श्री गुरू ग्रंथ साहिब दर्पण । टीकाकार: प्रोफैसर साहिब सिंह । अनुवादक भुपिन्दर सिंह भाईख़ेल |
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Page 404 आसा महला ५ दुपदे ॥ गुर परसादि मेरै मनि वसिआ जो मागउ सो पावउ रे ॥ नाम रंगि इहु मनु त्रिपताना बहुरि न कतहूं धावउ रे ॥१॥ हमरा ठाकुरु सभ ते ऊचा रैणि दिनसु तिसु गावउ रे ॥ खिन महि थापि उथापनहारा तिस ते तुझहि डरावउ रे ॥१॥ रहाउ ॥ जब देखउ प्रभु अपुना सुआमी तउ अवरहि चीति न पावउ रे ॥ नानकु दासु प्रभि आपि पहिराइआ भ्रमु भउ मेटि लिखावउ रे ॥२॥२॥१३१॥ {पन्ना 404} नोट: दुपदे–दो बंदों वाले शबद। पद्अर्थ: परसादि = कृपा से। मनि = मन में। मागउ = मैं मांगता हूँ, मांगू। पावउ = पाऊँ, मैं पाता हूँ, मैं हासिल कर लेता हूँ। रे = हे भाई! रंगि = रंग से। त्रिपताना = तृप्त हो गया। बहुरि = दुबारा।1। हमरा ठाकुरु = मेरा मालिक प्रभू! ते = से। रैणि = रात। दिनसु = दिन। थापि = पैदा करके। उथापनहारा = नाश करने की ताकत रखने वाला। तिस ते: शब्द ‘तिस’ की ‘ु’ की मात्रा संबंधक ‘ते’ के कारण हट गई है। तुझहि = तुझे। डरावउ = डराता हूँ, उसे डर में रखता हूँ।1। रहाउ। अवरहि = किसी और को। चीति = चित्त में। न पावउ = नहीं पाता, नहीं टिकाता। प्रभि = प्रभू ने। पहिराइआ = आदर मान दिया, सिरोपा दिया, निवाजा। लिखावउ = मैं उकरवाता हूँ, परोता हूँ।2। अर्थ: हे मेरे मन! मेरा मालिक प्रभू सबसे ऊँचा है, मैं रात दिन उसकी (ही) सिफतसालाह करता रहता हूँ। मेरा वह मालिक एक छिन में पैदा करके नाश करने की समर्था रखने वाला है। मैं, (हे मन!) तुझे उसके भय-अदब में रखना चाहता हूँ।1। हे भाई! जब से गुरू की किरपा से मेरा वह मालिक-प्रभू मेरे मन में आ बसा है तब से मैं (उससे) जो कुछ मांगता हूँ वही कुछ पा लेता हूँ। (मेरे मालिक-प्रभू के) नाम के प्रेम-रंग से मेरा ये मन (माया की तृष्णा से) भर चुका है (तब से) मैं दुबारा किसी और तरफ भटकता नहीं फिरता।1। हे भाई! जब मैं अपने पति-प्रभू को (अपने अंदर बसता) देख लेता हूँ मैं किसी और (ओट आसरे) को चित्त में जगह नहीं देता। हे भाई! जब से प्रभू ने अपने दास नानक को खुद निवाजा है तब से मैंने अन्य सारी किस्म की भटकनें दूर करके (अपने चित्त में सिर्फ परमात्मा के नाम को) लिखता रहता हूँ।2।2।131। आसा महला ५ ॥ चारि बरन चउहा के मरदन खटु दरसन कर तली रे ॥ सुंदर सुघर सरूप सिआने पंचहु ही मोहि छली रे ॥१॥ जिनि मिलि मारे पंच सूरबीर ऐसो कउनु बली रे ॥ जिनि पंच मारि बिदारि गुदारे सो पूरा इह कली रे ॥१॥ रहाउ ॥ वडी कोम वसि भागहि नाही मुहकम फउज हठली रे ॥ कहु नानक तिनि जनि निरदलिआ साधसंगति कै झली रे ॥२॥३॥१३२॥ {पन्ना 404} पद्अर्थ: चारि बरन = ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र (शब्द ‘चारि’ गिनती वाचक है, जबकि ‘चार’ विशेषण है जिसका अर्थ है ‘सुंदर’)। मरदन = मलने वाले। खटु दरसन = छे भेख। कर तली = हाथ की तली पर। रे = हे भाई! सुघर = सुघड़, सुनख्खे, सोहने। पंचहु = पाँचों ने। मोहि = मोह के। छली = छल लिया है।1। जिनि = जिस ने। मिलि = (गुरू को) मिल के। सूरबीर = बहादुर सूरमे। कउनु बली = कोई विरला बलवान। मारि = मार के। बिदारि = फाड़ के। गुदारे = खत्म कर दिए। इह कली = इस जगत में (शब्द ‘कली’ यहाँ ‘जुग’ का ख्याल नहीं दे रहा)।1। रहाउ। कोम = कोड़मा, खानदान। वसि = वश में। भागहि = भागते। मुहकम = मजबूत। हठली = हठ वाली। तिनि जनि = उस मनुष्य ने। निरदलिआ = अच्छी तरह लिताड़ा। झली = आसरे।2। अर्थ: हे भाई! कोई विरला ही ऐसा बलवान मनुष्य है जिसने (गुरू को) मिल के कामादिक पाँचों शूरवीरों को मार लिया है (पर विजय पा ली हो)। हे भाई! जगत में वही मनुष्य पूर्ण है जिसने इन पाँचों को मार के टुकड़े-टुकड़े कर दिया है।1। रहाउ। हे भाई! (हमारे देश में ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ये) चार वर्ण (प्रसिद्ध) हैं, (कामादिक विकार इन) चारों वर्णों (के लोगों) को मसल देने वाले हैं। छे भेषों (के साधुओं) को भी ये हाथों की तलियों पर (नचाते हैं)। सुंदर, सुनॅखे, बाँके, सयाने (कोई भी हों, कामादिक) पाँचों ने सभी को मोह कर छल लिया है।1। हे भाई! (इन कामादिकों का बहुत बडा) बलशाली कुनबा है, ना ये किसी के काबू में आते हैं ना ये किसी से डर के भागते हैं। इनकी फौज बड़ी मजबूत और हठ वाली है। हे भाई! कह– हे भाई! सिर्फ उस मनुष्य ने इनको अच्छी तरह लिताड़ा है जो साध-संगति के आसरे में (ओट में) रहता है।2।3।132। आसा महला ५ ॥ नीकी जीअ की हरि कथा ऊतम आन सगल रस फीकी रे ॥१॥ रहाउ ॥ बहु गुनि धुनि मुनि जन खटु बेते अवरु न किछु लाईकी रे ॥१॥ बिखारी निरारी अपारी सहजारी साधसंगि नानक पीकी रे ॥२॥४॥१३३॥ {पन्ना 404} पद्अर्थ: नीकी = अच्छी (चीज)। जीअ की = जिंद की, जिंद के वास्ते। ऊतम = श्रेष्ठ। आन = अन्य। सगल = सारे। फीकी = फीके, बेस्वादे।1। रहाउ। बहुगुनि = बहुत गुणों वाली। धुनि = मिठास वाली। खट = छे (शास्त्र)। बेते = जानने वाले। लाइकी = लायक, योग्य, लाभदायक। रे = हे भाई!।1। बिखारी = (बिख+अरि) विषियों की वैरन, विषयों का दबाव हटाने वाली। निरानी = निराली, अनोखी। अपारी = बेअंत, अकथ। सहजारी = आत्मिक अडोलता पैदा करने वाली। पीकी = पीयी जाती है।2। अर्थ: हे भाई! परमात्मा की सिफत सालाह की बात जिंद के वास्ते श्रेष्ठ और सुंदर है। (दुनिया के) और सारे पदार्थों के स्वाद (इसके मुकाबले पर) फीके हैं।1। रहाउ। हे भाई! ये हरि कथा बहुत गुणों वाली है (जीव के अंदर गुण पैदा करने वाली है) मिठास भरी है, छे शस्त्रों को जानने वाले ऋषि लोग (ही हरि-कथा के बिना) किसी और उद्यम को (जीवात्मा के लिए) लाभदायक नहीं मानते।1। हे भाई! ये हरि-कथा (जैसे, अमृत की धार है जो) विषियों के जहर के असर का नाश करती है। हे नानक! (ये हरि-कथा, ये अमृत-धारा) साध-संगति में (टिक के ही) पीयी जा सकती है।2।4।133। आसा महला ५ ॥ हमारी पिआरी अम्रित धारी गुरि निमख न मन ते टारी रे ॥१॥ रहाउ ॥ दरसन परसन सरसन हरसन रंगि रंगी करतारी रे ॥१॥ खिनु रम गुर गम हरि दम नह जम हरि कंठि नानक उरि हारी रे ॥२॥५॥१३४॥ {पन्ना 404} पद्अर्थ: अंम्रितधारी = आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल की धार वाली। गुरि = गुरू ने। निमख = आँख झपकने जितना समय। ते = से। टारी = टाली, हटाई, दूर की। रे = हे भाई!।1। रहाउ। दरसन = (करतार का) दीदार। परसन = (करतार के चरणों की) छोह। सरसन = आत्मिक खिलाउ। हरसन = हर्ष, आनंद, खुशी। रंगि = प्रेम रंग में। रंगी = रंगने वाली।1। रम = सिमरन। गम = पहुँच। हर दम = स्वास स्वास। कंठि = गले में। उरि = हृदय में।2। अर्थ: हे भाई! गुरू ने (कृपा करके प्रभू की सिफत सालाह वाली अपनी बाणी) आँख झपकने जितने समय के लिए भी मेरे मन से कभी भूलने नहीं दी, ये बाणी मुझे मधुर लगती है, ये बाणी आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल की धारा मेरे अंदर जारी रखती है।1। रहाउ। हे भाई! ये बाणी करतार के प्रेम रंग में रंगने वाली है, इसकी बरकति से करतार के दर्शन होते हैं करतार के चरणों की छूह मिलती है मन में आनंद और खिलाउ पैदा होता है।1। हे भाई! इस बाणी को एक छिन वास्ते भी हृदय में बसाने से गुरू के चरणों तक पहुँच बन जाती है, इसे स्वास-स्वास हृदय में बसाने से जमों का डर नहीं व्याप सकता। हे नानक! इस हरि-कथा को अपने गले में परो के रख, अपने हृदय का हार (बना के) रख।2।5।134। आसा महला ५ ॥ नीकी साध संगानी ॥ रहाउ ॥ पहर मूरत पल गावत गावत गोविंद गोविंद वखानी ॥१॥ चालत बैसत सोवत हरि जसु मनि तनि चरन खटानी ॥२॥ हंउ हउरो तू ठाकुरु गउरो नानक सरनि पछानी ॥३॥६॥१३५॥ {पन्ना 404} पद्अर्थ: नीकी = अच्छी। संगानी = संगति। रहाउ। पहर = (आठों) पहर, हर वक्त। मूरत = मुहूरत, हर घड़ी। वखानी = वर्णन होता है।1। चालत = चलते फिरते। बैसत = बैठते हुए। मनि = मन में। तनि = तन में, हृदय में। चरन खटानी = चरणों का मिलाप।2। हउ = मैं। हउरो = हलका, गुण हीन। गउरो = भारा, गुणों से भरपूर। सरनि = शरण, ओट।3। अर्थ: (हे भाई!) साध-संगति (मनुष्य के लिए एक) खूबसूरत बरकत है। रहाउ। (हे भाई! साध-संगति में) आठों पहर, पल पल, घड़ी-घड़ी परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाए जाते हैं, परमात्मा के सिफत सालाह की बातें होती है।1। (हे भाई! साध-संगति की बरकति से) चलते-बैठते-सोए हुए (हर वक्त) परमातमा की सिफत सालाह (करने का स्वभाव बन जाता है) मन में परमात्मा, हृदय में परमात्मा आ बसता है, परमात्मा के चरणों में हर वक्त मेल बना रहता है।2। हे नानक! (कह– हे प्रभू!) मैं गुण-हीन हूँ, तू मेरा मालिक गुणों से भरपूर है (साध-संगति के सदका) मुझे तेरी शरण पड़ने की समझ आई है।3।6।135। |
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Sri Guru Granth Darpan, by Professor Sahib Singh |