श्री गुरू ग्रंथ साहिब दर्पण । टीकाकार: प्रोफैसर साहिब सिंह । अनुवादक भुपिन्दर सिंह भाईख़ेल

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रागु आसा महला ५ घरु १२    ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ तिआगि सगल सिआनपा भजु पारब्रहम निरंकारु ॥ एक साचे नाम बाझहु सगल दीसै छारु ॥१॥ सो प्रभु जाणीऐ सद संगि ॥ गुर प्रसादी बूझीऐ एक हरि कै रंगि ॥१॥ रहाउ ॥ सरणि समरथ एक केरी दूजा नाही ठाउ ॥ महा भउजलु लंघीऐ सदा हरि गुण गाउ ॥२॥ जनम मरणु निवारीऐ दुखु न जम पुरि होइ ॥ नामु निधानु सोई पाए क्रिपा करे प्रभु सोइ ॥३॥ एक टेक अधारु एको एक का मनि जोरु ॥ नानक जपीऐ मिलि साधसंगति हरि बिनु अवरु न होरु ॥४॥१॥१३६॥ {पन्ना 405}

पद्अर्थ: भजु = सिमर। साचे = सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के। बाझहु = बिना। छारु = राख, निकम्मी।1।

जाणीअै = समझना चाहिए। सद = सदा। संगि = अंग संग बसता। प्रसादी = प्रसाद, कृपा से। बूझीअै = समझ आती है। रंगि = प्रेम में (जुड़ने से)।1। रहाउ।

समरथ = ताकत वाली। सरणि = ओट, आसरा। केरी = की। भउजलु = संसार समुंद्र।2।

निवारीअै = दूर किया जा सकता है। जमपुरि = जम की पुरी में। निधान = खजाना।3।

अधारु = आसरा। मनि = मन में। जोरु = बल, ताण, सहारा।4।

अर्थ: (हे भाई! अगर संसार-समुंद्र में से अपनी जीवन-बेड़ी सही-सलामत पार लंघानी है, तो) उस परमात्मा को हमेशा अपने अंग-संग बसता समझना चाहिए। ये समझ तभी पड़ सकती है अगर गुरू की कृपा से एक परमात्मा के प्यार में टिके रहें।1। रहाउ।

(हे भाई! संसार-समुंद्र में से पार लांघने के लिए इस संबंधी अपनी) सारी सियानपें छोड़ दे, परमात्मा निरंकार का सिमरन किया कर। सदा कायम रहने वाले परमात्मा का नाम सिमरन के बिना (संसार-समुंद्र से पार लांघने संबंधी और) हरेक चतुराई निकम्मी (मूर्खता साबित होती) है।1।

(हे भाई! संसार-समुंद्र से पार लंघा सकने की) ताकत रखने वाली सिर्फ एक परमात्मा की ओट है, इसके बिना और कोई सहारा नहीं (इस वास्ते, हे भाई!) सदा परमात्मा के गुण गाता रह तो ही इस बिखड़े संसार-समुंद्र से पार लांघा जा सकेगा।2।

(हे भाई! यदि परमात्मा को सदा अंग-संग बसता पहचान लें तो) जनम-मरन का चक्कर समाप्त हो जाता है, जमों के शहर में निवास नहीं होता (आत्मिक मौत नजदीक नहीं फटकती) कोई दुख छू नहीं सकता। (पर सारे गुणों का) खजाना ये हरि-नाम वही मनुष्य प्राप्त करता है जिस पर प्रभू स्वयं कृपा करता है।3।

(हे भाई!) एक परमात्मा की ही ओट, एक परमात्मा का ही आसरा, एक परमात्मा का ही मन में तकिया (जम-पुरी से बचा सकता) है। (इस वास्ते) हे नानक! साध-संगति में मिल के परमात्मा का ही नाम सिमरना चाहिए, परमात्मा के बिना और कोई नहीं (जो जमपुरी से बचा सके जो संसार समुंद्र से पार लंघा सके)।4।1।136।

नोट: यहाँ से घर 12 के शबदों का संग्रह आरम्भ हुआ है।

आसा महला ५ ॥ जीउ मनु तनु प्रान प्रभ के दीए सभि रस भोग ॥ दीन बंधप जीअ दाता सरणि राखण जोगु ॥१॥ मेरे मन धिआइ हरि हरि नाउ ॥ हलति पलति सहाइ संगे एक सिउ लिव लाउ ॥१॥ रहाउ ॥ बेद सासत्र जन धिआवहि तरण कउ संसारु ॥ करम धरम अनेक किरिआ सभ ऊपरि नामु अचारु ॥२॥ कामु क्रोधु अहंकारु बिनसै मिलै सतिगुर देव ॥ नामु द्रिड़ु करि भगति हरि की भली प्रभ की सेव ॥३॥ चरण सरण दइआल तेरी तूं निमाणे माणु ॥ जीअ प्राण अधारु तेरा नानक का प्रभु ताणु ॥४॥२॥१३७॥ {पन्ना 405}

पद्अर्थ: जीउ = जिंद। तनु = शरीर। के दीऐ = के दिए हुए। सभि = सारे। रस भोग = स्वादिष्ट पदार्थ। दीन बंधप = गरीबों का रिश्तेदार। जीअ दाता = आत्मिक जीवन देने वाला। जोगु = समर्थ।1।

मन = हे मन! हलति = (अत्र) इस लोक में। पलति = (परत्र) परलोक में। सहाइ = सहाई। संगे = साथ रहने वाला। लिव लाउ = सुरति जोड़।1। रहाउ।

जन = लोक। धिआवहि = विचारते हैं। कउ = वास्ते। करम धरम = (वेदों-शास्त्रों के अनुसार मिथे हुई) धार्मिक मर्यादा।2।

बिनसै = नाश हो जाता है। सतिगुर मिलै = (जो मनुष्य) गुरू को मिलता है।3।

दइआल = हे दयालु! जीअ अधारु = जीवात्मा का आसरा। ताणु = सहारा।4।

अर्थ: हे मेरे मन! सदा परमात्मा का नाम सिमरता रह। परमात्मा ही इस लोक में और परलोक में तेरी सहायता करने वाला है तेरे साथ रहने वाला है। एक परमात्मा के साथ ही सुरति जोड़े रख।1। रहाउ।

(हे भाई!) ये जिंद, ये मन, ये शरीर, ये प्राण, सारे स्वादिष्ट पदार्थ -ये सब परमात्मा के दिए हुए हैं। परमात्मा ही गरीबों का (असल) संबंधी है, परमात्मा ही आत्मिक जीवन देने वाला है, परमात्मा ही शरण पड़े की रक्षा करने में समर्थ है।1।

हे भाई! संसार-समुंद्र से पार लांघने के वास्ते लोग वेदों-शास्त्रों को विचारते हैं (और उनके बताए मुताबिक निहित) अनेकों धार्मिक कर्म व अन्य साधन करते हैं। पर परमात्मा का नाम-सिमरन एक ऐसा धार्मिक उद्यम है जो उन निहित सब धार्मिक कर्मों से ऊँचा है श्रेष्ठ है।2।

हे भाई! जो मनुष्य गुरू-देव को मिल जाता है (और उसकी शिक्षा के अनुसार परमात्मा का नाम सिमरता है, उसके मन में से) काम-वासना दूर हो जाती है क्रोध मिट जाता है, अहंकार खत्म हो जाता है। (हे भाई! तू भी अपने हृदय में) परमात्मा का नाम पक्की तरह टिकाए रख, परमात्मा की भक्ति कर। परमात्मा की सेवा-भक्ति ही बढ़िया काम है।3।

हे दया के घर प्रभू! मैंने तेरे चरणों की ओट ली है, तू ही मुझ निमाणे को आदर देने वाला है। हे प्रभू! मुझे अपनी जिंद वास्ते, प्राणों के वास्ते तेरा ही सहारा है।

हे भाई! (दास) नानक का आसरा परमात्मा ही है।4।2।137।

आसा महला ५ ॥ डोलि डोलि महा दुखु पाइआ बिना साधू संग ॥ खाटि लाभु गोबिंद हरि रसु पारब्रहम इक रंग ॥१॥ हरि को नामु जपीऐ नीति ॥ सासि सासि धिआइ सो प्रभु तिआगि अवर परीति ॥१॥ रहाउ ॥ करण कारण समरथ सो प्रभु जीअ दाता आपि ॥ तिआगि सगल सिआणपा आठ पहर प्रभु जापि ॥२॥ मीतु सखा सहाइ संगी ऊच अगम अपारु ॥ चरण कमल बसाइ हिरदै जीअ को आधारु ॥३॥ करि किरपा प्रभ पारब्रहम गुण तेरा जसु गाउ ॥ सरब सूख वडी वडिआई जपि जीवै नानकु नाउ ॥४॥३॥१३८॥ {पन्ना 405}

पद्अर्थ: डोलि डोलि = (असल संगी परमात्मा से) श्रद्धा हीन हो के कभी इधर कभी उधर। साधू = गुरू। खाटि = कमा के। हरि रसु = हरि नाम का स्वाद। पारब्रहम इक रंग = एक परमात्मा (के मिलाप) का आनंद।1।

को = का। नीति = नित्य, सदा। सासि सासि = हरेक सांस के साथ। अवर = और दूसरी।1। रहाउ।

करण कारण = सारे जगत का मूल। जीअ दाता = आत्मिक जीवन देने वाला।2।

सखा = दोस्त। सहाइ = सहाई। अगम = अपहुँच। हिरदै = हृदय में। जीअ को = जिंद को।3।

प्रभ = हे प्रभू! गाउ = गाऊँ। जपि = जप के। जीवै नानकु = नानक जीता है।4।

अर्थ: (हे भाई!) परमात्मा का नाम सदा जपते रहना चाहिए। (हे भाई!) हरेक सांस के साथ उस परमात्मा को सिमरता रह, औरों की प्रीति त्याग दे।1। रहाउ।

(हे मन!) गुरू की संगति से वंचित रह के (असल सहाई परमात्मा से) सिदक-हीन हो हो के तू बड़ा दुख सहता रहा। अब तो हरि-नाम का स्वाद चख, एक परमात्मा के मिलाप का आनंद ले (यही है जीवन का) लाभ (ये) कमा ले।1।

(हे भाई! दुखों से छुटकारा पाने के लिए) और सारी चतुराईयां छोड़ दे, आठों पहर प्रभू को याद करता रह। वह प्रभू ही सारे जगत का मूल है, (दुख दूर करने के) समर्थ है, वह खुद ही आत्मिक जीवन देने वाला है।2।

हे भाई! वह सबसे ऊँचा, अपहुँच व बेअंत परमात्मा ही तेरा असल मित्र है दोस्त है सहायक है साथी है, उसके सोहाने कोमल चरण अपने दिल में बसाए रख, वही जिंद का (असली) सहारा है।3।

हे प्रभू! हे पारब्रहम! मेहर कर मैं सदा तेरे गुण गाता रहूँ तेरी सिफत सालाह करता रहूँ। (तेरी सिफत सालाह में ही) सारे सुख हैं और बड़ी इज्जत है। (तेरा दास) नानक तेरा नाम सिमर के आत्मिक जीवन प्राप्त करता है।4।3।138।

आसा महला ५ ॥ उदमु करउ करावहु ठाकुर पेखत साधू संगि ॥ हरि हरि नामु चरावहु रंगनि आपे ही प्रभ रंगि ॥१॥ मन महि राम नामा जापि ॥ करि किरपा वसहु मेरै हिरदै होइ सहाई आपि ॥१॥ रहाउ ॥ सुणि सुणि नामु तुमारा प्रीतम प्रभु पेखन का चाउ ॥ दइआ करहु किरम अपुने कउ इहै मनोरथु सुआउ ॥२॥ तनु धनु तेरा तूं प्रभु मेरा हमरै वसि किछु नाहि ॥ जिउ जिउ राखहि तिउ तिउ रहणा तेरा दीआ खाहि ॥३॥ जनम जनम के किलविख काटै मजनु हरि जन धूरि ॥ भाइ भगति भरम भउ नासै हरि नानक सदा हजूरि ॥४॥४॥१३९॥ {पन्ना 405-406}

पद्अर्थ: करउ = मैं करूँ। करावहु = तू कराता रह। ठाकुर = हे ठाकुर! साधू संगि = गुरू की संगति में। चरावहु = चढ़ाऔ। रंगनि = रंगने। प्रभ = हे प्रभू! रंगि = (अपने नाम रंग में) रंग।1।

जापि = जपूँ, मैं जपता रहूँ। हिरदै = हृदय में।1। रहाउ।

प्रीतम = हे प्रीतम! पेखन का = देखने का। किरम = कीड़ा, नाचीज। सुआउ = गर्ज।2

वसि = वश में। खाहि = खाते हैं।3।

किलविख = पाप। मजनु = स्नान। धूरि = चरणों की धूड़। भाइ = प्रेम से।4।

अर्थ: हे प्रभू! (मेरे पर) किरपा कर, मेरे दिल में आ बस। यदि तू मेरा मददगार बने तो मैं अपने मन में तेरा राम-नाम जपता रहूँ।1। रहाउ।

हे मेरे मालिक! (मुझसे ये उद्यम) करवाता रह, गुरू की संगति में तेरे दर्शन करते हुए मैं तेरा नाम जपने का आहर करता रहूँ। हे प्रभू! मेरे मन पर तू अपने नाम की रंगत चढ़ा दे, तू खुद ही (मेरे मन को अपने प्रेम के रंग में) रंग दे।1।

हे मेरे प्यारे! तू मेरा मालिक है, अपने इस नाचीज सेवक पर मेहर कर कि तेरा नाम सुन-सुन के मेरे अंदर तेरे दर्शनों का चाव बना रहे- मेरा ये मनोरथ पूरा कर, मेरी ये अभिलाषा पूरी कर।2।

(हे प्रभू!) मेरा ये शरीर, मेरा ये धन सब कुछ तेरा ही दिया हुआ है, तू ही मेरा मालिक है। (हम जीव अपने उद्यम से तेरे नाम जपने के योग्य भी नहीं हैं) हमारे बस में कुछ भी नहीं है। तू हम जीवों को जिस-जिस हाल में रखता है उसी तरह ही हम जीवन बिताते हैं, हम तेरा ही दिया हुआ हरेक पदार्थ खाते हैं।3।

हे नानक! (कह–) परमात्मा के सेवकों (के चरणों) की धूड़ में (किया हुआ) स्नान (मनुष्य के) जन्मों-जन्मांतरों के (किए हुए) पाप दूर कर देता है, प्रभू-प्रेम से भक्ति की बरकति से (मनुष्य का) हरेक किस्म का डर वहम नाश हो जाता है, और परमात्मा सदा अंग-संग प्रतीत होने लग पड़ता है।4।4।139।

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Sri Guru Granth Darpan, by Professor Sahib Singh