श्री गुरू ग्रंथ साहिब दर्पण । टीकाकार: प्रोफैसर साहिब सिंह । अनुवादक भुपिन्दर सिंह भाईख़ेल |
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Page 403 आसा महला ५ ॥ निमख काम सुआद कारणि कोटि दिनस दुखु पावहि ॥ घरी मुहत रंग माणहि फिरि बहुरि बहुरि पछुतावहि ॥१॥ अंधे चेति हरि हरि राइआ ॥ तेरा सो दिनु नेड़ै आइआ ॥१॥ रहाउ ॥ पलक द्रिसटि देखि भूलो आक नीम को तूमरु ॥ जैसा संगु बिसीअर सिउ है रे तैसो ही इहु पर ग्रिहु ॥२॥ बैरी कारणि पाप करता बसतु रही अमाना ॥ छोडि जाहि तिन ही सिउ संगी साजन सिउ बैराना ॥३॥ सगल संसारु इहै बिधि बिआपिओ सो उबरिओ जिसु गुरु पूरा ॥ कहु नानक भव सागरु तरिओ भए पुनीत सरीरा ॥४॥५॥१२७॥ {पन्ना 403} पद्अर्थ: निमख = निमेष, आँख झपकने जितना समय। कारणि = की खातिर। कोटि = करोड़ों। घरी = घड़ी। मुहत = महूरत, दो घड़ियां, पल मात्र। माणहि = तू भोगता है।1। अंधे = हे काम वासना में अंधे हुए जीव! हरि राइआ = प्रभू पातशाह!।1। रहाउ। पलक द्रिसटि = आँख झपकने जितना समय। आक नीम को तूंमरु = अॅक नीम जैसा कड़वा तूंबा। संगु = साथ। बिसीअर = सांप। पर ग्रिह = पराइआ घर, पराई स्त्री का संग।2। बैरी = वैरन, माया। बसतु = (असल) चीज। अमाना = अमन अमान, अलग ही। बैराना = वैर।3। इहै बिधि = इसी तरह। बिआपिओ = फसा हुआ है। उबरिओ = बचा। भव सागरु = संसार समुंद्र।4। अर्थ: हे काम-वासना में अंधे हुए जीव! (ये विकारों वाला राह छोड़, और) प्रभू-पातशाह का सिमरन कर। तेरा वह दिन नजदीक आ रहा है (जब तूने यहाँ से कूच कर जाना है)।1। रहाउ। हे अंधे जीव! थोड़े जितने समय के काम-वासना के स्वाद की खातिर (फिर) तू करोड़ों ही दिन दुख ही सहता है। तू घड़ी दो घड़ी मौजें लेता है, उसके बाद मुड़-मुड़ पछताता है।1। हे अंधे मूर्ख! अॅक-नीम जैसे कड़वे तूंबे को (जो देखने में सुंदर होता है) थोड़े से समय के लिए देख के ही तू भूल जाता है। हे अंधे! पराई स्त्री का संग ऐसे ही है जैसे विषौले साँप का साथ।2। हे अंधे! (अंत) वैरी (माया) की खातिर तू (अनेकों) पाप करता रहता है, असल चीज (जो तेरे साथ निभनी है) अलग ही पड़ी रह जाती है। तूने उन चीजों से साथ बनाया हुआ है जिन्हें तू आखिर छोड़ जाएगा, (इस तरह तूने) हे मित्र! (प्रभू) से वैर किया हुआ है।3। हे नानक! कह– सारा संसार इसी तरह माया के जाल में फसा हुआ है, इसमें से वही बच के निकलता है जिसका राखा पूरा गुरू बनता है, वह मनुष्य संसार समुंद्र से पार लांघ जाता है, उसका शरीर पवित्र हो जाता है। (विकारों की मार से बच जाता है)।4।5।127। आसा महला ५ दुपदे ॥ लूकि कमानो सोई तुम्ह पेखिओ मूड़ मुगध मुकरानी ॥ आप कमाने कउ ले बांधे फिरि पाछै पछुतानी ॥१॥ प्रभ मेरे सभ बिधि आगै जानी ॥ भ्रम के मूसे तूं राखत परदा पाछै जीअ की मानी ॥१॥ रहाउ ॥ जितु जितु लाए तितु तितु लागे किआ को करै परानी ॥ बखसि लैहु पारब्रहम सुआमी नानक सद कुरबानी ॥२॥६॥१२८॥ पद्अर्थ: लूकि = लोगों से छिपा के। पेखिओ = देख लिया, देख लेता है। मूढ़ मुगध = मूर्ख बंदे! मुकरानी = मुकरते हैं। बांधे = बंध जाते हैं।1। आगै = पहले ही। मूसे = ठॅगे हुए। पाछै = पीछे से, छुप के। जीअ की मानी = मन मानी (करता है)।1। रहाउ। को परानी = कोई जीव।2। अर्थ: (हे मूर्ख मनुष्य! तू इस भुलेखे में रहता है कि तेरी काली करतूतों को परमात्मा नहीं जानता, पर) मेरा मालिक प्रभू तो तेरी हरेक करतूत को सबसे पहले जान लेता है। हे भुलेखे में आत्मिक जीवन लुटा रहे जीव! तू परमात्मा से परदा करता है, और छुप के मन-मानियां करता है।1। रहाउ। हे प्रभू! जो जो (बुरा) काम मनुष्य छुप के (भी) करते हैं तू देख लेता है, पर मूर्ख बेसमझ मनुष्य (फिर भी) मुकरते हैं। अपने किए बुरे कर्मों के कारण पकड़े जाते हें (तेरी हजूरी में वे विकार सामने आने पर) फिर पीछे से पछताते हैं।1। (पर जीवों के भी क्या वश?) जिस जिस तरफ़ जीवों को परमात्मा लगाता है, उधर-उधर वह बिचारे लग पड़ते हैं। कोई जीव (परमात्मा की प्रेरणा के आगे) कोई हील-हुज्जत नहीं कर सकता। हे नानक! कह– हे परमात्मा! हे जीवों के खसम! तू खुद जीवों पे बख्शिश कर, मैं तुझ पर से सदा कुर्बान जाता हूँ।2।6।128। आसा महला ५ ॥ अपुने सेवक की आपे राखै आपे नामु जपावै ॥ जह जह काज किरति सेवक की तहा तहा उठि धावै ॥१॥ सेवक कउ निकटी होइ दिखावै ॥ जो जो कहै ठाकुर पहि सेवकु ततकाल होइ आवै ॥१॥ रहाउ ॥ तिसु सेवक कै हउ बलिहारी जो अपने प्रभ भावै ॥ तिस की सोइ सुणी मनु हरिआ तिसु नानक परसणि आवै ॥२॥७॥१२९॥ {पन्ना 403} पद्अर्थ: राखै = रख लेता है, रक्षा करता है, इज्जत रखता है। आपे = स्वयं ही। जह जह = जहाँ जहाँ। काज किरति = काम कार। उठि धावै = उठ के दौड़ पड़ता है, जल्दी पहुँच जाता है।1। कउ = को। दिखावै = अपना आप दिखाता है। निकटी = निकटवर्ती, अंग संग रहने वाला। ठाकुर पहि = मालिक प्रभू के पास। कहै = कहता है। ततकाल = तुरंत, उसी वक्त।1। रहाउ। हउ = मैं। बलिहारी = सदके। प्रभ भावै = प्रभू को प्यारा लगता है। तिस की: ‘तिस’ की ‘ु’ की मात्रा संबंधक ‘की’ के कारण हटा दी गई है। सुणी = सुना। परसणि = छूने के लिए। अर्थ: हे भाई! परमात्मा अपने सेवक को (उसका) निकटवर्ती हो के दिखा देता है (परमात्मा अपने सेवक को दिखा देता है कि मैं हर समय तेरे अंग-संग रहता हूँ, क्योंकि) जो कुछ सेवक परमात्मा से मांगता है वह मांग उसी समय पूरी हो जाती है।1। रहाउ। हे भाई! परमात्मा अपने सेवक की स्वयं ही (हर जगह) इज्जत रखता है, खुद ही उस से अपने नाम का सिमरन करवाता है। सेवक को जहाँ-जहाँ कोई काम-काज पड़े, वहाँ-वहाँ परमात्मा (उसका काम सँवारने के लिए) उसी वक्त जा पहुँचता है।1। हे नानक! (कह–) जो सेवक अपने परमात्मा को प्यारा लगता है मैं उससे कुर्बान जाता हूँ। उस (सेवक) की शोभा सुन के (सुनने वाले का) मन खिल उठता है (आत्मिक जीवन से भरपूर हो जाता है और वह) उस सेवक के चरण छूने के लिए आता है।2।7।129। आसा घरु ११ महला ५ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ नटूआ भेख दिखावै बहु बिधि जैसा है ओहु तैसा रे ॥ अनिक जोनि भ्रमिओ भ्रम भीतरि सुखहि नाही परवेसा रे ॥१॥ साजन संत हमारे मीता बिनु हरि हरि आनीता रे ॥ साधसंगि मिलि हरि गुण गाए इहु जनमु पदारथु जीता रे ॥१॥ रहाउ ॥ त्रै गुण माइआ ब्रहम की कीन्ही कहहु कवन बिधि तरीऐ रे ॥ घूमन घेर अगाह गाखरी गुर सबदी पारि उतरीऐ रे ॥२॥ खोजत खोजत खोजि बीचारिओ ततु नानक इहु जाना रे ॥ सिमरत नामु निधानु निरमोलकु मनु माणकु पतीआना रे ॥३॥१॥१३०॥ {पन्ना 403-404} पद्अर्थ: नटूआ = बहुरूपीआ। भेख = स्वांग। बहु बिध = कई तरह के। रे = हे भाई! भ्रम भीतरि = भटकना में पड़ के। सुखहि = सुख में।1। हमारे मीता = हे मेरे मित्रो! आनीता = अनित्त, नाशवंत। मिलि = मिल के।1। रहाउ। की = की। कीनी = बनाई हुई। कवन बिधि = किस तरीके से? अगाह = अथाह, बहुत गहरी। गाखरी = मुश्किल।2। खोजत = तलाश करते हुए। खोजि = तलाश करके। ततु = अस्लियत। निधानु = खजाना। निरमोलकु = जिसके बराबर के मूल्य की और कोई चीज नहीं। माणकु = मोती। पतीआना = परच जाना, आदत पड़ जानी।3। अर्थ: हे भाई! बहुरूपीया कई किस्म के स्वांग (बना के लोगों को) दिखाता है (पर अपने अंदर से) वह जैसा है वैसा ही रहता है (अगर वह राजे-रानियों जैसा स्वांग भी करके दिखाए तो भी वह कंगाल का कंगाल ही रहता है। इस तरह) जीव (माया की) भटकना में फस के अनेकों जूनियों में भटकते फिरते हैं (अंतरात्मे हमेशा दुखी ही रहता है) सुख में उसका प्रवेश नहीं होता।1। हे संत जनो! हे सज्जनों! हे मेरे मित्रो! (जगत में जो कुछ भी दिख रहा है परमात्मा के बिना और सब कुछ नाशवंत है (दिखते पसारे से मोह डाल के दुख ही प्राप्त होगा)। जिस मनुष्य ने साध-संगति में मिल के परमात्मा के गुण गाने शुरू कर दिए, उसने ये कीमती मानस जन्म जीत लिया (सफल कर लिया)।1। रहाउ। हे भाई! परमात्मा की पैदा की हुई ये त्रिगुणी माया (मानो, एक समुंद्र है, इस में से) बताओ, कैसे पार लांघ सकें? (इसमें अनेकों विकारों की) घुम्मण-घेरियां चल रही हैं, ये अथाह है, इसमें से पार होना बहुत मुश्किल है। (हां हे भाई!) गुरू के शबद के द्वारा ही इसमें से पार लांघ सकते हैं।2। हे नानक! जिस मनुष्य ने (साध-संगति में मिल के) खोज करते हुए विचार की और उसने ये अस्लियत समझली कि परमात्मा का नाम जो सारे गुणों का खजाना है जिसके बराबर का और कोई नहीं, ऐसे नाम को सिमर के मन मोती (जैसा कीमती) बन जाता है (और परमात्मा के सिमरन में) पतीज जाता है।3।1।130। |
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Sri Guru Granth Darpan, by Professor Sahib Singh |