु करि हम साकह जिउ भावै तिवै बखसि ॥१॥ रहाउ॥ पद्अर्थ: वसि = वश में।1। रहाउ। अर्थ: हे मेरे प्रभु जी! हरेक जीव तेरे बस में हैं। हम जीवों में को समर्थता नहीं कि (तुझसे परे) कुछ कर सकें। हे प्रभु! तुझे जैसे अच्छा लगे, हम पर मेहर कर।1। रहाउ। सभु जीउ पिंडु दीआ तुधु आपे तुधु आपे कारै लाइआ ॥ जेहा तूं हुकमु करहि तेहे को करम कमावै जेहा तुधु धुरि लिखि पाइआ ॥२॥ पद्अर्थ: जीउ = जिंद। पिंडु = शरीर। कारै = काम में। को = कोई जीव। धुरि = धुर दरगाह से। लिखि = लिखके।2। अर्थ: हे प्रभु! ये जिंद, ये शरीर, सब कुछ (हरेक जीव को) तूने खुद ही दिया है, तूने स्वयं ही (हरेक जीव को) काम में लगाया हुआ है। जैसा हुक्म तू करता है, जीव वैसा ही काम करता है (जीव वैसा ही बनता है) जैसा तूने धुर-दरगाह से (उसके माथे पर) लेख लिख के रख दिया है।2। पंच ततु करि तुधु स्रिसटि सभ साजी कोई छेवा करिउ जे किछु कीता होवै ॥ इकना सतिगुरु मेलि तूं बुझावहि इकि मनमुखि करहि सि रोवै ॥३॥ पद्अर्थ: पंच ततु = (हवा, पानी, आग, धरती, आकाश)। सभ = सारी। करिउ = बेशक कर देखो। मेलि = मिला के। बुझावहि = समझ बख्शता है। इकि = कई, बहुत। मनमुखि = अपने मन के पीछे चलने वाले। करहि = तू बना देता है। सि = वह मनुष्य (एकवचन)। रोवै = दुखी होता है।3। नोट: ‘करिउ’ है हुकमी भविष्यत, अन्नपुरख, एकवचन। नोट: ‘इकि’ है ‘इक/एक’ का बहुवचन। अर्थ: हे प्रभु! तूने पाँच तत्व बना के सारी दुनिया पैदा की है। अगर (तुझसे बाहर) जीव से कुछ हो सकता हो, तो वह बेशक छेवाँ तत्व (ही) बना कर दिखा दे। हे प्रभु! कई जीवों को तू गुरु मिला के आत्मिक जीवन की सूझ बख्शता है। कई जीवों को तू अपने मन के पीछे चलने वाला बना देता है। फिर वह (अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य) दुखी होता रहता है।3। हरि की वडिआई हउ आखि न साका हउ मूरखु मुगधु नीचाणु ॥ जन नानक कउ हरि बखसि लै मेरे सुआमी सरणागति पइआ अजाणु ॥४॥४॥१५॥२४॥ पद्अर्थ: हउ = मैं। नीचाणु = छोटा। मुगधु = मूर्ख। कउ = को। सुआमी = हे स्वामी!।4। अर्थ: हे भाई! मैं (तो) मूर्ख हूँ, नीच जीवन वाला हूँ, मैं परमात्मा की प्रतिभा बयान नहीं कर सकता। हे हरि! दास नानक पर मेहर कर, (ये) अंजान दास तेरी शरण आ पड़ा है।4।4।15।24। नोट: रागु सूही महला ५ घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ बाजीगरि जैसे बाजी पाई ॥ नाना रूप भेख दिखलाई ॥ सांगु उतारि थम्हिओ पासारा ॥ तब एको एकंकारा ॥१॥ पद्अर्थ: बाजीगर = बाजीगर ने। नाना रूप = अनेक रूप। सांगु = नकली शकल। उतारि = उतार के। थंम्हिओ = रोक दिया। पासारा = खेल का खिलारा। एकंकार = परमात्मा।1। अर्थ: हे भाई! जैसे किसी बाजीगर ने (कभी) बाजी डाल के दिखाई हो, वह कई किस्मों के रूप और भेस दिखाता है (इसी तरह परमात्मा ने ये जगत-तमाशा रचा हुआ है। इसमें अनेक रूप और भेस दिखा रहा है)। जब प्रभु अपनी ये (जगत-रूपी) नकली-शक्ल उतार के खेल का पसारा रोक देता है, तब स्वयं ही स्वयं रह जाता है।1। कवन रूप द्रिसटिओ बिनसाइओ ॥ कतहि गइओ उहु कत ते आइओ ॥१॥ रहाउ॥ पद्अर्थ: कवन रूप = कौन कौन से रूप? अनेक रूप। द्रिसटिओ = दिखा। बिनसाइओ = नाश हुआ। कतहि = कहाँ? उहु = जीव। कत ते = कहाँ से?।1। रहाउ। अर्थ: हे भाई! (परमात्मा के) अनेक ही रूप दिखते रहते हैं, अनेक ही रूप नाश होते रहते हैं। (कोई नहीं बता सकता है कि) जीव कहाँ से आया था, और कहाँ चला जाता है।1। रहाउ। जल ते ऊठहि अनिक तरंगा ॥ कनिक भूखन कीने बहु रंगा ॥ बीजु बीजि देखिओ बहु परकारा ॥ फल पाके ते एकंकारा ॥२॥ पद्अर्थ: ते = से। उठहि = उठते हैं। तरंग = लहरों। कनिक = सोना। भूखन = गहने। कीने = बनाए जाते हैं। बीजि = बीज के। फल पाके ते = फल पकने से।2। अर्थ: हे भाई! पानी से अनेक लहरें उठती हैं (दोबारा पानी में मिल जाती हैं)। सोने से कई किस्मों के गहने घड़े जाते हैं (वे असल में होते तो सोना ही हैं)। (किसी वृक्ष का) बीज बीज के (शाखा-पत्ते आदि उसके) कई किस्मों में स्वरूप देखने को मिलता है। (वृक्ष के) फल पकने पर (वही पहली किस्म का बीज बन जाता है) (वैसे ही इस बहुरंगी संसार का असल) एक परमात्मा ही है।2। सहस घटा महि एकु आकासु ॥ घट फूटे ते ओही प्रगासु ॥ भरम लोभ मोह माइआ विकार ॥ भ्रम छूटे ते एकंकार ॥३॥ पद्अर्थ: सहस = हजारों। घट = घड़ा। घट फूटे ते = घड़े के टूटने से। भरम = भटकना।3। अर्थ: हे भाई! एक ही आकाश (पानी से भरे हुए) हजारों घड़ों में (अलग-अलग दिखता है)। जब घड़े टूट जाते हैं, तो वह (आकाश) ही दिखाई देता रह जाता है। माया के भ्रम के कारण (परमात्मा की अंश जीवात्मा में) भटकना, लोभ-मोह आदि विकार उठते हैं। भ्रम मिट जाने के कारण एक परमात्मा का ही रूप हो जाता है।3। ओहु अबिनासी बिनसत नाही ॥ ना को आवै ना को जाही ॥ गुरि पूरै हउमै मलु धोई ॥ कहु नानक मेरी परम गति होई ॥४॥१॥ पद्अर्थ: अबिनासी = नाश रहित। को = कोई जीव। आवै = पैदा होता है। जाही = जाते हैं, मरते हैं। गुरि = गुरु ने। परम गति = उच्च आत्मिक अवस्था।4। अर्थ: हे भाई! वह परमात्मा नाश-रहित है, उसका कभी नाश नहीं होता। (वह प्रभु जीवात्मा रूप हो के भी) ना कोई आत्मा पैदा होती है, ना कोई आत्मा मरती है। हे नानक! कह: पूरे गुरु ने (मेरे अंदर से) अहंकार की मैल धो दी है, अब मेरी ऊँची आत्मिक अवस्था बन गई है (और, मुझे ये जगत उस परमात्मा का अपना ही रूप दिख रहा है)।4।1। सूही महला ५ ॥ कीता लोड़हि सो प्रभ होइ ॥ तुझ बिनु दूजा नाही कोइ ॥ जो जनु सेवे तिसु पूरन काज ॥ दास अपुने की राखहु लाज ॥१॥ पद्अर्थ: कीता लोड़हि = तू करना चाहता है। प्रभ = हे प्रभु! राखहु = तू रखता है। लाज = इज्जत।1। अर्थ: हे प्रभु! जो कुछ तू करना चाहता है। (जगत में) वही कुछ होता है, (क्योंकि) तेरे बिना (कुछ कर सकने वाला) और कोई नहीं है। जो सेवक तेरी शरण आता है, उसके सारे काम सफल हो जाते हैं। तू अपने सेवक की इज्जत खुद रखता है।1। तेरी सरणि पूरन दइआला ॥ तुझ बिनु कवनु करे प्रतिपाला ॥१॥ रहाउ॥ पद्अर्थ: दइआला = हे दया के घर प्रभु! कवनु = और कौन?।1। रहाउ। अर्थ: हे सदा दयावान रहने वाले प्रभु! मैं तेरी शरण आया हूँ। तेरे बिना हम जीवों की पालना और कोई नहीं कर सकता।1। रहाउ। जलि थलि महीअलि रहिआ भरपूरि ॥ निकटि वसै नाही प्रभु दूरि ॥ लोक पतीआरै कछू न पाईऐ ॥ साचि लगै ता हउमै जाईऐ ॥२॥ पद्अर्थ: जलि = पानी में। थलि = धरती में। महीअलि = मही तलि, धरती के तल पर, अंतरिक्ष में, आकाश में। निकटि = नजदीक। पतीआरै = पतिआने से, तसल्ली करवाने से। साचि = सदा-स्थिर प्रभु में।2। अर्थ: हे भाई! पानी में, धरती में, आकाश में, हर जगह परमात्मा मौजूद है। (हरेक जीव के) नजदीक बसता है (किसी से भी) प्रभु दूर नहीं है। पर निरी लोगों की नजरों में अच्छा बनने से (उस परमात्मा के दर से आत्मिक जीवन की दाति का) कुछ भी नहीं मिलता। जब मनुष्य उस सदा-स्थिर प्रभु में लीन होता है, तब (इसके अंदर से) अहंकार दूर हो जाता है।2। |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
Sri Guru Granth Darpan, by Professor Sahib Singh |