श्री गुरू ग्रंथ साहिब दर्पण । टीकाकार: प्रोफैसर साहिब सिंह । अनुवादक भुपिन्दर सिंह भाईख़ेल

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जउ गुरदेउ कंधु नही हिरै ॥ जउ गुरदेउ देहुरा फिरै ॥ जउ गुरदेउ त छापरि छाई ॥ जउ गुरदेउ सिहज निकसाई ॥६॥

पद्अर्थ: कंधु = शरीर। न हिरै = (कामादिक कोई भी) चुराता नहीं। छापरि = छपरी, कुल्ली, घर। सिहज = मंजा, चारपाई, पलंग। निकसाई = निकाल दी।6।

अर्थ: अगर गुरु मिल जाए तो शरीर (विकारों में पड़ के) विनाश नहीं (भाव, मनुष्य विकारों में प्रवृक्त नहीं होता, और ना ही उसकी सत्ता व्यर्थ जाती है); ऊँची जाति आदि के माण वाले मनुष्य गुरु की शरण आए बँदे पर दबाव नहीं डाल सकते, जैसे कि वह देहुरा नामदेव की तरफ पलट गया था जिसमें से उसे धक्के दे के निकाल दिया गया था; गुरु की शरण पड़े गरीब की रक्षा के लिए रब खुद पहुँचता है जैसे कि नामदेव की कुल्ली बनी थी, ईश्वर स्वयं सहाई होता है जैसे कि बादशाह के डरावे देने पर पलंग दरिया में से निकलवा दिया।6।

(नोट: बादशाह ने नामदेव को चारपाई दी थी, वह उसने दरिया में फेंक दिया। बादशाह को पता लगा, उसने कहा वापस करो। नामदेव ने दोबारा दरिया में से निकाल दिया)।

जउ गुरदेउ त अठसठि नाइआ ॥ जउ गुरदेउ तनि चक्र लगाइआ ॥ जउ गुरदेउ त दुआदस सेवा ॥ जउ गुरदेउ सभै बिखु मेवा ॥७॥

पद्अर्थ: अठसठि = अढ़सठ तीर्थ। तनि = शरीर पर। दुआदस सेवा = बारह शिव लिंगों की पूजा।7।

अर्थ: अगर गुरु मिल जाए तो अठारह तीर्थों का स्नान हो गया (जानो), शरीर पर चक्कर लग गए समझो (जैसे बैरागी द्वारिका जा के लगाते हैं), बारह ही शिव-लिंगों की पूजा हो गई समझो; उस मनुष्य के लिए सारे जहर भी मीठे फल बन जाते हैं।7।

जउ गुरदेउ त संसा टूटै ॥ जउ गुरदेउ त जम ते छूटै ॥ जउ गुरदेउ त भउजल तरै ॥ जउ गुरदेउ त जनमि न मरै ॥८॥

अर्थ: अगर गुरु मिल जाए तो दिल के संसे मिट जाते हैं, जमों से (ही) खलासी हो जाती है, संसार-समुंदर से मनुष्य पार लांघ जाता है, जनम-मरन से बच जाता है।8।

जउ गुरदेउ अठदस बिउहार ॥ जउ गुरदेउ अठारह भार ॥ बिनु गुरदेउ अवर नही जाई ॥ नामदेउ गुर की सरणाई ॥९॥१॥२॥११॥

पद्अर्थ: अठ दस = अठारह (स्मृतियों का बताया हुआ)। अठारह भार = सारी बनस्पति (के पत्र, फूल आदि पूजा के लिए भेट)। जाई = जगह।9।

अर्थ: अगर गुरु मिल जाए तो अठारह स्मृतियों के बताए कर्मकांड की आवश्यक्ता नहीं रह जाती, सारी बनस्पति ही (प्रभु-देव की नित्य भेट होती दिखाई दे जाती है)। सतिगुरु के बिना और कोई जगह नहीं (जहाँ मनुष्य जीवन का सही रास्ता पा सके), नामदेव (और सब आसरे-सहारे छोड़ के) गुरु की शरण पड़ा है।9।1।2।11।

नोट: नामदेव जी तो यहाँ साफ कह रहे हैं कि और देवी-देवताओं की पूजा बिल्कुल व्यर्थ है, एक सतिगुरु की शरण ही समर्थ है; पर यह आश्चर्यजनक खेल है कि लोग नामदेव जी के अपने इन शब्दों पर ऐतबार करने की जगह स्वार्थी लोगों की घड़ी हुई कहानियाँ पढ़-सुन के यही रटन लगाए जा रहे हैं कि नामदेव ने किसी बीठल-मूर्ति की पूजा की और ठाकुर को दूध पिलाया।

भाव: गुरु के बताए हुए राह पर चलना ही जीवन का सही रास्ता है; और देवी-देवताओं की पूजा बिल्कुल ही निष्फल है।

भैरउ बाणी रविदास जीउ की घरु २    ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

बिनु देखे उपजै नही आसा ॥ जो दीसै सो होइ बिनासा ॥ बरन सहित जो जापै नामु ॥ सो जोगी केवल निहकामु ॥१॥

पद्अर्थ: आसा = (पारस = प्रभु से छूने की) तमन्ना। बरन = वर्णन, प्रभु के गुणों का वर्णन, महिमा। सहित = समेत। जापै = जपता है। निहकामु = कामना रहित, वासना रहित।1।

अर्थ: (पर, पारस प्रभु के चरण छूने आसान काम नहीं है, क्योंकि वह इन आँखों से नहीं दिखाई देता, और) उसको देखे बिना (उस पारस-प्रभु के चरण छूने की) तमन्ना पैदा नहीं होती, (इस दिखाई देते संसार के साथ ही मोह बना रहता है,) और, और यह जो कुछ दिखाई देता है यह सब नाश हो जाने वाला है। जो मनुष्य प्रभु के गुण गाता है, और, प्रभु का नाम जपता है, सिर्फ वही असल जोगी है और वह कामना-रहित हो जाता है।1।

परचै रामु रवै जउ कोई ॥ पारसु परसै दुबिधा न होई ॥१॥ रहाउ॥

पद्अर्थ: परचै = परच जाता है, गिझ जाता है, विकारों से हट जाता है। जउ = जब। परसै = छूता है।1। रहाउ।

अर्थ: जब कोई मनुष्य परमात्मा का नाम स्मरण करता है तो उसका मन प्रभु में परच जाता है; जब पारस-प्रभु को वह छूता है (वह, मानो, सोना हो जाता है), और, उसकी मेर-तेर समाप्त हो जाती है।1। रहाउ।

सो मुनि मन की दुबिधा खाइ ॥ बिनु दुआरे त्रै लोक समाइ ॥ मन का सुभाउ सभु कोई करै ॥ करता होइ सु अनभै रहै ॥२॥

पद्अर्थ: खाइ = खा जाता है, समाप्त कर देता है। दुबिधा = दोचिक्तापन, मेर तेर, प्रभु से विछुड़ना। त्रैलोक = तीनों लोकों में व्यापक प्रभु में। बिनु दुआरे = जिस प्रभु का दस द्वारों वाला शरीर नहीं है। सभु कोइ = हरेक जीव। करता होइ = (नाम स्मरण वाला मनुष्य) कर्तार का रूप हो जाता है। अनभै = भय रहित अवस्था में।2।

अर्थ: (नाम-स्मरण वाला) वह मनुष्य (असल) ऋषि है, वह (नाम की इनायत से) अपने मन की मेर-तेर मिटा लेता है, और उस प्रभु में समाया रहता है जिसका कोई खास शरीर नहीं है। (जगत में) हरेक मनुष्य अपने-अपने मन का स्वभाव बरतता है (अपने मन के पीछे चलता है, पर नाम-स्मरण वाला मनुष्य अपने मन के पीछे चलने के जगह, नाम की इनायत से) कर्तार का रूप हो जाता है, और, उस अवस्था में टिका रहता है जहाँ कोई डर-भय नहीं।2।

फल कारन फूली बनराइ ॥ फलु लागा तब फूलु बिलाइ ॥ गिआनै कारन करम अभिआसु ॥ गिआनु भइआ तह करमह नासु ॥३॥

पद्अर्थ: कारन = वास्ते। बनराइ = बनस्पति। फूली = फूलती है, खिलती है। बिलाइ = दूर हो जाती है। करम = दुनिया की मेहनत-कमाई। अभिआसु = बार बार करना। करम अभिआसु = दुनिया की रोजाना की मेहनत-कमाई। गिआनै कारन = ज्ञान की खातिर, प्रभु में परचने की खातिर, ऊँचे जीवन में सूझ वास्ते, जीवन का सही रास्ता ढूँढने के लिए। तह = उस अवस्था में पहुँच के। करमह नासु = कर्मों का नाश, मेहनत-कमाई के मोह का नाश।3।

अर्थ: (जगत की सारी) बनस्पति फल देने के लिए खिलती है; जब फल लगता है फूल दूर हो जाता है। इसी तरह दुनिया की रोजाना की मेहनत-कमाई ज्ञान की खातिर है (प्रभु में परचने के लिए है, उच्च-जीवन की सूझ के लिए है), जब ऊँचे-जीवन की समझ पैदा हो जाती है, तो उस अवस्था में पहुँच के मेहनत-कमाई का (मायावी-उद्यमों का) मोह मिट जाता है।3।

घ्रित कारन दधि मथै सइआन ॥ जीवत मुकत सदा निरबान ॥ कहि रविदास परम बैराग ॥ रिदै रामु की न जपसि अभाग ॥४॥१॥

पद्अर्थ: ध्रित = घृत, घी। दधि = दही। मथै = मथती है। सइआन = सयानी स्त्री। निरबान = निर्वाण, वासना रहित। की न = क्यों नहीं? अभाग = हे भाग्यहीन!।4।

अर्थ: समझदार स्त्री घी की खातिर दही मथती है (वैसे ही जो मनुष्य नाम जप के प्रभु-चरणों में परचता है वह जानता है कि दुनिया का जीवन-निर्वाह, दुनिया की मेहनत-कमाई प्रभु-चरणों में जुड़ने के लिए ही है। सो, वह मनुष्य नाम की इनायत से) माया की मेहनत-कमाई करता हुआ ही मुक्त होता है और सदा वासना-रहित रहता है। रविदास यह सबसे ऊँचे वैराग (की प्राप्ति) की बात बताता है; हे भाग्य-हीन! प्रभु तेरे हृदय में ही है, तू उसको क्यों याद नहीं करता?।4।1।

नोट: शब्द का मुख्य भाव ‘रहाउ’ की तुक में हुआ करता है, बाकी के शब्द में उसकी व्याख्या।

नोट: पाठक जन ‘रहाउ’ की तुक का ध्यान रखें। सारे शब्द में उस जीवन का विस्तार है जो नाम के स्मरण करने से बनता है; इसी केन्द्रिया-विचार के इर्द-गिर्द ही सारे शब्द ने रहना है। किसी कर्मकांड का कोई जिकर रविदास जी ने ‘रहाउ’ की तुक में नहीं छेड़ा। इस बंद नंबर.3 में यह बड़ी ही गलत बात होगी अगर शब्द ‘करम’ का अर्थ ‘कर्मकांड’ करेंगे।

मुख्य भाव: जो मनुष्य नाम स्मरण करता है उसका मन प्रभु में परच जाता है; पारस-प्रभु को छू के वह, मानो, सोना हो जाता है।

बाकी के शब्द में उस सोना बन गए मनुष्य के जीवन की तस्वीर दी है: 1. ‘निहकामु’, वासना रहित हो जाता है; 2. दुबिधा मिट जाती है और वह निर्भय हो जाता है; 3. मेहनत-कमाई का मोह मिट जाता है; 4. सिरे की बात ये कि जीवित ही मुक्त हो जाता है।

नोट: जब भी किसी कवि की किसी लिखत के बारे में कोई शक पैदा हो, तो उसको समझने का सही तरीका यही हो सकता है कि उस पहेली को उसी की बाकी और रचनाओं में से समझा जाए। कवि जहाँ अपनी बोली को बरतता, और सँवारता-श्रृंगारता है, वहीं वह पुराने शब्दों, पुराने मुहावरों और पुराने बरते दृष्टांतों को नए तरीके से भी बरतता और बरत सकता है। गुरु गोबिंद सिंह जी के शब्द ‘भगौती’ के प्रयोग से कई लोग ये गलती खाने लग पड़े कि सतिगुरु जी ने देवी-पूजा अथवा शस्त्र-पूजा की। पर जब इस शब्द को उनकी अपनी ही (गुरु गोबिंद सिंह जी की) रचना में बरत के ध्यान से देखा जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि शब्द ‘भगौती’ परमात्मा की बाबत उन्होंने बरता है। रामकली राग में दी वाणी ‘सदु’ से कई लोग घबराते थे कि इसमें कर्मकांड करने की आज्ञा की है, पर यह सिर्फ भुलेखा ही था (पढें मेरी पुस्तक ‘सदु स्टीक’)। यह वाणी उन महाँपुरुषों की है जो हमसे दूर उच्च चोटी पर खेल रहे थे, ऊँचे-विचार-मण्डलों में उड़ानें भर रहे थे। इसको समझने के लिए इसमें जुड़ना पड़ेगा, माया में खेलते मन को थोड़ा सा रोक के इधर काफी समय देना पड़ेगा, तब ही उनकी गहराई में पहुँचने की आस हो सकती है।

वेदांती लोगों ने यह प्रचार किया है कि ये जगत मिथ्या है, असल में इस जगत की कोई हस्ती ही नहीं है, माया का पर्दा पड़ने के कारण जीव को यह भ्रम हो गया है कि जगत की कोई हस्ती है। उन्होंने ये बात समझाने के लिए रस्सी और साँप का दृष्टांत दिया कि अंधेरे के कारण रस्सी को साँप समझा गया, असल में साँप कहीं है ही नहीं था। रविदास जी ने भी यही दृष्टांत बरत लिया। पर इस बात से ये भाव नहीं लिया जा सकता कि रविदास जी वेदांती थे। ये दृष्टांत वेदांतियों की जागीर नहीं हो गया। देखें राग सोरठि, शब्द– ‘जब हम होते’। कर्मकांडियों ने फल और फूल का दृष्टांत बरता, रविदास जी ने भी इसको बरत लिया; पर इसका ये मतलब नहीं निकल सकता कि रविदास जी कर्मकांडी थे। आखिर रविदास जी कौन सी उच्च-कुल के ब्राहमण थे कि वे किसी कर्मकांड से चिपके रहते? ना जनेऊ पहनने का अधिकार, ना मन्दिर में जाने की आज्ञा, ना किसी श्राद्ध के वक्त ब्राहमण ने उनके घर का खाना, ना संध्या-तर्पण-गायत्री आदि का उनको कोई हक। फिर, वह कौन सा कर्मकांड था जिसका शौक रविदास जी को हो सकता था?

रविदास जी ने इस शब्द में नाम-जपने वाले व्यक्ति के ऊँचे जीवन का वर्णन किया है।

इसी ही राग में दिया हुआ गुरु अमरदास जी का निम्न-लिखित शब्द रविदास जी के इस शब्द का आनंद लेने के लिए बहुत ही सहायक सिद्ध होगा।

रागु भैरउ महला ३॥ सो मुनि जि मन की दुबिधा मारे॥ दुबिधा मारि ब्रहमु बीचारे॥१॥ इसु मन कउ कोई खोजहु भाई॥ मनु खोजत नामु नउ निधि पाई॥१॥ रहाउ॥ मूलु मोहु करि करतै जगतु उपाइआ॥ ममता लाइ भरमि भुोलाइआ॥२॥ इसु मन ते सभ पिंड पराणा॥ मन कै वीचारि हुकमु बूझि समाणा॥३॥ करमु होवै गुरु किरपा करै॥ इहु मनु जागै इसु मन की दुबिधा मरै॥४॥ मन का सुभाउ सदा बैरागी॥ सभ महि वसै अतीतु अनरागी॥५॥ कहत नानकु जो जाणै भेउ॥ आदि पुरखु निरंजन देउ॥६॥५॥   (पन्ना 1128–1129)

जिस मनुष्य पर प्रभु की मेहर हो उस पर गुरु कृपा करता है, उसका मन माया के मोह में से जाग उठता है। जो बात रविदास जी ने ‘करमह नासु’ में इशारे मात्र कही है, वह गुरु अमरदास जी ने दूसरे बंद से पाँचवें बंद तक स्पष्ट शब्दों में समझा दी है कि ‘करमह नासु’ का भाव है ‘मोह ममता का नाश’।

नोट: इन दोनों शबदों को इकट्ठे रख के पढ़ने से ये बात यकीनन पक्की नहीं हो गई कि गुरु अमरदास जी का ये शब्द भक्त रविदास जी के शब्द की प्रथाय है? दूसरे शब्दों में ये कह लो कि ये शब्द उचारने के वक्त गुरु अमरदास जी के पास भक्त रविदास जी का शब्द मौजूद था। दोनों शबदों के कई शब्दों व तुकों में सांझ सबब से नहीं बन गई। ये विचार समूचे तौर पर गलत है कि भक्तों की वाणी गुरु अरजन देव जी ने एकत्र की थी। सतिगुरु नानक देव जी ने पहली ‘उदासी’ के समय बनारस जा के भक्त रविदास जी के सारे शब्द लिख लिए। अपनी वाणी के साथ संभाल के ये शब्द गुरु नानक देव जी ने गुरु अंगद देव जी को दिए। उनसे ये सारी वाणी गुरु अमरदास जी को मिली।

शब्द का भाव: नाम-जपने की बड़ाई-नाम-जपने की इनायत से मनुष्य माया के मोह वाला विकार (हठ) छोड देता है, वासना-रहित (निर्वाण) हो जाता है।

नामदेव ॥ आउ कलंदर केसवा ॥ करि अबदाली भेसवा ॥ रहाउ॥

पद्अर्थ: आउ = आइए, स्वागतम्। कलंदर = हे कलंदर! केसवा = हे केशव! हे सुदर केसों वाले प्रभु! करि = कर के। अबदाली भेसवा = अब्दाली फकीरों वाला सुंदर भेस। रहाउ।

अर्थ: हे (सुंदर जुल्फों वाले) कलंदर प्रभु! हे सुंदर केशों वाले प्रभु! तू अब्दालनी फकीरों वाला पहरावा पहन के (आया है); आईए, (स्वागत है, आ, मेरे हृदय-मस्जिद में आ बैठ)। रहाउ।

जिनि आकास कुलह सिरि कीनी कउसै सपत पयाला ॥ चमर पोस का मंदरु तेरा इह बिधि बने गुपाला ॥१॥

पद्अर्थ: जिनि = जिस (तुझ) ने। कुलह = कुल्ला, टोपी। सिरि = सिर पर। कउसै = खड़ावें। प्याला = पाताल। चमर पोस = चमड़े की पोशाक वाले, सारे जीव-जंतु। मंदरु = घर। गुपाला = हे धरती के रक्षक!।1।

अर्थ: (हे कलंदर! हे केशव! तू आ, तू) जिस ने (सात) आसमानों को कुल्ला (बना के अपने) सिर पर पहना हुआ है, जिसने सात पातालों को अपनी खड़ावें (बना के) पहनी हुई हैं। हे कलंदर-प्रभु! सारे जीव-जंतु तेरे बसने के लिए निवास-स्थान (घर) हैं। हे धरती के रक्षक! तू इस तरह का बना हुआ है।1।

छपन कोटि का पेहनु तेरा सोलह सहस इजारा ॥ भार अठारह मुदगरु तेरा सहनक सभ संसारा ॥२॥

पद्अर्थ: छपन कोटि = छप्पन करोड़। मेघ माला = छपपन करोड़ बादल। पेहन = चोगा। सोलह सहस = सोलह हजार (आलम)। इजारा = तंबा। भार अठारह = बनस्पति के अठारह भार, सारी बनस्पति। मुदहरु = मुतहिरा, सलोतर, मुदगर, डंडा जो फकीर लोग आम तौर पर हाथ में रखते हैं। सहनक = मिट्टी की रकेबी।2।

अर्थ: (ओ मायावी प्रभू!) छप्पन करोड़ (मेघ माला) तेरा जामा है, सोलह हजार आलम का तेरा पतलून है; हे केशव (प्रभू)! पूरी वनस्पति तुम्हारी मुद्गर है, और पूरी दुनिया आपकी प्लाटून है।2।

देही महजिदि मनु मउलाना सहज निवाज गुजारै ॥ बीबी कउला सउ काइनु तेरा निरंकार आकारै ॥३॥

पद्अर्थ: देही = (मेरा) शरीर। महजिदि = मस्जिद। मउलाना = मौलवी, मुल्लां। सहज = अडोलता। सहज निवाज = अडोलता रूप नमाज़। कउला = माया। सउ = साथ। काइनु = निकाह, विवाह। निरंकार = हे निरंकार! हे आकार रहित प्रभु! आकार = जगत। निरंकार आकारै = हे सारे जगत के निरंकार!।3।

अर्थ: (हे कलंदर प्रभु! आ, मेरी मस्जिद में आ) मेरा शरीर (तेरे लिए) मस्जिद है, मेरा मन (तेरे नाम की बाँग देने वाला) मुल्ला है, और (तेरे चरणों में जुड़ा रह के) अडोलता की नमाज़ पढ़ रहा है। हे सारे जगत के मालिक निरंकार! बीबी लक्ष्मी के साथ तेरा निकाह हुआ है (भाव, यह सारी माया तेरे चरणों की ही दासी है)।3।

भगति करत मेरे ताल छिनाए किह पहि करउ पुकारा ॥ नामे का सुआमी अंतरजामी फिरे सगल बेदेसवा ॥४॥१॥

पद्अर्थ: छिनाए = छिनवा दिए। किह पहि = और किस के पास? पुकारा = पुकार, शिकायत, फरियाद। फिरै = फिरता है, व्यापक है। सगल बेदेसवा = सारे देशों में।4।

अर्थ: (हे कलंदर प्रभु!) मुझे भक्ति करते को तूने मन्दिर में से निकलवाया, (तुझे छोड़ के मैं और) किस के आगे दिल की बातें करूँ? (हे भाई!) नामदेव का मालिक-परमात्मा हरेक जीव के अंदर की जानने वाला है, और सारे देशों में व्यापक है।4।1।

शब्द का भाव: नाम-जपने की इनायत- निडरता, उच्च-जाति वाले लोगों की ज्यादतियों के विरुद्ध आवाज़ उठाते हैं।

नोट: बँदगी वाले मुसलमान फकीर केस (जुल्फें) रखते हैं, इस लिए ‘कलंदर’ के साथ शब्द ‘केसव’ भी बरता है। अब्दाली फकीर सिर पर कुल्ला (ऊँची नोक वाली टोपी) पहनते हैं; बड़ा चोला, लंबा तंबा आदि उनकी पोशाक होती है। नामदेव जी किसी अब्दाली फकीर को देख के परमात्मा को भी अब्दाली के रूप में बयान करते हैं। जब बादशाह ने डरावे दिए, तो नामदेव जी कहने लगे कि मेरे इज्जत रखने के लिए ‘गरुड़ चढ़े गोबिंदु आइला’। निडर हो के एक कट्टर मुसलमान के सामने परमात्मा का वह स्वरूप बताते हैं जो हिन्दू पुराणों में मिथा हुआ है। पर जब मन्दिर में से निकाले जाने का वर्णन करते हैं तो अपने प्रभु को मुसलमानी रूप में बयान करते हैं। किसी खास स्वरूप के पुजारी नहीं हैं, उनका परमात्मा ‘सगल बेदेसवा’ में फिरने वाला (व्यापक) है।

नोट: इस्लामी विचार के अनुसार कोई अठारह हजार व कोई सोलह हजार आलम (जहान) कहते हैं। कई विद्वान सज्जन इसका अर्थ ‘सोलह हजार गोपियाँ’ करते आ रहे हैं। पर यह बिल्कुल ही गलत और बेजोड़ सा है; प्रभु का स्वरूप बयान करते हुए सारे आकाश, सारे पाताल, सारे जीव-जंतु, सारी मेघ-मालाएं, सारी बनस्पति, सारा संसार उस प्रभु के बाहरी लिबास का हिस्सा बताते हैं। बेअंत जीव पैदा करने वाले प्रभु के ‘इजार’ के लिए ‘सोलह हजार गोपियां’ कोई महिमा की बात नहीं है; ये तो सुल्तान को मीयाँ कहने वाली बात भी नहीं।

नोट: शब्द ‘छीने’ और छिनाऐ’ अलग-अलग अर्थ वाले हैं। किसी उस ‘कलंदर’ को संबोधन नहीं कर रहे, जिसने नामदेव के छैने ‘छीने’; सर्व-व्यापक प्रभु का अब्दाली भेस बयान करते हुए कहते हैं कि तूने ही मेरे छैणे ‘छिनवाए’। नामदेव जी ने शब्द ‘ताल छिनाऐ’ उसी प्रकार बरता है जिस तरह कबीर जी ने ‘यह माला अपुनी लीजै’ बरता है। ना कबीर जी गले में माला डाले फिरते थे, ना ही नामदेव जी हाथ में छैणे लिए फिरते थे। छैणे आम तौर पर मन्दिरों में ही आरती के वक्त बजाए जाते हैं; सो, ‘ताल छिनाऐ’ का भाव है कि मन्दिर में से धक्के दिलवाए, मन्दिर में से निकलवा दिया। (देखें बिलावल कबीर जी: ‘नित उठि कोरी गागरि’; और सोरठि कबीर जी: ‘भूखे भगति न कीजै’ में मेरा लिखा नोट)।

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Sri Guru Granth Darpan, by Professor Sahib Singh